बिखरे मोती — भाग 315 मनुष्य को भेड़िया प्रवृत्ति को करना चाहिए समाप्त

भेड़िया प्रवृत्ति:- दूसरों के हक़ को छीन कर खाना भेडिया-प्रवृत्ति कहलाती है। भेड़िया एक हिंसक और खूंखार पशु है,जो अपनों से कमजोर बशर का हक़ छीनकर खाता है।इसके लिए वह उन पर प्राणघातक हमला करता है और दूसरों के हक़ को क्रूरता और निर्लज्जता से खाता है। जीवन भर वह दूसरों के खून का प्यासा रहता है। ठीक इसी तरह के लोग समाज में भी होते हैं,जो दूसरों की जमीन- ज़ायदाद पर अनाधिकृत रूप से कब्जा करते हैं,राहजनी करते हैं,चोरी-डकैती करते हैं, गैंगरेप करते हैं , दरिंदगी की सीमाओं को लांघ जाते हैं। ऐसे जघन्यतम अपराध करते हैं कि देखने और सुनने पर रोंगटे खड़े हो जाते हैं,रूह कांप जाती है । यह भेडिया-प्रवृत्ति ऐसे मनुष्यों को जन्म – जन्मांतरों तक घोर नरक में पहुंचाती है। अतः मनुष्य को भेड़िया- प्रवृत्ति को सर्वदा समूल नष्ट करना चाहिए और ऋजुता में वृद्धि करनी चाहिए ताकि मनुष्य स्वर्गगामी बन सके ।

कुत्ता प्रवृत्ति :- कुत्ता ऐसा पशु है, जो अपने स्वामी के प्रति वफादार होता है , किंतु अपने भाइयों (अन्य कुक्तों) के लिए जीवन भर बैर में जीता है। उनके लिए उसका हृदय जीवन भर ईर्ष्या और क्रोध से भरा रहता है। वह अपने भाइयों (कुत्तों) को देखकर गुर्राता है, भौंकता है,ऐसा करते-करते कभी-कभी तो लहूलुहान हो जाता है। ठीक इसी मानसिकता में जीवन जीने वाले लोग समाज में भी होते हैं, जो जीवन भर गैरों को देखकर तो दुम हिलाते हैं , किंतु निज भाई को देख कर गुर्राते हैं, लहूलुहान होते हैं और जीवन भर बैर, क्रोध और ईर्ष्या में जीवन जीते हैं। ऐसे लोगों का जीवन एक – दूसरे के प्रति षड्यंत्र रचने और नीचा दिखाने में बीतता है,कोर्ट – कचहरी और थानों के चक्कर लगाने में बीतता है। इनकी कमाई को डॉक्टर,वकील और पुलिस वाले खाते हैं और एक दिन ऐसा आता है कि पारस्परिक विद्वेष के कारण उन्हें दरिद्रता और कंगाली घेर लेती है । सद्भाव दुर्भावना में परिणत होता चला जाता है। देखते ही देखते मनुष्य अपराध जगत में चला जाता है। अतः कुत्ते प्रवृत्ति के दुष्परिणामों से बचने के लिए इसका शमन करना नितांत आवश्यक है।

उपरोक्त विश्लेषण का सारांश यह है कि इन छ: पाशविक प्रवृत्तियों पर मनुष्य को सर्वदा नियंत्रण रखना चाहिए , ताकि उसकी जीवनरूपी खेती सुरक्षित रहे, सुरभित रहे, पुष्पित और पोषित रहे,मनुष्य का जीवन सफल और सार्थक बने।

ध्यान रखो,आत्म कल्याण और लोक कल्याण के लिए जीवन जीने की पद्धति बताता हुआ हमारा प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद सरल शब्दों में कहता है- हे मनुष्यो! तुम पशुत्व को बलि चढ़ाओ और चेतना को जगाओ अर्थात् आत्मा को जगाओ।

प्रोफेसर विजेंद्र सिंह आर्य

मुख्य संरक्षक : उगता भारत

क्रमशः

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