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विशेष संपादकीय

राजा ,राजनीति और राजधर्म: क्या कहती है भारतीय इतिहास परंपरा ?

राजा उत्तम है वही , निभाता जो निज धर्म ।

राजनीति उसको कहें जो समझे अपना धर्म ।।

आज हमारे देश में ऐसे बहुत से लोग हैं जो राजा ( आज के संदर्भ में जनप्रतिनिधि ) राजनीति से और शासक वर्ग के राजधर्म से घृणा करते हैं , या उनके प्रति उदासीन भाव रखते हैं । ऐसे भी अनेकों लोग हैं जो राजनीति को वेश्या समझकर उसकी ओर देखना तक उचित नहीं मानते । इनके लिए राजा , राजनीति और राजधर्म यह सभी छोटे और ओच्छे लोगों के कार्य बनकर रह गये हैं । जो लोग राजा , राजनीति और राजधर्म के विषय में ऐसा सोचते हैं , वह किसी सीमा तक उचित भी सोचते हैं । क्योंकि इस समय ‘राजा ‘ जिस प्रकार की राजनीति और राजधर्म का निर्वाह कर रहा है , उससे नहीं लगता कि यह तीनों शब्द ही हमारे देश में कभी बहुत पवित्र माने जाते रहे होंगे । राजा , राजनीति और राजधर्म के सन्दर्भ में भारतीय बौद्धिक परम्परा में इन तीनों का बहुत ही पवित्र और सार्थक अर्थ है ।

जहां तक राजधर्म की बात है तो इसका अर्थ ‘राजा का धर्म’ या ‘राजा के पवित्र कर्तव्य कर्म’ से लिया जाता है। वस्तुत: राजनीति अपने आप में एक पवित्र संस्था है । इसे आप व्यवस्थापिका भी कह सकते हैं । इसे आप समाज की मार्गदर्शिका भी कह सकते हैं । क्योंकि इसका उद्देश्य समाज में शांति व्यवस्था स्थापित करने के लिए व्यवस्था प्रदान करना ही नहीं है , अपितु यह मानव के मन मस्तिष्क में उन सुविचारों का आधान करने वाली भी है जिनसे संसार में शांति व्यवस्था बनी रहे और प्रत्येक मनुष्य की स्वतंत्रता अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए ऐसी परिस्थितियां बनी रहें कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने मानसिक , शारीरिक और आत्मिक विकास के सभी अवसर सहज उपलब्ध होते रहें।

भारत का राजधर्म अनोखा है

अनोखा भारत देश है, अनोखा इसका धर्म ।

राजधर्म सबसे बड़ा , निष्पन्न करे शुभ कर्म ।।

जब राजनीति अपने इस कर्तव्य कर्म को व्यावहारिक स्वरूप प्रदान करती है तो उसके लिए यह राजधर्म बन जाता है । राजा यदि अपने आप में विवेक है तो राजनीति अपने आप में वैराग्य है और राजधर्म स्वयं में एक भक्ति है । राजा के विवेक से, राजनीति के वैराग्य से और राजधर्म की भक्ति से ही कोई समाज उन्नत समाज बन सकता है । ऐसा समाज ही गर्वोन्नत होकर संसार में खड़ा हो सकता है। विवेक , वैराग्य और भक्ति की इसी त्रिवेणी में स्नान करके कोई भी देश पवित्र होकर विश्व के लिए मार्गदर्शक बन सकता है , ‘विश्वगुरु’ बन सकता है ।

यद्यपि विवेक , वैराग्य और भक्ति भारत में कुछ लोगों के लिए अध्यात्म क्षेत्र के विषय हो सकते हैं । परंतु सच यही है कि इन्हें राजा , राजधर्म और राजनीति की पवित्रता के साथ समायोजित करके देखने से भी भारतीय अध्यात्म के उस दिव्य स्वरूप की अनुभूति या झलक मिल सकती है , जिसका अपने मौलिक स्वरूप में व्यष्टि से समष्टि तक का कल्याण करना उद्देश्य है । भारत में इसी विद्या का नाम राज़धर्म रखा गया है। भारत के इसी राजधर्म के चलते हमारे देश में ऐसे लोगों को ही राजनीति में लाया जाता था जो लोक कल्याण को अपने जीवन का परमोद्देश्य घोषित करते थे । स्वार्थभाव से प्रेरित होकर राजनीति में आना आज के राजनीतिक लोगों का शौक हो सकता है , परंतु प्राचीन भारत में राजधर्म का निर्वाह बड़ी पवित्रता के साथ किया जाता था । इसके निर्वाह करने में राजा अपना सौभाग्य समझता था। सच्चे हृदय व नि:स्वार्थ भाव से वह मानव मात्र की ही नहीं , प्राणी मात्र की भी पूर्ण तन्मयता से सेवा करता था , ऐसा राजधर्म संसार के किसी अन्य देश में खोजा जाना संभव नहीं है।

भारत के राजधर्म को मूल रूप से वेदों से प्रेरणा मिलती है । न्याय , नीति , धर्म , विवेक, वैराग्य और भक्ति का महासागर वेदों के भीतर है । मनुष्य जितना ही इस महासागर को मथता है , उतना ही उसे लाभ होता जाता है । वह एक से एक मूल्यवान मोती ले लेकर बाहर आता है। इसी मंथन की प्रक्रिया से उसे एक दिन ‘अमृत’ भी मिल जाता है । जिसे पाकर वह मोक्ष का अधिकारी बन जाता है । भारत का राजा , राजनीति और राजधर्म मनुष्य के लिए वही स्थितियां परिस्थितियां और अवसर उपलब्ध करा देना चाहते हैं जिनसे प्रत्येक व्यक्ति मोक्ष का अभिलाषी ही न बने अपितु उसे प्राप्त करने वाला भी बने ।

वेदों के पश्चात कई ऐसे ग्रंथ हैं जिनमें साधारण मनुष्य के लिए और राजा के लिए उनके धर्म का उल्लेख किया गया है। भारत के इन आर्षग्रंथों में हम मनुस्मृति, शुक्रनीति, महाभारत के विदुर प्रजागर तथा शान्तिपर्व तथा चाणक्य द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रन्थ अर्थशास्त्र आदि को सम्मिलित कर सकते हैं ।

इन ग्रंथों का दोहन कर देश , काल व परिस्थिति के अनुकूल अपने अमर ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में स्वामी दयानन्द सरस्वती जी महाराज ने भी एक पूरा समुल्लास राजधर्म पर लिखा है। इस समुल्लास के माध्यम से स्वामी दयानंद जी महाराज ने भारत के राजधर्म के वास्तविक मूल्यों का चित्रण करने का प्रयास किया है । जिससे वर्तमान समाज व संसार को भी यह पता लग सके कि प्राचीन भारत में राजधर्म लोककल्याण की कामना में रत रहता था ?

महाभारत में राजधर्म

महाभारत है इतिहास हमारा

सनातन सत्य धर्म का ध्वजवाहक ।

हर पृष्ठ हमें इसका बतलाता

है यह वेद ज्ञान का संवाहक ।।

राष्ट्रवाद के महान गुणों को

बीज रूप में हम बिखरा पाते ।

राजनीति की अबूझ पहेली के

इसमें सारे हम उत्तर पाते ।।

स्वतंत्रता के उपरांत भारतवर्ष में कुछ षड़यंत्रकारी इतिहास लेखकों ने भारत के रामायण और महाभारत को इतिहास मानने से इनकार कर दिया । इन्हें धार्मिक पुस्तक कहकर पढ़ाने से भी यह कहकर इंकार कर दिया गया कि इनके पढ़ाने से देश में सांप्रदायिक शिक्षा को प्रोत्साहन मिलेगा और मानव समाज का सांस्कृतिक विकास न होकर सांप्रदायिक विकास होगा । इस मूर्खतापूर्ण और देशद्रोह से भरी हुई सोच को हमारे देश की सरकारों ने मान्यता दी ।उसका परिणाम यह निकला कि महाभारत और रामायण जैसे ग्रंथ आज शिक्षा पाठ्यक्रम से पूर्णतया दूर कर दिए गए हैं। जबकि इन ग्रंथों को भारतवर्ष के इतिहास की पुस्तकों में सम्मिलित किया जाना चाहिए था , साथ ही उनकी नैतिक और मानवीय शिक्षाओं को भी पाठ्यक्रम में सम्मिलित कराया जाता। महाभारत में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को राजधर्म का उपदेश देते हुए बहुत सुंदर बातें कही हैं।

भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को राजा के लिए अपने आचरण में अपनाने हेतु कुछ गुणों को अनिवार्य माना है। ये गुण निम्नवत हैं :-

— भीष्म युधिष्ठिर को राजधर्म का पाठ पढ़ाते हुए कहते हैं कि राजा स्वधर्मों का (राजकीय कार्यों के संपादन हेतु नियत कर्तव्यों और दायित्वों का न्यायपूर्वक निर्वाह) आचरण करे, परंतु जीवन में कटुता न आने दें।

— राजा को एक ऐसी अखंड सत्ता में अपना विश्वास बनाए रखना चाहिए जो इस संसार की उत्पत्ति का कारण है । उसे अपने विचारों से भगवान के प्रति आस्थावान होना चाहिए । जिससे उसके अंदर अहंकार का भाव उत्पन्न नहीं होगा और वह ईश्वर की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने का कार्य ईमानदारी से कर सकेगा । राजा को आस्तिक होना चाहिए। आस्तिक रहते हुए दूसरे के साथ प्रेम का व्यवहार न छोड़ें ।

— राजा को विनम्र और उदार भाव के साथ अपने राज कार्यों का संचालन करना चाहिए । राज कार्यों के कुशल संचालन के लिए राजा को चाहिए कि क्रूरता का व्यवहार न करते हुए प्रजा से अर्थ संग्रह करे।

— राजा के लिए यह अपेक्षित है कि वह कर संग्रह के लिए निर्धारित मर्यादाओं का उल्लंघन न करते हुए प्रजा से कर संग्रह करे ।

— अपनी जनता के साथ संवाद करते समय राजा को चाहिए कि वह दीनता न दिखाते हुए ही प्रिय भाषण करे।

— देश की जनता में शूरवीरता का संचार किए रखने के लिए राजा स्वयं शूरवीर बने , परंतु बढ़ – चढ़कर बातें न करे। इसका अर्थ है कि राजा को मितभाषी और शूरवीर होना चाहिए।

— राजा को दानशील होना चाहिए । जिससे समाज में विज्ञान ,कला , साहित्य , न्याय और शिक्षा के कार्य में लगे लोगों को उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समय-समय पर राजा का अनुग्रह प्राप्त होता रहे और वे दान आदि लेकर अपनी कला का विकास करते रहें या जनसेवा के अपने महान कार्य का संपादन सुचारू रूप से करते रहें। इसके लिए आवश्यक है कि राजा दानशील हो, परंतु यह ध्यान रखे कि दान अपात्रों को न मिले।

— राजा का साहस जनता में किसी भी राष्ट्रद्रोही के विरुद्ध उसे अंकुश लगाने के लिए प्रेरित करता रहता है। इसीलिए भीष्म युधिष्ठिर को बताते हैं कि राजा साहसी हो, परंतु उसका साहस निष्ठुर न होने पाए।

— राजा के लिए यह भी एक मर्यादा स्थापित की गई है कि वह दुष्ट लोगों के साथ कभी मेल-मिलाप न करे, अर्थात राष्ट्रद्रोही व समाजद्रोही लोगों को कभी संरक्षण न दे।

— महाभारत का युद्ध दुर्योधन के इस कुविचार के कारण हुआ कि वह निज बन्धु – बांधवों से ही लड़ाई झगड़ा करने लगा । जिससे कुल नाश तो हुआ ही साथ ही साथ राष्ट्र को भी उससे भारी हानि उठानी पड़ी । इसी विचार को दृष्टि में रखते हुए पितामह भीष्म के द्वारा राजा के लिए यह भी अनिवार्य किया गया कि वह बन्धु – बांधवों के साथ कभी लड़ाई झगड़ा न करे।

— वर्त्तमान में नौकरी के लिए निर्धारित एक प्रक्रिया को पूर्ण कर कई बार ऐसे लोग गुप्तचरी जैसे महत्वपूर्ण कार्य में नियुक्त हो जाते हैं जो देश के लिए हानि पहुंचाने का कार्य करते हैं । जबकि भारत के राजधर्म में ऐसे महत्वपूर्ण दायित्वों के निर्वाह के लिए राजा से यह अपेक्षा की गई है कि जो राजभक्त न हों ऐसे भ्रष्ट और निकृष्ट लोगों से कभी भी गुप्तचरी का कार्य न कराये।

— भीष्म पितामह धर्मराज युधिष्ठिर को समझा रहे हैं कि राजा को चाहिए कि वह किसी को पीड़ा पहुंचाए बिना ही अपना काम करता रहे।

— जो लोग अविश्वसनीय हैं और देश के जनसाधारण को अपने दुष्ट कार्यों से किसी न किसी प्रकार से उत्पीड़ित करते रहते हैं , ऐसे लोगों से सावधान करते हुए पितामह भीष्म धर्मराज युधिष्ठिर से कह रहे हैं कि राजा दुष्टों को अपना अभीष्ट कार्य कभी न कहे , अर्थात उन्हें अपनी गुप्त योजनाओं की जानकारी कभी न दे।

— जो राजा अपने गुणों का स्वयं बखान करने लगता है वह शेखी बघारने वाला कहा जाता है । इस प्रकार के आचरण से राजा की गरिमा का हनन होता है । इसीलिए भीष्म ने आगे कहा कि राजा अपने गुणों का स्वयं ही बखान न करे।

— जो राजा अपने श्रेष्ठजनों से उनका अधिकार या धन छीनने लगता है , वह लोकशांति को भंग कर अराजकता को उत्पन्न करने वाला होता है । ऐसी अराजकता से बड़े-बड़े विनाशकारी महायुद्ध होते हैं , और जनधन की भारी हानि होती है । इसी बात को दृष्टिगत रखते हुए पितामह भीष्म ने युधिष्ठिर को समझाया कि राजा श्रेष्ठ पुरुषों (किसानों) से उनका धन (भूमि) न छीने।

— कभी-कभी अपने मनोरथ की पूर्ति के लिए बड़े लोग भी नीच पुरुषों का सहारा ले लेते हैं , परंतु यह नीच लोग कालांतर में जब अपने उपकार का प्रतिकार चाहते हैं तो ऐसे बड़े लोगों को या किसी राजा को प्रतिकार में ऐसा कुछ भी देना या करना पड़ जाता है जो न्यायोचित या धर्मसंगत न हो । इसीलिए राजा से यह अपेक्षा की गई है कि वह नीच पुरुषों का आश्रय न ले, अर्थात अपने मनोरथ की पूर्ति के लिए कभी नीच लोगों का सहारा न लें, अन्यथा देर सबेर उनके उपकार का प्रतिकार अपने सिद्घांतों की बलि चढ़ाकर देना पड़ सकता है।

— न्याय करते समय न्याय के सभी सिद्धांतों को अपनाते हुए पूर्ण समीक्षात्मक बुद्धि का परिचय राजा को देना चाहिए । उसमें किसी भी प्रकार का आवेश यदि सम्मिलित हो जाता है तो वह अन्याय भी करा सकता है । इसीलिए भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को यह भी बताया कि उचित जांच पड़ताल किये बिना (क्षणिक आवेश में आकर) किसी व्यक्ति को कभी भी दंडित न करे।

आवेश नहीं जिस न्याय में होता

न्याय वही कहलाता है ।

समीक्षात्मक हो सोच भूप की

न्यायाधीश वही बन पाता है ।।

आवेश गला न्याय का घोटे

नहीं सही निष्कर्ष निकल पाता ।

न्याय का हत्यारा हो जाता राजा

लोक में सम्मान नहीं पाता ।।

— राजा को अपने गुप्त निर्णयों की गोपनीयता को कभी भी भंग नहीं करना चाहिए , अन्यथा उसके निर्णय उपहास का पात्र बन सकते हैं । इसलिए यह कहा गया कि राजा अपने लोगों से हुई अपनी गुप्त मंत्रणा को कभी भी प्रकट न करे।

— जनसाधारण में ऐसे लोग भी होते हैं जो लोभी होते हैं और अनावश्यक धन संग्रह करते रहते हैं । स्पष्ट है कि ऐसा धन संग्रह किसी न किसी के अधिकारों का हनन करके ही किया जाता है । इससे समाज में अपरिग्रह और अस्तेय जैसे मानवीय गुणों का हनन होता है ।समाज में एक दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण करने की दुष्ट भावना का प्रचार व प्रसार होता है । यही कारण है कि राजा से यह भी अपेक्षा भीष्म पितामह कर रहे हैं कि वह लोभियों को धन न दे।

— उपकार के बदले अपकार करने वाले लोग कभी भी विश्वास योग्य नहीं हो सकते । उनसे राजा को सदैव सावधान रहना चाहिए ।धर्मराज युधिष्ठिर को भीष्म पितामह कह रहे हैं कि जिन्होंने कभी अपकार किया हो, उन पर राजा कभी विश्वास न करें।

— नारी के प्रति राजा का ईर्ष्यालु स्वभाव बहुत ही खतरनाक होता है । भीष्म पितामह धर्मराज युधिष्ठिर को कह रहे हैं कि राजा स्त्री के प्रति ईर्ष्यालु न रहे । साथ ही यह भी कह रहे हैं कि राजा के लिए स्त्री का अधिक सेवन करना अच्छा नहीं है । उसे आत्म संयमी होना चाहिए । जितेंद्रिय राजा ही काम व क्रोध से उत्पन्न स्वयं के और अपनी प्रजा के दोषों का शमन कर सकता है ।इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि राजा आत्म संयमी व जितेंद्रिय हो । जितेंद्रियत्व के गुण से राजा के भीतर शुद्धता में वृद्धि होती है, और वह किसी से घृणा नहीं करता है । जब राजा के भीतर ऐसे गुण भरपूर मात्रा में होते हैं , तभी वह सही न्याय कर सकता है और प्रजा की उन्नति में स्वयं सहायक हो सकता है।

— राजा के लिए यह भी आवश्यक है कि वह शुद्ध और स्वादिष्ट भोजन करे । ऋतु के अनुकूल खाने वाला हो और अहितकर भोजन को कभी भूलकर भी ग्रहण न करे ।

— कहा जाता है कि ‘ यथा राजा तथा प्रजा’ – अर्थात जैसा राजा होता है , वैसी प्रजा हो जाती है। अतः राजा से अनेकों मर्यादाओं के पालन करने की अपेक्षा की गई है । उसके लिए पितामह भीष्म यह भी अनिवार्य घोषित कर रहे हैं कि राजा उद्दण्डता छोड़कर विनीत भाव से मानवीय पुरुषों का सदा सम्मान करे।

— गुरुजन हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण सुधार लाते हैं । वह हमारे उद्धारक होते हैं । उन्हीं के संसर्ग और संपर्क में आकर हम द्विज बनते हैं। अतः उनके प्रति सदा कृतज्ञ भाव रखना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है । ऐसा हमारे शास्त्रों का मानना है । यही कारण है कि पितामह भीष्म राजा के लिए यह भी अनिवार्य कर रहे हैं कि वह निष्कपट भाव से गुरूजनों की सेवा करे।

— विद्वान लोग निष्कपट भाव से सदा संसार के कल्याण में रत रहते हैं । यदि उन्हें राजा के यहां जाने पर सम्मान प्राप्त होगा तो वह जनकल्याण की ऐसी अनेकों योजनाओं को लागू करने के लिए राजा को प्रेरित कर सकते हैं जिससे राजा लोकप्रिय बनेगा । जनता की समस्याओं का समाधान हो और उन्हें उचित समय पर न्याय मिले इसलिए आवश्यक है कि राजा दम्भहीन होकर विद्वानों का सत्कार करे, अर्थात विद्वानों को अपने राज्य का गौरव माने।

— भ्रष्टाचार और उत्कोच के द्वारा बड़े – बड़े साम्राज्य का पतन हो जाता है । राजा के राज्य में भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन हो और उत्कोच आदि का कहीं लेश मात्र भी प्रयोग न होता हो , इसी से राष्ट्र महान बनता है । इसीलिए राजा को चाहिए कि वह ईमानदारी से धन पाने की इच्छा करे।

— राजा के भीतर यदि हठ करने या दुराग्रही

होने का दुर्गुण है तो वह उसे तानाशाही प्रवृत्ति का शासक बनाता है । जिससे प्रजाजनों की आवाज उस तक पहुंच नहीं पाती है । भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लग जाने से विद्वान लोग भी उसके समक्ष बोलने से कतराते हैं । इसलिए राजा से यह भी अपेक्षा की गई है कि वह हठ छोड़कर सदा ही प्रीति का पालन करे।

— राजा को अपने धर्म के पालन करने में कार्य कुशल होना चाहिए। उसे अवसर के अनुकूल बोलना और कार्य करना चाहिए । इन दोनों गुणों से वह न केवल अपनी प्रजा में लोकप्रिय बनेगा , अपितु सही समय पर सही निर्णय लेने वाला होकर लोगों को सुशासन देने में भी सफल होगा । अतः राजा कार्यकुशल हो , परंतु अवसर के ज्ञान से शून्य न हो।

— आज के राजनीतिज्ञों का सबसे बड़ा दोष यह है कि वह जनता के लोगों को मिथ्या सांत्वना और भरोसा देने का नाटक करते रहते हैं । कोई भी ऐसा कार्य नहीं करते जिससे जनता में उनके प्रति विश्वास की भावना उत्पन्न हो। फलस्वरूप भारतीय राजनीतिज्ञों के प्रति विश्वास का संकट दिन – प्रतिदिन गहराता जा रहा है । राजा के प्रति प्रजाजनों में पूर्ण विश्वास होना चाहिए ,इस बात को हमारे पूर्वजों ने भली प्रकार अनुभव किया था । यही कारण है कि पितामह भीष्म भी धर्मराज युधिष्ठिर को यह बता रहे हैं कि राजा केवल पिण्ड छुड़ाने के लिए किसी को सांत्वना या विश्वास न दे, अपितु दिये गये विश्वास पर खरा उतरने वाला भी हो।

— राजा को उदारचित्त वाला होना चाहिए । जिस पर वह कृपा करना चाहता है , उसके शुभ कार्य की प्रशंसा तो करे ,परंतु उस पर कोई ऐसा आक्षेप न करे जिससे उसे अपमान अनुभव हो । राजा को उस व्यक्ति के प्रति ऐसा व्यवहार दिखाना चाहिए कि वह इस कृपा का अपने शुभ कार्यों के कारण स्वाभाविक रूप से पात्र है। अतः कहा गया कि राजा किसी पर कृपा करते समय उस पर कोई आक्षेप न करे।

— किसी परिस्थिति व वस्तुस्थिति की सही जानकारी लिए बिना कोई भी कार्य करना नादानी कहलाती है । जिसके परिणाम बहुत ही भयानक आते हैं। राजा अपने राजधर्म का संपादन करते समय बहुत ही सजग और जागरूक रहकर निर्णय ले । निर्णय लेने में चाहे समय लग जाए परंतु निर्णय भावुकता या आवेश में कदापि न लिया जाए , अर्थात बिना जाने किसी पर कोई प्रहार न करे।

— जो लोग जनहित के विरुद्ध कार्य करते हैं , और धर्म व नैतिकता को क्षत-विक्षत करने की गतिविधियों में संलिप्त रहते हैं , राजा के लिए वे लोग स्वाभाविक रूप से शत्रु होते हैं । ऐसे शत्रुओं का संहार करना राजा का सर्वोपरि कर्तव्य है । जिसके विषय में कहा गया कि राजा शत्रुओं को मारकर किसी प्रकार का शोक न करे।

— आवेश में आकर अकस्मात किसी पर क्रोध करना और उसे दंडित कर देना स्वयं में बहुत बड़ा पाप है। क्योंकि न्याय का यह सिद्धांत है कि किसी एक भी निर्दोष व्यक्ति को किसी भी परिस्थिति में अपमान सहना न पड़े। यदि राजा आवेश और क्रोध में आकर दंड देता जाएगा तो अनेकों निर्दोष लोगों को उसके कोप का भाजन बनना पड़ सकता है । जिससे प्रजा जनों में असन्तोष बढ़ता है । अतः पितामह भीष्म राजा के लिए यह भी घोषित कर रहे हैं कि वह बिना सोचे समझे अकस्मात किसी पर क्रोध न करे। –

अंत में पितामह भीष्म धर्मराज युधिष्ठिर को यह भी बता रहे हैं कि राजा कोमल हो, परन्तु अपकार करने वालों के लिए नहीं।

राजधर्म के विषय में कौटिल्य का मत

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी राजधर्म की चर्चा की गई है। वहां प्रजा के सुख में ही राजा का सुख निहित माना गया है । स्पष्ट है कि प्रजा के हितचिंतन में लगा हुआ राजा उसके सुख में ही अपना सुख अनुभव करने वाला हो । ऐसे में राजा के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह चौबीसों घंटे प्रजाहितचिंतन के कार्यों में लगा रहे ।महामनीषी कौटिल्य इस विषय में चर्चा करते हुए कहते हैं कि —

प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्।

नात्मप्रियं प्रियं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं प्रियम्॥ (अर्थशास्त्र 1/19)

भावार्थ -प्रजा के सुख में राजा को अपना सुख अनुभव करना चाहिए । यदि प्रजा सुखी है तो ही उसे स्वयं को भी सुखी अनुभव करना चाहिए और यदि प्रजा दुखी है तो उसके दुखों के निवारण में अपने आपको , अपनी राजशक्ति को और अपने कर्मचारियों को झोंक देना चाहिए । उसे यह अनुभव करना चाहिए कि प्रजा के हित में ही उसका हित है। क्योंकि राजा का अपना प्रिय अर्थात स्वार्थ कुछ भी नहीं है, प्रजा का प्रिय ही उसका प्रिय है।

तस्मात् स्वधर्म भूतानां राजा न व्यभिचारयेत्।

स्वधर्म सन्दधानो हि, प्रेत्य चेह न नन्दति॥

(अर्थशास्त्र 1/3)

भावार्थ – राजा के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने धर्म का पालन करने में सदा तत्पर रहे । साथ ही अपनी प्रजा को भी धर्म पालन करने के लिए प्रेरित करता रहे । कभी भी और किसी भी परिस्थिति में अपने प्रजाजनों को अधर्म की ओर प्रेरित करने वाला न हो । यदि अधर्म , अनीति और अन्याय के लिए राजा अपने परिजनों को प्रोत्साहित करेगा तो उसके राज्य में अराजकता उत्पन्न हो जाएगी । जिसे वह कभी समाप्त नहीं कर पाएगा । राजा प्रजा को अपने धर्म से च्युत न होने दे। अतः कहा गया है कि राजा भी अपने धर्म का आचरण करे। जो राजा अपने धर्म का इस भांति आचरण करता है, वह इस लोक और परलोक में सुखी रहता है। एक राजा का धर्म युद्धभूमि में अपने शत्रुओं को मारना ही नहीं होता , अपितु अपनी प्रजा को बचाना भी होता है ।

वास्तव में भारत में हिंदुत्व की चेतना के मौलिक स्वर के रूप में इस प्रकार के राजा , राजनीति और राजधर्म को मान्यता प्रदान की गई है ।भारत के रोम – रोम में बसे इस प्रकार के राजा ,राजनीति और राजधर्म के इस सिद्धांत से हमें उस समय बहुत लाभ हुआ जब यहां विदेशी आक्रामक आए और उन्होंने हमारे देश के किसी न किसी भाग पर अपना राज्य स्थापित करने में सफलता प्राप्त की । कहने के लिए तो उन्होंने सफलता प्राप्त की , परंतु भारतवर्ष अपनी जिस मौलिक चेतना से चेतनित था उसने ऐसे विदेशी राजा के विरुद्ध क्रांति करने के लिए प्रेरित किया । जिसका परिणाम यह हुआ कि हमारे देश के लोगों ने ऐसे राजा , राजनीति और राजधर्म को मानने से इंकार कर दिया जो प्रजा के अधिकारों का हनन करने वाला या किसी भी प्रकार से प्रजा को कष्ट पहुंचाने वाला हो । ऐसे आततायी राजा को समाप्त करना भारत के प्रजाजनों को मिला हुआ एक ऐसा विशेषाधिकार है जो इन्हें मनु महाराज ने मनुस्मृति के माध्यम से प्रदान किया था ।

हमारे देश का राजा लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुना जाता था ।राजनीति लोककल्याण के लिए होती थी और राजधर्म लोककल्याण के निष्पादन के लिए अंगीकृत किया किया जाता था । इसी मौलिक चेतना ने हमें कभी भी किसी भी विदेशी राज्य के अधीन होने की प्रेरणा नहीं दी , अपितु उसका हर क्षण , हर स्तर पर और हर प्रकार से विरोध करना यहां के लोगों ने अपना राष्ट्रीय कर्तव्य माना । विदेशी आततायी राजाओं के प्रति भारत की इस चेतना ने जिस राष्ट्रधर्म का निष्पादन किया , उसी के कारण हमारा ये देश विदेशी आक्रमणकारियों को यहां से भगाने में सफल हो पाया।

विवेक कहे चल ठीक से वैराग्य कहे जग छोड़ ।

भक्ति कहे प्रभु के सिवा मत किसी से नाता जोड़ ।।

इस प्रकार अध्यात्म क्षेत्र के विवेक , वैराग्य और भक्ति ने यदि मानव को मुक्ति की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया तो राजनीतिक व सामाजिक क्षेत्र के राजा , राजनीति और राजधर्म ने हमें देश और देशवासियों को स्वतंत्रता अर्थात मुक्ति का ही उपासक बनाया । वस्तुतः इसी भाव से भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का निर्माण हुआ है । कहना न होगा कि भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की मौलिक चेतना में विवेक , वैराग्य ,भक्ति और राजा , राजनीति व राजधर्म का ही स्वर गुंजित हो रहा है।

महर्षि स्वामी दयानंद जी महाराज ने विदेशियों का आर्यावर्त में राज्य होने का सबसे बड़ा कारण आलस्य, प्रमाद, आपस का वैमनस्य (आपस की फूट), मतभेद, ब्रह्मचर्य का सेवन न करना, विधान पढना-पढाना व बाल्यावस्था में अस्वयंवरविवाह, विषयासक्ति, मिथ्या भाषावाद, कुलक्षण, वेद-विद्या का मिथ्या अर्थ करना आदि कुकर्म को माना है। जब आपस में भाई-भाई लड़ते हैं तभी तीसरा विदेशी आकर पंच बन बैठता है। उन्होंने राज्याध्यक्ष तथा शासन की विभिन्न परिषदों एवं समितियों के लिए आवश्यक योग्यताओं को भी गिनाया है। उन्होंने न्याय की व्यवस्था ऋषि प्रणीत ग्रन्थों के आधार पर किए जाने का पक्ष लिया।

वस्तुत: महर्षि दयानंद के इसी चिंतन से हमारी वर्तमान व्यवस्था में परिवर्तन संभव है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक उगता भारत

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