अश्वमेधादिक रचाएं यज्ञ पर उपकार को , भाग 1

पूजनीय प्रभु हमारे – – – – -अध्याय 5

प्रकृति चलायमान है,संसार परिवर्तनशील है। यहां हर पल परिवर्तन हो रहा है। जीव का आश्रय यह परिवर्तनशील संसार नहीं हो सकता। पर इसके उपरांत भी उसे इसी संसार में आना पड़ता है,कर्मभोग भोगने के लिए। इस जीव का साथी तो नित्य प्रभो है,उस साथी से मिलने के लिए इसे इस अनित्य साथी अर्थात असार – संसार का साथ मिला है। लगता है कि – ” छुप गया कोई रे दूर से पुकार के” वाली बात हो गई है , इस जीव के साथ। उस जगत रचैया ने जगत रचा और इसी में छुप गया।इधर यह जीव है कि यह इस संसार की ‘जुल्फों व झील सी गहरी आंखों ‘ से बतियाता रह गया।जब शाम हो गई तो माथे पर हाथ मार कर कहने लगा-“ढल गया दिन — हो गई शाम — जाने दो जाना है ” पर किसी ने पूछ लिया कि जाओगे कहां ? जहां जाने की तैयारी है ? उस प्यारे से कोई संबंध तो बनाया नहीं , कोई आत्मीयता तो उससे बनाई नही ? तब कहां जाओगे?…कहीं नहीं जाओगे , लौटकर यहीं आओगे।

कोटि-कोटि जन्मों से हमारी यही स्थिति होती आ रही है।अपना आश्रय हम खोजते आ रहे हैं ,पर वह हमें मिल नहीं रहा। समस्या का समाधान करते हुए वेद ने (यजुर्वेद 35/4) हमें बताया कि “अश्वत्थे व निषदनम् ” अर्थात अश्वत्थ वृक्ष जैसी (जिसका अभिप्राय है कि कल रहेगा या नहीं , ऐसा अनित्य संसार रूपी वृक्ष)तुम्हारी स्थिति है। प्रकृति में पीपल के पत्तों की स्थिति सदा चंचल बनी रहती है, हल्की से हल्की वायु के स्पर्श से भी वह हिलते रहते हैं- इसलिए अश्वत्थ पीपल के वृक्ष को भी कहते हैं। हमारी स्थिति इसी पीपल के वृक्ष पर है,जो सदा चलायमान है, अनित्य है , चंचल है। पीपल को अश्वत्थ मानना, यद्यपि अश्वत्थ का रूढ़िगत अर्थ है, परंतु फिर भी पीपल के पत्ते और संसार की चंचलता की तुलना अपने आप में बेजोड़ है।

संसार की अनित्यता से बचकर नित्य प्रभु की ओर चलने के लिए हमारे वैदिक ऋषियों ने हमें यज्ञ परंपरा का अस्त्र प्रदान किया। इस अध्याय में हम उसी पर कुछ चितंन करेंगे।

महर्षि मनु लिखते हैं:-

वेदोदितं स्वकं कर्म नित्यं कुर्मादतन्द्रितः।

ताद्धि कुर्वन यथाशक्ति प्राप्तनोति परमांगतिम॥

(मुन4/14)

अर्थात जो मनुष्य प्रतिदिन आलस्य रहित होकर यथाशक्ति वेदोक्त कर्मों को करता है,वह परमगति अर्थात मोक्ष को प्राप्त करता है। प्रत्येक सदगृहस्थ के लिए महर्षि दयानंद जी महाराज ने पांच प्रकार के यज्ञों का करना कराना अनिवार्य माना है। इनमें सर्वप्रथम है-ब्रह्म यज्ञ,दूसरा है अग्निहोत्र यज्ञ, तीसरा है पितृयज्ञ बलिवैश्वदेव यज्ञ चौथा है और अतिथियज्ञ पाँचवाँ हैI

इन यज्ञों के करने से गृहस्थ और गृहस्थी दोनों का ही कल्याण होता है,परंतु हम जिस विषय पर यहां चिंतन करने लगे हैं उसमें इन पंच महायज्ञ की ओर संकेत करते हुए अश्वमेधादिक यज्ञों के रचने – रचाने की ओर संकेत दिया गया है। इसके पीछे रचनाकार का उद्देश्य यही रहा होगा कि इन पंच महायज्ञ के करने-कराने की अपेक्षा तो अनिवार्यतः हर सदगृहस्थ से की जा सकती है परंतु जो इनसे आगे बढ़ जाता है , वास्तविक अर्थों में परोपकारी वही होता है। उसका परोपकारी हो ना इसलिए अवश्यम्भावी है कि यज्ञ चाहे जैसा हो उसका अंतिम उद्देश्य पर कल्याण या परोपकार ही है। परोपकार में ही स्वकल्याण निहित है। तभी तो मैत्रायणि उपनिषद (6/36) में कहा गया है कि-

‘अग्निहोत्र जहुयात् स्वर्गकाम:’ अर्थात स्वर्ग का इच्छुक व्यक्ति यज्ञों का अनुष्ठान करता रहे।

यहां स्वर्ग का अभिप्राय किसी विशेष लोक या स्थान से कदापि नहीं है। स्वर्ग का अभिप्राय सुख, शांति की ओर गमन करने से है। जब जीवन में सुख शांति की अनुभूति होने लगे तब समझना चाहिए कि स्वर्ग प्राप्त हो गया है। अग्निहोत्र हमें सुख शांति (स्वस्तिवाचन और शान्तिकरण के मंत्रों के माध्यम से) प्राप्त कराता है। तभी तो शतपथ ब्राह्मण का ऋषि कहता है:-

“नौर्ह वा एषा स्वगर्या यदग्नि होत्रम्”

अग्निहोत्र स्वर्ग में पहुंचाने वाली एक नौका है,विवेकशील लोग इस शरीर को भी एक नौका ही मानते हैं , जो इस भवसागर को पार लगाने में सहयोग करता है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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