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आज का चिंतन

लोग न भाषण चाहते हैं, न उपदेश श्रेष्ठ आचरण ही होते हैं अनुकरणीय

– डॉ. दीपक आचार्य
9413306077

समाज और संसार में प्रभावोत्पादकता के लिए सबसे ज्यादा जरूरत होती है उस बात की जो व्यवहार में अपनायी जाती है। हम जो काम करते हैं उनके बारे में किसी को न भी बताएं तब भी लोग उन कामों का अपने आप अनुकरण करने में आनंद का अनुभव करते हैं।
दूसरी ओर किसी के सामने हजारों शब्दों का ल बा-चौड़ा या कई घण्टों का भाषण झाड़ दें या उपदेश दे डालें, इसका कोई अर्थ नहीं होता। भाषण और उपदेश वे ही प्रभावी हो सकते हैं जब भाषण या उपदेश देने वाला भी उन बातों पर अमल करता ही हो
जो अपनी कही हुई बात पर अमल करता है अथवा अनुभव की हुई बातें कहता है उसी का सामने वालों पर प्रभाव पड़ता है। अन्यथा हमारा बोलना, लच्छेदार या सीधा-सपाट भाषण देना और उपदेश झाड़ना ठीक उसी प्रकार से होता है जैसे ज्यादा खा चुका आदमी हमारे सामने उलटी करता हुआ दिखाई देता है और तब हमें भी घृणा आती है और थूँकने को विवश होकर नाक भौं सिकोड़ लिया करते हैं।
यह बात उन सभी लोगों पर लागू होती है जिनकी कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर होता है। आजकल लोगों के भाषणों या उपदेशों का कोई असर जन समुदाय पर नहीं पड़ रहा है क्योंकि लोग जो बोल रहे हैं वह अन्दर से नहीं आ रहा है बल्कि लोगों को भरमाने के लिए ही बोला जा रहा है और उसमें भी कुटिलता का संपुट लगा हुआ है।
इसलिए माईक फोबिया से ग्रस्त बड़े से बड़े भाषणबाज से लेकर कथावाचकों, संत-महात्माओं, महंतों, महाण्डलेश्वरों आदि के शब्दों का समाज पर कोई असर नहीं हो रहा है। दूसरी बात यह भी है कि इन सभी लोगों के लिए बोलना एक धंधा हो चला है और ऐसे में शब्द तब दगा दे जाते हैं जब सरस्वती की बजाय लक्ष्मी की आराधना का भाव जग जाता है।
आज सभी तरफ यही स्थिति हो रही है। लोग घण्टों भाषण देते हैं लेकिन उनके चले जाने के बाद किसी सामान्य आदमी तक के अवचेतन पर इसका कोई प्रभाव देखने को नहीं मिलता। यही स्थिति संत-महात्माओं और कथावाचकों, बाबाओं की है जो पैसे लेकर कथावाचन करते हैं या पैसों के लिए ही कथावाचन या संन्यास लिये हुए हैं।
दुनिया भर को रुपयों-पैसों और संसार की माया से दूर रहकर भगवान का भजन करने की सीख देने वाले ये बाबा लोग कितने ऐशो आराम और भोग-विलास में लिप्त हैं, इस बारे में सभी जानते हैं लेकिन धर्मभीरू होने की वजह से अंधविश्वासों से घिरे होने के कारण न ये आम लोग बेचारे न कुछ कह पाते हैं, न कर पाते हैं।
यही हाल हमारे उन लोगों का है जो देश के विकास और समाज की सेवा का ठेका लेकर जाने कितने-कितने मैदानों में ताल ठोंकते फिरते रहे हैं। इनकी भी वाणी का कोई प्रभाव नहीं रह गया है। भले ही इनके भाषणों का दौर कितना ही लंबा क्यों न चलें।
असल कारण यही है कि इनके भाषणों में शुचिता व सरलता नहीं है बल्कि लोगों को भरमाने के लिए ही ये बोलते हैं। जब बोलने का उद्देश्य पवित्र न होकर मनोमालिन्य और कुटिलताओं से घिरा होकर रह जाता है तब शब्द प्राणहीन होकर अपनी ऊर्जा खो देते हैं।
यही कारण है कि आजकल हमारे बड़े-बड़े लोगों और माननीयों की वाणी का कोई प्रभाव समुदाय में नहीं दिख रहा है, सिवाय कुछ पालतुओं की फौज के, जो कि दाना-पानी के फेर में इनके आगे-पीछे चक्कर काटने को मजबूर है। वरना इनका जीना हराम हो जाए।
आज आवश्यकता भाषणों और उपदेशों की नहीं है। इसके लिए देश में हर तरफ ऐसे कई पालतु और फालतु लोगों का जमघट लगा हुआ है जो दिन-रात किसी न किसी मंच में बोलने को ही अपनी जिन्दगी समझ बैठे हैं और उन्हें भ्रम है कि उनसे बड़ा और कोई प्रखर व लोकप्रिय वक्ता कोई है ही नहीं।
इस किस्म के लोगों को यह भी भ्रम है कि वे जो कहते हैं उसे ही लोग गले उतारते हैं तभी तो हाँ जी-हाँ जी करते हैं, तालियाँ पीटते हैं और जयकारे लगाते हैं। तालियां पीटने और जयकारे लगाने वाली भीड़ का तो काम ही है यह, जो इन्हें कुछ दे जाता है, या कहीं ले जाता है उसके लिए तो सब कुछ करना ही है। फिर आजकल आदमी बिकाऊ होता जा रहा है। जहाँ कुछ मिल जाता है, आदमियों की रेवड़ उधर का रूख कर लिया करती है। यों भी अपने यहां भीड़ या मजमा जमा कर देना सबसे सस्ता और मजेदार काम है।
आज जरूरत है ऐसे श्रेष्ठ आचरणों की जिससे कि हमारे व्यक्तित्व की गंध हर तरफ महसूस की जा सके। एक अच्छे काम या आचरण की गंध एक लाख शब्दों के प्रभाव से भी कहीं अधिक हुआ करती है। हमारा आचरण अच्छा होगा तो लोग दिल से तारीफ भी करेंगे और हमारे कर्मों व आदतों का अनुकरण भी।
वह व्यक्ति नाकारा और धूर्त्त होता है जिसका आचरण मनुष्यों के अनुकूल नहीं हो और भाषणों व उपदेशों में झूठ-फरेब व मक्कारी की बातें शामिल हों। अपने आचरण में सुधार लाएं और ऐसे काम करें जो अनुकरणीय हों, समाज व देश के लिए उपयोगी हों।
ऐसा होने पर हमें भाषणों या उपदेशों में समय जाया करने या पब्लिसिटी के स्टंट अपनाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अपने विचारों और कामों का अनुकरण आप होना शुरू हो जाएगा। और वस्तुत: यही स्थायी भाव है जो समाज को नई दिशा और दशा देने वाला है।
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