मांसाहार की आदत की देन भी हो सकता है यह कोरोना वायरस

ललित गर्ग

हाल के वर्षों में मांसाहार छोड़ने वालों की संख्या भारत ही नहीं दुनिया में बढ़ी है, कोरोना महामारी के कारण इसमें अभूतपूर्व वृद्धि देखने को मिलेगी। जबकि लोगों का शाकाहार अपनाने के लिये कोरोना महामारी से पहले ही रूझान बढ़ने लगा था।
कोरोना महामारी के संकट से मुक्ति के लिये समूची दुनिया की नजरें भारत पर टिकी हैं, भारत की संस्कृति एवं जीवनशैली पर दुनिया का भरोसा बढ़ रहा है। क्योंकि योग, अहिंसा, सह-अस्तित्व, शाकाहार, नैतिकता, संयम आदि जीवन के आधारभूत जीवनमूल्य इसी देश की माटी में रचे-बसे हैं। विशेषतः भारत में जैन धर्म एवं उसका जीवन-दर्शन कोरोना के वर्तमान संकट के दौर में समाधान के रूप में सामने आया है, जैन मुनि मुंह पर पट्टी (मुंहपत्ती) बांधते हैं, जो आज मॉस्क के रूप में समूची दुनिया अंगीकार कर रही है। सामाजिक दूरी (सोशल डिस्टेंसिंग), आइसोलेशन, व क्वारंटीन (एकांत) जैन मुनि एवं साधक के जीवन के अभिन्न अंग आज दुनिया के लिये कोरोना मुक्ति के सशक्त आधार बन रहे हैं। शाकाहार एवं मद्यपान का निषेध भी जैन जीवनशैली के आधार है, जिनका बढ़ता प्रचलन कोरोना महासंकट से मुक्ति का बुनियादी सच है।
कोरोना के कहर के बीच इंसान के खुशहाल जीवन एवं निरोगता के लिये खानपान में बदलाव की स्वर दुनियाभर में सुनाई दे रहे हैं। मांसाहार को लेकर भी नजरिया बदल रहा है, मांसाहार के बुरे नतीजों को लेकर दुनिया चिन्ताग्रस्त एवं सावधान हुई है। ऐसा प्रतीत होता है शाकाहार का प्रचलन तेजी से बढ़ेगा क्योंकि कोविड-19 वायरस भी, जो अभी पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले चुका है, पिछली शताब्दी में फैली कई महामारियों की तरह इसी मांसाहार की आदत की ही देन है। आप किसी के साथ गलत करेंगे तो कोई आपके साथ भी बुरा करेगा। मांसाहार एक बुरी आदत है जिसका बुरा नतीजा ही निकलता है।
हाल के वर्षों में मांसाहार छोड़ने वालों की संख्या भारत ही नहीं दुनिया में बढ़ी है, कोरोना महामारी के कारण इसमें अभूतपूर्व वृद्धि देखने को मिलेगी। जबकि लोगों का शाकाहार अपनाने के लिये कोरोना महामारी से पहले ही रूझान बढ़ने लगा था। ग्लोबल रिसर्च कंपनी इप्सोस के कराये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार कोरोना महामारी से पहले ही 63 प्रतिशत भारतीय अपने भोजन में मांसाहार के स्थान पर शाकाहार को अपनाने लगे थे, अमरीका में डेढ़ करोड़ व्यक्ति शाकाहारी बन चुके थे। दस वर्ष पूर्व नीदरलैंड की डेढ़ प्रतिशत आबादी शाकाहारी थी जबकि वर्तमान में वहाँ पांच प्रतिशत व्यक्ति शाकाहारी हैं। सुप्रसिद्ध गैलप मतगणना के अनुसार इंग्लैंड में प्रति सप्ताह तीन हजार व्यक्ति शाकाहारी बन रहे थे। वहाँ कोरोना से पहले पच्चीस लाख से अधिक व्यक्ति शाकाहारी बन चुके थे। बढ़ती बीमारियों के कारण जीवन की कम होती सांसों ने इंसान को शाकाहार अपनाने के लिये विवश किया और अब कोरोना महामारी का बड़ा सत्य यही है कि शाकाहार एक उन्नत जीवनशैली है, निरापद खानपान है, स्वस्थ जीवन का आधार है। न केवल बुद्धिजीवी बल्कि आम व्यक्ति भी अब शाकाहारी जीवन प्रणाली को अधिक आधुनिक, प्रगतिशील और वैज्ञानिक मानने लगे हैं एवं अपने आपको शाकाहारी कहने में प्रगतिशील व्यक्ति होने का गर्व महसूस करते हैं। कोरोना ने तो उनकी सोच को और अधिक पुष्ट कर दिया है।
विश्वभर के डॉक्टरों ने कोरोना के दौर में शाकाहारी भोजन को ही उत्तम स्वास्थ्य के लिए सर्वश्रेष्ठ माना है। फल-फूल, सब्जी, विभिन्न प्रकार की दालें, बीज एवं दूध से बने पदार्थों आदि से मिलकर बना हुआ संतुलित आहार भोजन में कोई भी जहरीले तत्व नहीं पैदा करता एवं कोरोना के वायरस से लड़ने में सक्षम बनाता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि जब कोई जानवर मारा जाता है तो वह मृत-पदार्थ बनता है। यह बात सब्जी के साथ लागू नहीं होती। यदि किसी सब्जी को आधा काट दिया जाए और आधा काटकर जमीन में गाड़ दिया जाए तो वह पुनः सब्जी के पेड़ के रूप में उत्पन्न हो जाएगी। क्योंकि वह एक जीवित पदार्थ है। लेकिन यह बात एक भेड़, मेमने या मुरगे के लिए नहीं कही जा सकती।
अन्य विशिष्ट खोजों के द्वारा यह भी पता चला है कि जब किसी जानवर को मारा जाता है तब वह इतना भयभीत हो जाता है कि भय से उत्पन्न जहरीले तत्व उसके सारे शरीर में फैल जाते हैं और वे जहरीले तत्व मांस के रूप में उन व्यक्तियों के शरीर में पहुँचते हैं, जो उन्हें खाते हैं और ऐसे लोग कोरोना के भय से अधिक ग्रस्त होते हैं, उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है। हमारा शरीर उन जहरीले तत्वों को पूर्णतया निकालने में सामर्थ्यवान नहीं हैं। नतीजा यह होता है कि उच्च रक्तचाप, दिल व गुरदे आदि की बीमारी मांसाहारियों को जल्दी आक्रांत करती है। इसलिए कोरोना महामारी पर नियंत्रण पाने के लिये यह नितांत आवश्यक है कि स्वास्थ्य की दृष्टि से हम पूर्णतया शाकाहारी रहें। प्रकृति ने मनुष्य को स्वभाव से ही शाकाहारी बनाया है। कोई भी श्रमजीवी मांसाहार नहीं करता, चाहे वह घोड़ा हो या ऊँट, बैल हो या हाथी। फिर मनुष्य ही अपने स्वभाव के विपरीत मांसाहार कर संसार भर की बीमारियां, विकृतियां एवं कोरोना महामारी को पनपने का खतरा क्यों मोल ले रहा है ?
मयामी यूनिवर्सिटी में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर एवं ‘फिलॉस्फर एंड द वुल्फ’ और ‘एनिमल्स लाइक अस’ जैसी पुस्तकों के लेखक मार्क रौलैंड्स चेतना और पशु अधिकारों संबंधी अपने शोध के माध्यम से दुनिया को चेताया है कि मांसाहार कोरोना महामारी से भी अधिक बुरे नतीजे ला सकता है। वे कहते हैं कि मुझे लगता है, लोगों को समझाने की जरूरत है कि मांसाहार से उन्होंने अपना कितना नुकसान कर लिया है। यह न केवल हृदय संबंधी बीमारियां, कैंसर, डायबिटीज और मोटापा बढ़ा रहा है बल्कि पर्यावरण संबंधी कई समस्याएं भी पैदा कर रहा है, जिन्हें हम महसूस कर रहे हैं। मांसाहार के कारण बड़े पैमाने पर जंगल काटे जा रहे हैं और पृथ्वी के लिए एक बड़ा संकट खड़ा हो रहा है।
मांसाहार से तामसी वृतियां पैदा होती हैं जो इंसान को क्रूर और हिंसक बनाता है, उसके शरीर की रोग-निरोधक क्षमता को कम कर उसे कोरोना महारोग, रक्तचाप तथा हृदय रोग जैसी दुसाध्य बीमारी से ग्रस्त करता है, उसके श्वास और पसीने को दुगुर्ण युक्त बनाता है। उसके मन में काम, क्रोध और प्रमाद जैसे दुगुर्ण उत्पन्न करता है। कहा भी है जैसा खाए अन्न, वैसा होए मन। मांसाहार के लिए कटने वाले प्राणी की आंखों में जो भय और त्रास होता है, वह उसके रक्त में मिलकर सामिषभोजी की धमनियों तक पहुंचता है और उसे भीरू बनाता है, क्रूर एवं आतंकी बनता है। उसके आत्मबल का हृास करता है।
आज विश्व में कोरोना महामारी सबसे बड़ी समस्या है, चारों ओर इस महारोग के संक्रमण के बादल उमड़ रहे हैं। उन्हें यदि रोका जा सकता हैं तो केवल मनुष्य के स्वभाव को संयम और शाकाहार की ओर प्रवृत्त करने से ही। पिछले कुछ सालों में जब से नए शोधों ने यह साबित कर दिया कि शाकाहार इंसान के लिए मांसाहार से अधिक सुरक्षित और निरापद है तब से पश्चिमी देशों में शाकाहारियों की एक बड़ी तादाद देखने में आ रही है। इतना ही नहीं लोगों को यह भी समझ में बखूबी आने लगा है कि मांसाहार महज बीमारियों की वजह नहीं है बल्कि स्वस्थ जीवन, शांति, पर्यावरण, कृषि, नैतिकता और मानव-मूल्यों के विपरीत है। यह अर्थव्यवस्था के लिए भी नकारात्मक है। पश्चिम में शाकाहारी होना आधुनिकता पर्याय बन गया है। कोरोना महामारी के खिलाफ जिन चीजों को आधारभूत माना जा रहा है, उनमें शाकाहार सबसे प्रमुख है। आए दिन लोग खुद को शाकाहारी घोषित कर इस नए चलन के अगुवा बताने में गर्व अनुभव करते देखे जा सकते हैं। पश्चिमी दर्शनों की विचारधारा, जो कभी मांसाहार को सबसे मुफीद मानती थी वही दर्शनों की धारा अब शाकाहार की ओर रुख करने लगी है। यह कई नजरिए से शाकाहार के हक में एवं कोरोना मुक्ति की दिशा में एक अच्छा संकेत कहा जाना चाहिए।

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