ऑनर किलिंग के खिलाफ आवाज उठाती हुई देश की बेटियां

शालू अग्रवाल

दुनिया भर में महिला दिवस के अवसर ढ़ेरों बातें की जाती हैं और हज़ारों संकल्प पत्र जारी किया जाता है, जिसमें महिलाओं की आज़ादी और उनके सशक्तिकरण पर ज़ोर देने की बात की जाती है। कन्या भ्रूण हत्या को रोकने, लिंगानुपात के अंतर को कम करने, यौन शोषण को रोकने और बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने जैसे कई मुद्दों पर चर्चा की जाती है। भारत में भी महिला दिवस के मौके पर देश के सुनहरे इतिहास से लेकर वर्त्तमान तक में महिलाओं की स्थितियों पर खूब चर्चा की जाती है। महिलाओं विशेषकर लड़कियों को उसकी पसंद के अनुसार जीवन जीने और जीवन साथी के चुनाव की भरपूर हिमायत की जाती है।

लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि 21वीं सदी के इस दौर में आज भी भारत के कई राज्यों विशेषकर उत्तर भारत में लड़कियों को अपनी पसंद से जीवन जीने का अधिकार नहीं है। उसे आज भी समाज में परिवार की इज़्ज़त के नाम पर अपने अरमानों की आहुति देनी पड़ती है। शादी से पहले माता-पिता, शादी के बाद पति और बुढ़ापे में बेटों के रहमोकरम पर जीना पड़ता है। विज्ञान ने चाहे जितनी भी तरक्की कर ली हो और यह साबित कर दिया है कि बेटा या बेटी के पैदा होने में माता नहीं बल्कि पिता का रोल होता है, इसके बावजूद बेटी पैदा करने का दंश और ताना महिला के हिस्से ही आता है। डायन प्रथा के नाम पर महिला उत्पीड़न आम बात है तो दूसरी ओर सख़्त क़ानून के बावजूद आज भी बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में अन्य जाति के लड़के से प्रेम करने या शादी करने पर लड़कियों को मार देना जैसा घिनौना ऑनर किलिंग बदस्तूर जारी है।

हालांकि बदलते वक्त के साथ इस जघन्य अपराध के खिलाफ स्वयं लड़कियों के बीच से ही आवाज़ें उठने लगी हैं। इस के विरुद्ध अब बेटियों ने ही मोर्चा संभालना शुरू कर दिया है। पश्चिमी उप्र में जहां प्यार का मतलब ऑनर किलिंग है, वहां स्कूल, कॉलेज में पढ़ने वाली लड़कियों ने मिलकर एक सेना बनाई है। इस सेना का ध्येय बेटियों की सुरक्षा है। ये लड़कियां कहती हैं कि बेटा बिगड़ता है तो कोई सजा नहीं, लेकिन बेटी बिगड़ जाए तो हत्या करना कहां का न्याय है? समाज में ऑनर किलिंग के नाम पर बेटियों के साथ जो अपराध हो रहा है उसके खिलाफ शहर की लड़कियों ने आवाज बुलंद कर इस आंदोलन की शुरूआत की है।

मेरठ के ही कंकरखेड़ा इलाक़े की निशा ने अपनी सहेलियों के साथ मिलकर वॉर अगेंस्ट ऑनर किलिंग नाम से एक समूह शुरू किया है। पढ़ाई के साथ जॉब कर रही निशा ने दोस्तों के साथ मिलकर इस अभियान को शुरू किया है। वह कहती है कि हमारे समाज में सारी बंदिशें केवल लड़कियों पर ही क्यों लागू हैं? बुराई लड़का और लड़की दोनों करते हैं तो फिर सज़ा केवल लड़की को क्यों दी जाती है? सवाल यह है कि अंतरजातीय विवाह का ज़िम्मेदार सिर्फ लड़कियों को ही क्यों माना जाता है? अगर लड़की ने अपनी पसंद के लड़के से शादी कर ली तो इससे समाज में परिवार का नाक कैसे कट जाता है? क्या अपनी पसंद के लड़के से शादी करना इतना बड़ा जुर्म है कि इसके लिए लड़की को जान से मार दिया जाये? वॉर अगेंस्ट ऑनर किलिंग कैंपेन शुरू करने का उद्देश्य बताते हुए निशा कहती है कि उसकी दो सहेलियों की उनके घरवालों ने हत्या कर दी थी। वो गलत थीं या नहीं, यह जानने की किसी ने भी कोशिश नहीं की। पुलिस ने पूछा तो कह दिया कि लड़की बिगड़ गई थी। वह बताती है कि अपनी सहेली टीना को न्याय दिलाने से हमने अभियान शुरू किया है। मेरी सहेलियों की तरह दूसरी लड़कियां भी बेवजह मारी न जाएं इसलिए जंग छेड़ी है। निशा कहती है कि वह हर उस लड़की के लिए न्याय की मांग करेगी, जिसे उसके घरवालों ने बिना किसी गुनाह के ही मार डाला।

ऑनर किलिंग के खिलाफ निशा के इस जंग में आज 70 लोग शामिल हैं, इसमें 30 से अधिक लड़कियां हैं। इन लोगों ने सोशल मीडिया के जरिए भी इस अभियान को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया है। हालांकि कई स्तर पर इस अभियान की आलोचना की गई तो कई लोगों ने अभियान को सराहा और इससे जुड़ते भी चले गए। आज उसके साथ इस अभियान में स्कूल, कॉलेज और कोचिंग के विद्यार्थियों के साथ साथ नौकरीपेशा युवा जुड़ते जा रहे हैं। ऑनर किलिंग की शिकार को न्याय दिलाने के लिए जब दूसरी लड़कियां आवाज उठाती हैं तो सबसे पहला विरोध परिवार से ही उठता है। निशा के साथ भी यही हुआ। उसकी मुहिम के खिलाफ सबसे पहला विरोध घर से ही होने लगा। इस विरोध के पीछे सबसे बड़ा कारण समाज की संकीर्ण मानसिकता है, जिसके दबाब में निशा का परिवार भी है। ऐसे वातावरण में कोई नहीं चाहता कि उनकी बेटी सड़क पर उतरे और ऑनर किलिंग का विरोध करे। इस विषम परिस्थिती से केवल निशा को ही नहीं बल्कि इस मुहिम में उसका साथ देने वाली उसकी दोस्त गरिमा, प्रियंका और समूह से जुड़ी अन्य लड़कियों को भी गुज़रना पड़ा है। बकौल निशा परिवार ने हमें रोका, तुम फंस जाओगी लेकिन हमने उनकी बात नहीं मानी। हमने परिवार को समझाया कि लड़कियों पर अत्याचार होता रहेगा, किसी को इसके खिलाफ आवाज उठानी होगी। आख़िरकार उनके हौसले के सामने परिवार को झुकना पड़ा।

एक आंकड़े के अनुसार पिछले साल अकेले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ऑनर किलिंग की 16 घटनाएं दर्ज की गई हैं। जिसमें अकेले मेरठ में पांच, मुज़फ्फरनगर में चार और शामली, सहारनपुर तथा बागपत में दो-दो तथा बिजनौर में ऑनर किलिंग का एक मामला दर्ज किया गया है। यह वह आंकड़े हैं जो थानों में दर्ज किये गए हैं। कई बार ऐसा देखने और पढ़ने को मिलता है कि ऑनर किलिंग में न केवल परिवार बल्कि पूरे समाज की मौन स्वीकृति होती है। ऐसे मामले पुलिस थानों में दर्ज तक नहीं होते हैं। बहरहाल ऑनर किलिंग न केवल एक जघन्य अपराध है बल्कि सभ्य समाज पर भी एक बदनुमा दाग़ है। जिसके खिलाफ बेटियों की बुलंद होती आवाज़ में आवाज़ मिलाने की ज़रूरत है। (यह आलेख संजोय घोष मीडिया अवार्ड 2019 के अंतर्गत लिखा गया है)

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