हिंदू राष्ट्रनीति , राष्ट्रधर्म व हिंदवी स्वराज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज

आज हिंदू पद पादशाही , हिंदू राष्ट्रनीति , राष्ट्रधर्म और हिंदवी स्वराज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती है । जिनका जन्म 19 फरवरी 1630 को हुआ था। यह भी एक संयोग ही है कि 19 फरवरी को शिवाजी का जन्मदिवस है तो 20 फरवरी (1707) औरंगजेब का मृत्यु दिवस है। जब भी किसी निष्पक्ष इतिहासकार की लेखनी शिवाजी के बारे में चलेगी तो है यही लिखेगा कि आजीवन औरंगजेब को नाकों चने चबाने वाले शिवाजी महाराज के कारण ही मुगल साम्राज्य की नींव हिली और औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात ये साम्राज्य भर भराकर गिरने लगा।

हिंदू राष्ट्रनीति के उन्नायक:

शिवाजी महाराज हिंदू राष्ट्रनीति के उन्नायक थे। उन्होंने अपने साम्राज्य का नाम हिंदवी स्वराज्य रखा था। 6 जून 1674 को जब उन्होंने अपना राज्याभिषेक कराया था तो उस दिन को हमारे इतिहास में हिंदवी स्वराज्य अर्थात पूर्ण स्वराज अर्थात भारत की स्वाधीनता का पहला दिवस घोषित कर पढ़ाया जाना अपेक्षित है । यह तब और भी आवश्यक हो जाता है जब पाकिस्तान ने अपने इतिहास को लिखते समय यह भ्रांति उत्पन्न करने का प्रयास किया है कि गजनी और गौरी के प्रयासों से पाकिस्तान की स्थापना तो लगभग 900 वर्ष पहले हो गई थी परंतु हिंदुओं ने हम पर अत्याचार करते हुए इसे अपने अधीन किया रखा और हम अपनी आजादी के लिए लगभग 900 वर्ष लड़ते रहे । तब जाकर 1947 में हमें आजादी मिली।
धर्मनिरपेक्षता के पक्षाघात से पीड़ित भारत के शत्रु इतिहास लेखकों ने भारत में यह कहने का भी प्रयास नहीं किया कि शिवाजी महाराज ने 6 जून 1674 को एक प्रकार से पूर्ण स्वाधीनता की घोषणा कर दी थी और उनके इस प्रयास या साहस का ही परिणाम था कि 1737 ई0 तक आते-आते भारत से मुगल साम्राज्य लगभग समाप्त हो गया और 2800000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल पर मराठा साम्राज्य स्थापित कर भारत के बड़े भूभाग को हिंदू मराठाओं ने स्वतंत्र करा लिया। जिस मुगल साम्राज्य का विस्तार कभी 4400000 वर्ग किलोमीटर भाग पर हुआ करता था वह सिमट गया और दिल्ली में लाल किले से लेकर पालम तक ही उसकी सत्ता चलने पर विवश हो गई।
बाद में चलकर वीर सावरकर ने राजनीति का हिंदूकरण और हिंदुओं का सैनिकीकरण का जो मंत्र हिंदू राष्ट्रनीति (राजनीति नही) का मूल आधार घोषित किया वह चिंतन वास्तव में उन्हें शिवाजी महाराज से मिला था। शिवाजी महाराज ने अपने राज्याभिषेक (6 जून 1674) के अवसर पर हिंदू पद पादशाही की घोषणा की थी। वह देश में हिंदू राजनीति को स्थापित कर देश से विदेशियों को खदेड़ देना चाहते थे। उनकी राजनीति का मूल आधार नीति, बुद्घि तथा मर्यादा-ये तीन बिंदु थे। रामायण, महाभारत, तथा शुक्रनीतिसार का उन्होंने अच्छा अध्ययन किया था। इसलिए अपने राज्य को उन्होंने इन्हीं तीनों महान ग्रंथों में उल्लेखित राजधर्म के आधार पर स्थापित करने का पुरूषार्थ किया। वह राष्ट्रनीति में मानवतावाद को ही राष्ट्रधर्म स्वीकार करते थे। शुक्र नीति में तथा रामायण व महाभारत में राजा के लिए 8 मंत्रियों की मंत्रिपरिषद का उल्लेख आता है। इसलिए शिवाजी महाराज ने भी अपने राज्य में 8 मंत्रियों का मंत्रिमंडल गठित किया था। शेजवलकर का मानना है कि ये अष्टप्रधान की कल्पना शिवाजी ने ‘शुक्रनीतिसार’ से ही ली थी ।

इतिहासकारों की मक्कारी

अंग्रेज व मुस्लिम इतिहासकारों ने शिवाजी को औरंगजेब की नजरों से देखते हुए पहाड़ी चूहा या एक लुटेरा सिद्घ करने का प्रयास किया है। अत्यंत दुख की बात ये रही है कि इन्हीं इतिहासकारों की नकल करते हुए कम्युनिस्ट और कांग्रेसी इतिहासकारों ने भी शिवाजी के साथ न्याय नही किया। छल, छदम के द्वारा कलम व ईमान बेच देने वाले इतिहासकारों ने शिवाजी के द्वारा हिंदू राष्ट्रनीति के पुनरूत्थान के लिए जो कुछ महान कार्य किया गया उसे मराठा शक्ति का पुनरूत्थान कहा गया ना कि हिंदू शक्ति का पुनरूत्थान। यदि ये लोग हिंदू समाज के लिए इन सारे प्रयासों को जागरण के रूप में पेश करते तो उनका यह कार्य तत्कालीन राजसत्ताओं के लिए कष्ट कर हो सकता था।

शिवाजी की नीति

शिवाजी की नीति धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना करने की थी। खानखां जैसे इतिहास कार ने भी उनके लिए ये कहा है कि शिवाजी के राज्य में किसी अहिंदू महिला के साथ कभी कोई अभद्रता नही की गयी। उन्होंने एक बार कुरान की एक प्रति कहीं गिरी देखी तो अपने एक मुस्लिम सिपाही को बड़े प्यार से दे दी। याकूत नाम के एक पीर ने उन्हें अपनी दाढ़ी का बाल प्रेमवश दे दिया तो उसे उन्होंने ताबीज के रूप में बांह पर बांध लिया। साथ ही बदले में उस मुस्लिम फकीर को एक जमीन का टुकड़ा दे दिया। ऐसी ही स्थिति उनकी हिंदुओं के मंदिरों के प्रति थी। वह काल वोट की राजनीति का काल नही था, इसलिए कहीं कोई तुष्टिïकरण नही था, कहीं उनके राज्य में किसी का अनुचित उत्पीडऩ नही था। यही था वास्तविक धर्मनिरपेक्ष राज्य। आज की राजनीति तो इस राज्य का अर्थ ही नही समझ पायी है।

शिवाजी की इस नीति की प्रशंसा कई इतिहासकारों ने की है, और ये माना है कि शिवाजी की इस प्रकार की नीति के कारण ही उनके खिलाफ कभी उनके किसी मुस्लिम सिपाही ने बगावत नही की।

शुद्घि पर बल दिया

शिवाजी का मुस्लिम प्रेम अपनी प्रजा के प्रति एक राजा द्वारा जैसा होना चाहिए, उस सीमा तक राष्ट्र धर्म के अनुरूप था। इसका अभिप्राय कोई तुष्टिकरण नही था। इसी आदर्श को कालांतर में सावरकर ने हिंदू राज्य में स्थापित करने पर बल दिया। शिवाजी इसके उपरांत भी हिंदू संगठन पर विशेष बल देते थे। इसलिए उन्होंने निम्बालकर जैसे प्रतिष्ठित हिंदू को मुसलमान बनने पर पुन: हिंदू बनाकर शुद्घ किया। साथ ही निम्बालकर के लड़के को अपनी लड़की ब्याह दी। नेताजी पालेकर को 8 वर्ष मुस्लिम बने हो गये थे-शिवाजी ने उन्हें भी शुद्घ कराया और पुन: हिंदू धर्म में लाए। ऐसे और भी कितने ही उदाहरण उनके विषय में दिये जा सकते हैं।

शिवाजी का बौद्घिक चातुर्य

राजा जय सिंह की विश्वासघात भरी बातों में फंसकर शिवाजी महाराज 1666 में आगरा स्थित औरंगजेब के लालकिले आ गये। उन्हें बहुत बड़े सम्मान का भरोसा जयसिंह की ओर से दिया गया था, लेकिन आगरा में ऐसा कुछ न पाकर शिवाजी को वास्तविकता को जानने में देर न लगी। औरंगजेब ने उन्हें पांच हजारी मनसबदारों की पंक्ति में बैठाने का निर्देश दिया। जिसे देखकर शिवाजी बिगड़ गये। इसके पश्चात उन्हें नजरबंद कर दिया गया। फिर औरंगजेब उन्हें मारने की योजना बनाने लगा। औरंगजेब के इस इरादे की सूचना राजा यशवंत सिंह के लड़के कुंवर रामसिंह ने शिवाजी को दे दी। तब शिवाजी ने बौद्घिक चातुर्य से काम लिया, पहले अपने को बीमार घोषित कराया फिर एक दिन स्वस्थ होने की खुशी में फल और मिठाई बांटने की आज्ञा बादशाह से प्राप्त की। अमीर उमरावों व बड़े-बड़े पदाधिकारियों को मिठाई भिजवाना आरंभ किया गया। बड़े-बड़े टोकरों में मिठाई भर-भरकर बाहर जाने लगी। जब दरबाजों पर टोकरों की रोक-टोक समाप्त हो गयी तब चुपके से अपने बेटे शम्भाजी को पहले एक टोकरे में बैठाकर बाहर निकाल दिया फिर स्वयं निकल गये और अपने बिस्तर में अपने एक हमशक्ल साथी को लिटा दिया और स्वयं बैरागी गुसाईयों की एक टोली के साथ दाढ़ी मूंछ कटाकर उनके साथ काशी के लिए चल दिये। काशी में एक मुगल सेनापति ने उक्त मंडली रोक ली। स्वयं को फिर फंसा देखकर यहां एक मुगल सैनिक से सांठगांठ की और उसे दो बेशकीमती हीरे देकर वहां से भी निकल भागे। ये था शिवाजी का बौद्घिक चातुर्य। ऐसा ही चातुर्य उन्होंने अफजल खां का वध करते समय 1659 में दिखाया था। कई इतिहासकारों ने उन पर यहां हत्या का आरोप लगाया है। लेकिन इस घटना का उल्लेख करते हुए मीर आलम लिखता है कि अफजलखां ने शिवाजी को बगलगीर करके मजबूती से पकड़ा और अपनी कटार से उस पर वार किया। शिवाजी ने पलटकर उस पर बाघनख और बिच से हमला किया। सरकार ने भी शिवाजी के कृत्य को आत्मरक्षा में उठाया गया कदम सिद्घ किया है। हिंदू राष्ट्रनीति का तकाजा भी यही है कि दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करो।

शिवाजी की मर्यादा

किसी भी मस्जिद को किसी सैनिक अभियान में शिवाजी ने नष्ट नही किया। इस बात को मुस्लिम इतिहासकारों ने भी खुले मन से सराहा है। गोलकुण्डा के अभियान के समय शिवाजी को यह सूचना मिल गयी थी कि वहां का बादशाह शिवाजी के साथ संधि चाहता है, इसलिए उस राज्य में जाते ही शिवाजी ने अपनी सेना को आदेश दिया कि यहां लूटपाट न की जाए अपितु सारा सामान पैसे देकर ही खरीदा जाए। बादशाह को यह बात प्रभावित कर गयी। जब दोनों (राजा और बादशाह) मिले तो शिवाजी ने बड़े प्यार से बादशाह को गले लगा लिया। शिवाजी ने गौहरवानो नाम की मुस्लिम महिला को उसके परिवार में ससम्मान पहुंचाया। उनके मर्यादित और संयमित आचरण के ऐसे अनेकों उदाहरण हैं अपने बेटे सम्भाजी को भी एक लड़की से छींटाकशी करने के आरोप में सार्वजनिक रूप से दण्डित किया था।
शिवाजी क्योंकि हिंदू यह बादशाही के माध्यम से देश में ‘हिंदू राज्य’ स्थापित करना चाहते थे इसलिए उन्होंने हिंदू राष्ट्रनीति के उपरोक्त तीनों आधार स्तंभों (नीति, बुद्घि और मर्यादा) पर अपने जीवन को और अपने राज्य को खड़ा करने का प्रयास किया।

विशाल हिंदू राज्य के निर्माता

शिवाजी महाराज ने जनपद गौतमबुद्घ नगर को तहसील दादरी में स्थित एक बड़े मंदिर का जीर्णोद्घार कराया था। यह मंदिर आज भी है। ऐसे कार्य उन्होंने देश में अन्मत्र स्थानों पर भी बड़ी संख्या में कराये। उन्होंने अपना साम्राज्य स्थापित किया, परंतु युद्घों में लगातार रत रहने से उनका स्वास्थ्य गिरने लगा था और पचास वर्ष की आयु में 15 अप्रैल 1680 में वह चले गये। उनके पश्चात हिंदू शक्ति निरंतर मजबूत होती गयी और अठारहबीं शताब्दी के मध्य में जब अब्दाली और नादिरशाह के आक्रमणों से मुगल साम्राज्य हिला गया तो मराठों ने दिल्ली पर भी अधिकार कर लिया था। अठारहवीं शदी के उत्तरार्ध में और 1857 की क्रांति से 50-60 वर्ष पूर्व मराठा शक्ति हिंदू शक्ति के रूप में सबसे बड़ी शक्ति भारतवर्ष में थी। संबद्घ चित्र में मराठा राज्य को देखकर यह अनुमान स्वयं लगाया जा सकता है। यह क्षेत्र लगभग अकबर के साम्राज्य से कुछ ही छोटा है। लेकिन यहां चाटुकारों ने अकबर को महान बताया है और शिवाजी को पहाड़ी चूहा कहा है। तथ्यों को झुठलाकर मूर्ख बनाने की इतिहासकारों यह प्रवृत्ति देश के लिए दुर्भाग्य पूर्ण है।

नोएडा में लगे भव्य प्रतिमा

शिवाजी के वंशजों ने आज के नोएडा, गौतमबुद्घ नगर, गाजियाबाद, बुलंदशहर, दिल्ली सारे एनसीआर पर अपना नियंत्रण स्थापित किया था। नोएडा फिल्म सिटी सेंटर के पास स्थित गरूड़ध्वज (स्थानीय भाषा में गडग़ज) उन्हीं का विजय स्तंभ है। आज नोएडा इन ऐतिहासिक धरोहरों को निगल रहा है और दम तोड़ते इस इतिहास की ओर किसी का ध्यान नही है। अच्छा हो कि ऐसे स्थानों पर शिवाजी महाराज की प्रतिमा लगाकर उन्हें सम्मान देकर इतिहास को सहेजने का कार्य योगी सरकार द्वारा किया जाए। आज की राजनीति को शिवाजी से बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है, उनके आदर्श जीवन और व्यवहार आज की दिशाहीन राजनीति सचमुच सही दिशा ले सकती है। इसीलिए उन्हें सावरकर ने अपना आदर्श माना था। उनकी जयंती के अवसर पर उनके व्यक्तिगत और कृतित्व का सही मूल्यांकन करने की आवश्यकता है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक: उगता भारत

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