कोरोना से दुनिया की लड़ाई : करुणा व कारोबार दोनों का प्रदत्त अवसर

डॉ वीरेंद्र सिंह चौहान

‘हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन’ दशकों पहले खोजी गई वह साधारण और प्रचुर मात्रा में सुलभ दवा है जिसका इस्तेमाल हाल ही तक मलेरिया सहित कुछ अन्य रोगों में हो रहा था। मगर समूचे भूमंडल पर मौत का घना साया बनकर मंडरा रहे कोरोना रूपी दैत्य ने इस दवा को यकायक दवाओं की क्वीन या कहिए कि महारानी बना दिया है। वर्तमान आपात स्थितियों में हुए सीमित प्रारंभिक शोध के आधार पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस औषधि के बारे में बीते माह सार्वजनिक रूप से यह ऐलान कर डाला था कि एक अन्य औषधि के साथ मिलकर कोरोना के मरीजों को बचाने के मामले में यह दवा औषधियों की दुनिया में एक बड़े ‘गेम-चेंजर’ की भूमिका अदा कर सकती है। तमाम घरेलू और अंतरराष्ट्रीय आलोचनाओं को दरकिनार करते हुए अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) ने कोविड-19 के अस्पतालों में दाखिल मरीजों को यह दवा किए जाने के संबंध में आवश्यक आधिकारिक निर्देश जारी करने में देरी नहीं की। इसके बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने दो बार इस दवा के सबसे बड़े वैश्विक उत्पादक भारत के प्रधानमंत्री को फोन कर अमेरिका और अमेरिकियों के लिए इस दवा के निर्यात के दरवाजे खोलने के लिए अनुरोध कर डाला। इस अनुरोध को भारत में सहजता से स्वीकार भी कर लिया। उधर, ब्राजील के राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन कर इस दवा को संजीवनी बूटी का नाम दे डाला। कुल मिलाकर यह कहना गलत नहीं होगा कि हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन जिसे संक्षेप में एचसीक्यू कहकर पुकारा जा रहा है,फिलहाल कोरोनारोधी संग्राम में एक बड़ी भूमिका में खड़ी है।

ऐसे में इस औषधि पर उसकी उपयोगिता व प्रभावोत्पादकता से लेकर हम भारतीयों के लिए इसकी उपलब्धता व सुलभता और इसके निर्यात से जुड़े विभिन्न पक्षों पर भारत में सियासत ना हो ऐसा संभव नहीं। कोरोना संकट के दृष्टिगत सारी दुनिया के घटनाचक्र पर प्रतिपल पैनी निगाह रख हर संभव रणनीति बना रही भारत सरकार ने हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन या एचसीक्यू की वैश्विक मांग बढ़ने और स्वदेश में ही इसकी संभावित आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए पहला तर्कपूर्ण कदम इस दवा के निर्यात पर प्रतिबंध लगा कर उठाया था। इसके साथ ही संबंधित केंद्रीय एजेंसियों ने कोरोना के मरीजों को या संदिग्ध मरीजों में इस दवा के उपयोग को लेकर आपाधापी न मचे, यह सुनिश्चित करने के लिए समय रहते आवश्यक दिशा निर्देश जारी कर दिए थे। मसलन, आईसीएमआर ने इसे विशेष परिस्थितियों में और केवल डॉक्टर की सलाह पर ही इस्तेमाल होने वाली औषधियों की श्रेणी में डालने की सिफारिश कर दी थी। इसी क्रम में देश भर के चिकित्सकों और आमजन को विधिवत यह भी बताया गया कि किसी भी सूरत में कोरोना के लिए यह दवा डॉक्टर की सलाह के बिना नहीं लेनी चाहिए और यह भी कि हृदय रोगियों के लिए इसका उपयोग घातक हो सकता है।
जब यह सब हो रहा था ठीक उसी समय सरकारी एजेंसियां भारत में इस दवा की उत्पादन क्षमता, उसके उत्पादन में काम आने वाले एक्टिव फार्माक्यूटिकल इनग्रेडिएंट (एपीआई) की उपलब्धता और वर्तमान में इसकी आवश्यकता के साथ-साथ भविष्य में संभावित मांग से निपटने की तैयारी की समीक्षा भी कर रही थी। अपने घर में जमीनी स्थितियों की समीक्षा करने के बाद भारत की सरकारी मशीनरी इस निष्कर्ष पर सहज ही पहुंच गई थी कि कल तक सस्ती और सहज सुलभ दिखने वाली जो दवा आज एकाएक दवाओं की ‘क्वीन’ बनने की कगार पर आ खड़ी हुई है, भारत में संप्रति उसकी स्वदेशी खपत के साथ-साथ वैश्विक मांग को पूरा करने का भी सामर्थ्य है।
इंडियन फार्मास्यूटिकल अलायंस के सेक्रेटरी जनरल सुदर्शन जैन को यह कहते हुए उद्धृत किया गया है कि भारत विश्व में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के उत्पादन का लगभग 70 फ़ीसदी अकेला तैयार करता है।अमेरिका में इस दवा की सहज सामान्य खपत का करीब 47% भारत उपलब्ध करवाता रहा है। भारत में इसकी निर्मात्री छोटी-बड़ी कंपनियां अपनी वर्तमान उत्पादन क्षमताओं के दम पर और आवश्यकता पड़ने पर उनके विस्तार के सहारे भी, हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की देशी-विदेशी खपत के अनुसार आपूर्ति करने की स्थिति में हैं।
मगर जैसे ही केंद्र सरकार ने अमेरिका, ब्राजील और श्रीलंका सहित विभिन्न देशों की जरूरतों के मद्देनजर इसके निर्यात पर एहतियातन लगाए गए प्रतिबंध में तर्कपूर्ण छूट दी, तथ्यों की पड़ताल किए बिना नकारात्मक सियासत करने वाले फीता लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 56 इंच वाले सीने का नाप लेने निकल पड़े। किसी ने कहा कि प्रधानमंत्री ने देश के साथ तो किसी ने कहा देश की कोरोनावायरस मरीजों के साथ धोखा किया है। सब कुछ जानते हुए भी कांग्रेस ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से इस आशय के हैश टैग के साथ सोशल मीडिया पर खूब शोरगुल किया।
प्रजातंत्र में सवाल खड़े करने का सबको अधिकार है परंतु बेतुके सवाल उछाल कर इन लोगों ने खुद अपनी किरकिरी करवाई है। भारत में इस दवा का उत्पादन एवं विपणन करने वाली कंपनियों के आला अधिकारियों को मीडिया में आकर यह स्पष्ट करना पड़ा कि दुनिया हमसे हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन मांग रही है तो यह रूदन-क्रंदन का विषय नहीं। अनुमान के अनुसार भारतीय कंपनियां इस माह के अंत तक माह में इस दवाई का उत्पादन मौजूदा दस मीट्रिक टन से बढा कर चालीस मीट्रिक टन करने में समर्थ हैं और उससे अगले माह उसे उसका सत्तर मीट्रिक टन तक भी कर सकती हैं। यह कहना बिलकुल अतिश्योक्ति नहीं होगा कि संकट ने भारत के फार्मा उद्योग को हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन जैसी साधारण दवाई के बहाने विश्व में अपनी पैठ को और प्रभावी बनाने का असाधारण अवसर प्रदान किया है।
यहां यह उल्लेख करना भी उपयोगी रहेगा कि विश्व में जेनेरिक दवाइयों की आपूर्ति में बड़ा खिलाड़ी होने के कारण भारत को विश्व का औषधालय(फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड) कहा जाता है। जब संसार संकट में है और उस संकट से निपटने में मदद करने का सामर्थ्य हमारे फार्मा उद्योग के पास है तो ‘सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया’ की कामना करने वाले राष्ट्र से वैसे भी आत्म केंद्रित और स्वार्थी होने की उम्मीद नहीं की जाती। आने वाले दिनों में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन अपना ‘गेम-चेंजर’, ‘औषधियों की क्वीन’ या ‘संजीवनी बूटी’ वाला दर्जा कायम रख सके अथवा न रख पाए, भारत बेवजह विश्व कल्याण के पुरोधा होने के अपने जगजाहिर सिद्धांत से मुख क्यों मोड़े ? आलोचकों का क्या, उनमें अधिकांश वही हैं जिन्हें भारत के अंतर्निहित सामर्थ्य पर रत्ती भर भरोसा नहीं है। यह वही जमात है जो आंख मूंदकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लगातार विरोध करती आई है और जिसने बारंबार अपने अंध विरोध के कारण तथ्यों वह आंकड़ों के तीखे तीरों से अपनी छाती छलनी करवाई है।

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