कौन जिम्मेदार है मनरेगा के दुर्दशा का

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डाँ०अजय पाण्डेय

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा ) 2005 मे एक विधान के रूप मे लागू किया गया इस योजना के अन्तर्गत ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्यों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गयीं है लेकिन इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि कृषि संकट और आर्थिक मंदी के दौर में मनरेगा ने ग्रामीण किसानों और भूमिहीन मज़दूरों के लिये एक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य किया है। मौजूदा आर्थिक मंदी ने खासतौर पर देश के ग्रामीण क्षेत्रों को प्रभावित किया है और रोज़गार के अवसरों को काफी कम कर दिया है और मनरेगा के तहत मिलने वाले काम की मांग अचानक बढ़ गई है। लेकिन यह भी हकीकत है कि यह योजना ग्रामीणों को रोजगार की पूरी गांरटी नही दे पा रहा है यह योजना कुछ अफसर , नेता और दलालों की तिजोरी भरने की सौ फीसदी पक्की गांरटी देने वाली योजना साबित हो रही है। इसीलिए इस योजना को कामधेनु योजना भी कहा जाने लगा है। भ्रष्टाचार और लूटखसोट की जननी बनी मनरेगा की दुर्दशा पर सरकारी मशीनरी का ढुलमुल रवैया देखकर हाईकोर्ट ने यूपी के हर जिले में मनरेगा की जांच का आदेश भी दिया था। जांच का आदेश होते ही शासन-प्रशासन से लेकर बिचौलियो के बीच हड़कंप मच गया। बहुत सी जांच एजेंसियो का यह भी दावा है कि यदि सही तरीक़े से जांच हो जाय तो भारी भरकम घोटाले की पक्की गांरटी है तथा सैकड़ों ग्रामप्रधान, ग्रामविकास अधिकारी, बीडीओ से लेकर बड़ी तादाद में पीसीएस और आइएएस अफसरों की गर्दन तक नप जायेगी मनरेगा में लूट खसोट किस तरीके से रोकी जाए, और लुटेरों को सजा मिल भी पाएगी या नही यह एक बडा यक्ष प्रश्न बना हुआ है। मनरेगा के धुर विरोधी भी मानते है कि यह योजना घर के पांच किलोमीटर के अंदर समान मजदूरी दर पर काम उपलब्ध कराती है। ऐसे में योजना ने महिलाओं को काम का महत्वपूर्ण अवसर उपलब्ध कराया है और लैंगिक समानता को बढ़ावा दिया है। इसमें महिलाओं की भागीदारी करीब 50 प्रतिशत तक बरकरार रही है। मनरेगा के अभाव में ये महिलाएं बेरोजगार रहतीं है आंकड़ों से स्पष्ट है कि मनरेगा ने पलायन पर भी रोक लगाई है इस योजना में सुधार करते हुए काम करने वालों की कार्य कुशलता की क्षमता को भी विकसित किया जाना चाहिए। इसके माध्यम से समाज के लोगों मे एक संदेश देना चाहिए कि उन्हें दूसरों पर आश्रित रहने की जरूरत नहीं है। हालांकि कार्य क्षेत्र मे हुई जानकारी के आधार पर कई तरह की विसंगतियां और उलझने भी मिली हैं। तालाबों की मशीन द्वारा खुदाई, सडकों पर मशीन द्वारा हो रहे काम, कम बजट वाले कार्यों पर ज्यादे बजट का प्रस्ताव , एक ही कार्य को बार-बार दिखा कर बजट निकालना, गलत बिल बाउचर लगाकर भुगतान लेना आदि बहुत से येसे कारण है जो योजना की मंशा पर पानी फेर रहे है मूलत: भूमिहीन मजदूरो एवं ग्रामीण किसानों के रोजगार के लिए यह योजना चलायी गयीं थी। लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक उदासीनता के कारण मनरेगा के क्रियान्वयन में गिरावट आई है। भुमिहीन मजदूरों की अपेक्षा खेतीहर मजदूर इस योजना का ज्यादा लाभ उठा रहे है लिहाजा भूमिहीन मजदूरों के गांव से पलायन की समस्या बढती जा रही मनरेगा स़िर्फ यूपीए सरकार का ड्रीम प्रोजेक्ट नहीं है जो उसकी राजनीतिक ख्वाहिश को पूरा कर रहा है बल्कि गांवों के मजदूरों आवश्यकता की पूर्ति के लिए तथा गांव से शहरो की तरफ पलायन रोकने का एक आधार है लेकिन दुर्भाग्य है कि गांव में जाबकार्ड धारक तो है लेकिन गुटबाजी के कारण उनको काम ही नही मिलता और कुछ लोग जाबकार्ड होने के बाद भी ज्यादा लोग मनरेगा के तहत काम ही नहीं करना चाहते।कुछ लोग तो अपना जांबकार्ड गांव के प्रधान या ठेकेदार को प्रतिदिन के हिसाब से किराए पर दे देते हैं और घर बैठे ही कमा रहे हैं. ठेकेदार अपने मज़दूरों से कम पैसे देकर काम करा लेता है और बाकी के पैसे खुद रख लेते है तथा जो आवंटन के लिए पैसा तय होता है, उसका भी पूरा भुगतान नहीं होता। यहां मनरेगा के तहत रोजगार पाने वाले लोगों की कुल संख्या के लगभग सात फीसदी मजदूरों को ही सौ दिनों का रोजगार सुनिश्चित किया जाता है पिछले साल यह घट कर 0.6 फीसदी पहुंच गयी। दिनप्रतिदिन कृषि विकास दर गिरती जा रही हैं, उद्योग पहले से नहीं हैं। ऐसे में मनरेगा अगर कारगर होती तो भारी पलायन का नतीजा देखने को नही मिलता इसलिए मनरेगा योजना को यदि सुचारू रूप से चलाया जाय तो रोजगार का सृजन भी होगा तथा गांवो से शहरो की तरफ हो रहा भारी मात्रा मे पलायन भी रूकेगा।

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