आकर्षण से चल रहा यह सारा ब्रह्मांड

बिखरे मोती

सूर्य की किरणों में सात प्रकार के रंग होते हैं, जो हमारे स्वास्थ्य के लिए अनेकों प्रकार से लाभप्रद होते हैं, जैसे – सूर्य की किरणों से ही हमें विटामिन ‘सी’ तथा विटामिन ‘डी’ की प्राप्ति होती है। सूर्य की किरणें अथहा ऊर्जा का भंडार हैं। जिन देशों में सूर्य की धूप नहीं पहुंच पाती है वहां की सरकार ने रिफ्लेक्टर के द्वारा सूर्य की धूप को कृत्रिम तरीके से उन क्षेत्रों में पहुंचाने का भरसक प्रयास किया है।हमें तो प्रभु ने बहुत ही अच्छे देश में पैदा किया है,जहां सूर्य की ऊर्जा हमें प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती रहती है। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि जैसे एक सूर्य, एक सौरमंडल को गति देता है,उसे ऊर्जान्वित करता है, जीवन का प्रेरक केंद्र है। समस्त सौरमंडल उसकी आकर्षण शक्ति से जुड़ा रहता है, ठीक इसी प्रकार हम परमपिता परमात्मा की आकर्षण शक्ति (प्रेम) से सर्वदा जुड़े रहें। काश! ऐसा हमारा आचरण हो, तो विश्वकल्याण और आत्मकल्याण आवश्यक संभव हो। इस पर चिंतन करें,मनन करें। ध्यान रहे, मनुष्य का पतन तभी होता है जब वह आवारा ग्रह की तरह अपने केंद्र को छोड़कर,मर्यादाविहीन हो कर चलता है अर्थात् चैतन्य (प्रभु) से दूर होकर जड़ता (अज्ञान और अहंकार) का जीवन जीता है। इसलिए अपनों केंद्र से अर्थात् परमपिता परमात्मा से मरते दम तक जुड़े रहें ताकि यह मानव जीवन सफल हो,सार्थक हो किंतु विडंबना यह है कि आज का मानव विज्ञान की अंधी दौड़ में पढ़कर वह अपने केंद्र (परमपिता परमात्मा) से भटक गया है। पूरे विश्व में अणु और परमाणु बमों का जखीरा एकत्र करने की अंधी दौड़ लगी हुई है।सारी दुनिया बारूद के ढेर पर बैठी है।तृतीय- विश्वयुद्ध की आहट सुनाई देती है। महाशक्तियों की मति भंग हो रही है।अपने – अपने वर्चस्व के लिए किसी भी क्षण टकरा सकती हैं। यदि ऐसा हुआ, तो पृथ्वी ग्रह का महाविनाश अवश्यम्भावी है। इसलिए इस महाविनाश से बचने का एक ही उपाय है कि आज का भटका हुआ मानव भौतिकवाद से हटकर आध्यात्मवाद की ओर चले, अपने केंद्र (परमात्मा) से जुड़े,तो यह प्रलय की रात टले। इस संदर्भ में, मेरा कवि हृदय महाविनाश की कल्पना मात्र से सिहर जाता है और भगवान से ही प्रश्न पूछता है:-
विचित्र विधाता की सृष्टि को,
निरख मन है मोद में I
हाय! तरस भी आता है,
बैठी मृत्यु की गोद में॥

एटम का वैज्ञानिक रत है,
विध्वंस की शोध में।
बोल विधाता क्यों दे दी,
यह बात इनके बोध में॥
जिनको तुमने यह बोध दिया,
सृष्टि को मिटाना चाहते हैं।
वर्चस्व जमाना चाहते हैं,
और तुझे भी मिटाना चाहते हैं॥
सुना था प्रभु प्रलय करने का,
तेरा विशिष्ट अधिकार।
लगता तुझसे भूल हुई,
तू खो बैठा अधिकार॥ लगती होंगी अटपटी सी तुमको,
मेरी ये सारी बातें ।
एटम की टेढ़ी नजर हुई,
बीतेंगी प्रलय की रातें॥
निर्जनता का वास होगा,
कौन किसको जानेगा ?
होगा न जीवित जन कोई,
तब तुझको कौन जानेगा?
यदि समय रहते तू कर दे,
एक छोटी सी बात।
हम बस जाये, तू भी बच जाय,
टले प्रलय की रात॥
हे प्रभु!हम मानवों को,
दे दे वह सद्बुद्धि।
बदले की न रहे भावना,
करें मनोविकार की शुद्धि॥शांति,अहिंसा,प्रेम,त्याग से,
करें सहयोग में वृद्धि।
समझें परिवार इस वसुधा को,
मित्र-भाव से करें समृद्धि॥
रुलाकर किसी भी प्राणी को, प्रभु , हंसना अपना स्वभाव न हो।
मानव-मानव के मानस में,
किंचित भी कोई दुर्भाव न हो॥
विज्ञान हमें ऐसा देना, जिसमें हृदय का आभाव न हो।
नहीं चाहिए ऐसा स्वर्ग,
जहां आपस में सद्भाव न हो॥
लगे भलाई में मन अपना,
करें प्रेम से भक्ति।
शारीरिक-मानसिक और आत्मिक,
दे दे ऐसी शक्ति॥
है जगत्पते! कर त्राण जगत का,
हृदय हुआ विकल।
जीवन बीत रहा पल-पल…
जीवन बदल रहा पल-पल…
अरे मनुष्य! तेरे जीवन के,
पहिये आज और कल…

प्रोफेसर विजेंद्र सिंह आर्य

मुख्य संरक्षक : उगता भारत

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