अचल व शांत आत्मा में परमात्मा समाहित व प्रकाशित रहता है

ओ३म
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ईश्वर सृष्टिकर्ता है और वह जीवात्माओं को उनके कर्मानुसार भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म देकर सुख व दुःख का भोग कराता है। मनुष्य जन्म उन जीवात्माओं को मिलता है जिनके पूर्वजन्म के कर्म-संचय में आधे से अधिक पुण्य कर्म होते हैं। इसका अर्थ यह है कि यदि पाप कर्म आधे से कम हैं तो जीवात्मा को मनुष्य का जन्म मिलता है। मनुष्य योनि उभय योनि है। मनुष्य योनि में मनुष्य अपने पूर्व कर्मों को भोगता भी है और नये कर्मों को करता भी है। मनुष्य के पास ज्ञान प्राप्ति के लिये बुद्धि है और संकल्प व विकल्प करने के मन लिए है। तप करने व विद्या की प्राप्ति के लिये आत्मा होती ही है। इन सबका सदुपयोग कर मनुष्य सद्ज्ञान को प्राप्त होकर विचारपूर्वक सद्कर्मों में प्रवृत्त हो सकता है। ऋषि दयानन्द के जीवन चरित व साहित्य को पढ़ते हैं तो विदित होता है कि मनुष्य को मत-मतान्तरों के अविद्यायुक्त ग्रन्थों ने भ्रमित किया हुआ है। यह ग्रन्थ मनुष्यों को सत्य व असत्य अर्थात् विद्या व अविद्या का विवेक नहीं होने देते। इस कारण से मनुष्य सद्ज्ञान व सदाचरण को प्राप्त नहीं हो पाता। वेदों में सर्वत्र व समग्र रूप में सद्ज्ञान व विद्या की प्राप्ति होती है। वेदों के ज्ञान से मनुष्य अविद्या व अन्धविश्वासों से मुक्त होकर वेदज्ञान के अनुसार सद्कर्मों को करके आत्मा व शरीर की उन्नति करते हुए सुख, शान्ति व कल्याण का लाभ प्राप्त करता है। अतः मनुष्य को अपने वर्तमान जीवन को सुखी बनाने तथा सदाचारपूर्वक जीवन व्यतीत करने के लिये वेदों की शरण में आना चाहिये जिससे उसका अगला जन्म भी मनुष्य योनि में होकर सुख व कल्याण को प्राप्त हो तथा जीवात्मा अपने लक्ष्य दुःखों की पूर्ण निवृत्ति की ओर अग्रसर होकर ईश्वर की समाधि का लाभ प्राप्त कर मोक्ष को प्राप्त हो सके। ऐसा ही प्राचीन काल से महाभारत पर्यन्त हमारे देश के सभी विद्वान, ऋषि, मुनि, मनीषी, विचारक, योगी, ज्ञानी तथा वेदों का स्वाध्याय करने वाले करते रहे हैं। सभी ऋषि वेदों के विद्वान होते थे तथा कठोर साधनामय जीवन व्यतीत करके वह पूर्ण सन्तुष्टि को प्राप्त होते थे जो कि आजकल के भौतिक जीवन जीने वाले समृद्धतम व्यक्तियांे को भी सुलभ नहीं है।

महाभारत का एक अंश व भाग है वर्तमान में गीता के नाम से प्रचारित ग्रन्थ। इस ग्रन्थ में अनेक श्लोक ऐसे हैं जो बहुत सी वेदानुकूल बातों व सिद्धान्तों को बहुत सरल व प्रभावशाली शब्दों में वर्णित करते हैं। पाठक ऐसे श्लोकों व इनके अर्थों को पढ़कर मन्त्रमुग्ध हो जाता है। ऐसे ही गीता के छठे अध्याय श्लोक संख्या 7 व 8 है। यह दोनों श्लोक निम्न हैं:

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः। शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः।।7।।
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः। युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकांचनः।।8।।

इन श्लोकों का शब्द एवं भावार्थ है कि सरदी-गरमी, सुख-दुःखादि तथा मान और अपमान में जिस मनुष्य के अन्तःकरण की वृत्तियां भलीभांति शान्त रहती हैं, ऐसे स्वाधीन आत्मा वाले पुरुष के ज्ञान में सच्चिदानन्दघन परमात्मा सम्यक् प्रकार से स्थित व विराजमान होते हैं अर्थात् उसके ज्ञान व आत्मा में परमात्मा के अनुभव के सिवा अन्य कोई भ्रान्ति, अविवेक व अविश्वास आदि होता ही नहीं है।7।

जिस मनुष्य का अन्तःकरण अर्थात् मन, बुद्धि, चित्त आदि ज्ञान-विज्ञान से तृप्त है, जिसकी स्थिति विकाररहित है, जिसकी सभी इन्द्रियां भलीभांति जीती हुई हैं और जिसके लिये मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण समान हैं, वह मनुष्य वा योगी युक्त अर्थात् ईश्वर को प्राप्त है, ऐसा कहा जाता है।8।

प्रथम श्लोक में बताया गया है कि किन मनुष्यों के हृदय वा आत्मा में परमात्मा का प्रत्यक्ष अनुभव होता है। इसके लिये मनुष्य का शीत व उष्णता, सुख व दुःख तथा मान व अपमान में पूर्णतया शान्त, अविचल, अकम्पित व निश्चल मन वाला होना आवश्यक होता है। हमें व अन्यों को ईश्वर का अनुभव व साक्षात् क्यों नहीं होता, इसका कारण हमारा सुख व दुःख, मान व अपमान तथा सरदी-गर्मी पर नियंत्रण न होना है। यह विघ्न सब मनुष्यों को समान रूप से प्रभावित करते हैं। जो इनसे विचलित नहीं होता और मन व आत्मा से शान्त बना रहता है, अपनी सभी प्रवृत्तियों तथा मन पर विजय प्राप्त कर लेता है, उसको ईश्वर का प्रत्यक्ष अनुभव भलीभांति होता है। यह महत्वपूर्ण रहस्य गीता के श्लोक 6/7 में में वर्णित किया गया है।

दूसरे श्लोक में भी परमात्मा की आत्मा में अनुभूति के कुछ अन्य साधन कहे गये हैं। इनमें प्रथम कहा गया है कि हमारा अन्तःकरण सद्ज्ञान से युक्त होना चाहिये। जिस मनुष्य का अन्तःकरण वेद ज्ञान से युक्त नहीं है उसे सर्वत्र व्यापक व जगत को संचालित करने वाले परमात्मा का ज्ञान व अनुभव नहीं होता। ईश्वर का अनुभव तभी होता है जब मनुष्य अपनी सभी ज्ञान व कर्म इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लेता है अर्थात् सभी इन्द्रियां पूरी तरह से उसके वश में हो जाती हैं। ऐसा ज्ञानी पुरुष सोने को भी मिट्टी व पत्थरों के समान समझता है। उसका सुवर्ण में किसी प्रकार का आकर्षण नहीं होता। उसके लिये यह एक मूल्यवान धातु तो होती है परन्तु इसके होने या न होने से उसके मन, चित्त व आत्मा पर कोई अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। मनुष्य व योगाभ्यासी साधक की यह स्थिति आत्मा द्वारा परमात्मा का साक्षात् अनुभव करने की होती है। साधक मनुष्य ईश्वर का अनुभव करता है। वह ईश्वर है और आत्मा के भीतर व बाहर विद्यमान है, वह आत्मा को प्रेरणा व धर्माचरण में उत्साह प्रदान करता है, इसका प्रत्यक्ष अनुभव करता है। गीता के इन दोनों श्लोकों को पढ़कर मनुष्य का आत्मा ईश्वर के प्रति श्रद्धा व निष्ठावान बनता है और उसमें सद्ज्ञान की प्राप्ति एवं सद्कर्मों को करने के प्रति उत्साह उत्पन्न होता है।

हमें अनुभव करते हैं कि गीता के इन दो श्लोकों में यजुर्वेद के मन्त्र ‘ईशा वास्यमिदं सर्वम् यत्किं च जगत्यां जगत्’ अर्थात् ईश्वर जगत के कण-कण में सर्वत्र विद्यमान है, का ही विस्तार किया गया है। गीता में पाये जाने वाले इस प्रकार के श्लोकों के कारण ही गीता अत्यन्त लोकप्रिय ग्रन्थ है। कहा जाता है कि गीता महाभारत युद्ध से पूर्व अर्जुन को विषाद होने पर योगेश्वर श्री कृष्ण द्वारा उसका विशाद दूर करने के लिये दिया गया उपदेश है। ऐसा होना सम्भव व उचित ही है। वैदिक सिद्धान्तों पर दृण विश्वास रखते हुए वेदपथगामी पाठक को गीता के अध्ययन से लाभ होता है। शायद इसी कारण से आर्यसमाज के अनेक विद्वानों ने गीता पर टीकायें लिखी हैं। ऋषि दयानन्द जी ने भी सत्यार्थप्रकाश में गीता के एक-दो श्लोकों को उद्धृत किया है। पुनर्जन्म का भी गीता में बहुत ही प्रभावशाली शब्दों में समर्थन किया गया है। वहां कहा गया है कि जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु अवश्य होती होती है। इसी प्रकार से मृतक जीवात्मा का पुनर्जन्म भी अवश्यम्भावी है। गीता पर पं. तुलसीराम स्वामी, स्वामी समर्पणानन्द जी, डा. सत्यव्रत सिद्धान्तालंकार तथा स्वामी विद्यानन्द विदेह जी आदि विद्वानों की टीकायें उपलब्ध हैं। गीता की महत्ता के कारण ही स्वामी शंकाराचार्य जी ने गीता पर टीका लिखी थी। ऐसा बताया जाता है कि संसार की प्रायः सभी भाषाओं में गीता पर टीकायें उपलब्ध हैं। भारतीय वैदिक व आर्य साहित्य की तुलना में गीता का विश्व में अधिक प्रचार है।

यह वैदिक सिद्धान्त है कि जहां से भी उत्तम विचार प्राप्त होते हैं, उनका हमें ग्रहण कर लेना चाहिये। इस दृष्टि से गीता के कुछ श्लोक निःसन्देह प्रभावशाली होने से ग्राह्य हैं। जहां गीता में कुछ वेदविरुद्ध बातें हैं, उसकी उपेक्षा कर देनी चाहिये। जीवन में एक दो बार तो गीता का अध्ययन कर लेना उपयोगी प्रतीत होता है। इसी के साथ हम इस लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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