महर्षि दयानंद की विशेषता और सत्यार्थ प्रकाश

इन महापुरुषों में महर्षि दयानंद सरस्वती का विभिन्न कारणों से प्रमुख और महत्वपूर्ण स्थान है। उनका बाह्य व्यक्तित्व जहाँ विशेष आकर्षित करने वाला था (सवा छह फुट से अधिक लंबा कद, गोरा रंग, ब्रह्मचर्य एवं योगाभ्यास के परिपुष्ट बलिष्ठ शरीर, विलक्षण मेधाशक्ति, ओजस्वी वाणी), वहीँ विशाल वैदिक वाङ्मय के गहन ज्ञान से सम्पन्न, चिंतनशील, तर्कशील, बहु – आयामी और दूरदर्शिता से भरा हुआ निर्भीक आतंरिक व्यक्तित्व विस्मित करने वाला था । संस्कृत के प्रकांड विद्वान होते हुए भी वे उस कूपमंडूकता से कोसों दूर थे जो प्रायः संस्कृत वालों की पहचान मानी जाती है । उस युग के अन्य नेता जहाँ केवल धार्मिक और सामाजिक समस्याओं के समाधान तक, और उसमें भी केवल अपने धर्म तक, सीमित रहे, वहां महर्षि दयानंद ने धार्मिक और सामाजिक के साथ ही दार्शनिक, आर्थिक, राजनैतिक एवं अन्य सांस्कृतिक समस्याओं का भी हल खोजने का प्रयास किया और एक वैज्ञानिक की भांति सभी धर्मों के अंधविश्वासों एवं तर्कहीन मान्यताओं को दूर करने की प्रेरणा दी। उस युग के अन्य नेताओं के सन्दर्भ में उनकी कतिपय विशेषताएं हमारा ध्यान विशेष रूप से आकर्षित करती हैं :–

( 1 ) उस युग के अन्य किसी भी नेता ने ” स्वराज्य ” की बात नहीं की, पर दयानंद ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो स्वदेशीय राज्य होता है वही सर्वोपरि उत्तम होता है। प्रजा पर माता – पिता के समान कृपा, न्याय और दया करने पर भी विदेशी राज्य कभी पूर्ण सुखदायी नहीं हो सकता ।

( 2 ) वे तत्कालीन भारत के सबसे पहले व्यक्ति थे जिसने राजा के “ चुनाव “ की बात करके राजनीति में जनतांत्रिक व्यवस्था स्थापित करने पर बल दिया । आज लोग इसे यूरोपीय देशों की देन मानने लगे हैं, पर स्वामी जी ने इसे ऋग्वेद में बताई “ सभा “ एवं “ समिति “ के आधार पर वैदिक परम्परा सिद्ध करके वेदों की प्रतिष्ठा बढ़ाई ।

( 3) उन्होंने अर्थ व्यवस्था की ओर भी ध्यान दिया, किसान को “ राजाओं का राजा “ कहा और कर – प्रणाली (Tax System ) ठीक करने तथा भारतीय अर्थ व्यवस्था की रीढ़ कृषि एवं गोपालन की व्यवस्था सुधारने के साथ ही कुटीर उद्योगों का विकास करने एवं पश्चिमी देशों में विकसित प्रौद्योगिकी का अध्ययन करने की उपयोगिता बताई । हम लोग महात्मा गाँधी के नमक आन्दोलन (1930 ई.) से तो परिचित हैं,पर यह नहीं जानते कि इससे लगभग छह दशक पहले ही महर्षि दयानंद ने नमक पर कर लगाने और वनों से प्राप्त होने वाले ईंधन पर कर लगाने के लिए अँगरेज़ सरकार की कटु आलोचना करके इस आंदोलन की नींव रख दी थी । साथ ही उन्होंने स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग करने की प्रेरणा दी ।

( 4 ) उन्होंने हिंदी के राष्ट्रीय महत्व की ओर तब ध्यान दिया जब हिंदू पंडित उसे तिरस्कारपूर्वक “ भाखा “ कहते थे । मूलतः गुजराती भाषी, और अपने अध्ययन एवं व्यवहार की भाषा संस्कृत होते हुए भी उन्होंने हिंदी को अपने कामकाज की भाषा बनाया। अपने ग्रंथ हिंदी ही में लिखे और हिंदी का प्रचार करना अपना लक्ष्य बनाया ।

( 5 ) हिन्दू समाज के सामाजिक, धार्मिक आदि विभिन्न प्रकार के सुधारों के लिए जहाँ अन्य नेता ईसाई धर्म और पश्चिमी समाज की नक़ल कर रहे थे, या केवल तर्क का सहारा लेकर प्रचलित परम्पराओं की निंदा कर रहे थे, वहीँ स्वामी दयानंद ने मानव धर्म के मूल आधार वेदों का सहारा लेकर सामाजिक और धार्मिक सुधार का पथ प्रशस्त किया । इस प्रकार उन्होंने वेदों की और प्राचीन भारत की महिमा उजागर की ।

(6) जिन वेदों को लोग गए – गुजरे ज़माने की चीज़ समझने लगे थे, गड़रियों के गीत कहने लगे थे, और हिंदू पंडितों ने जिन्हें धार्मिक कर्मकांड तक सीमित कर दिया था, उन्हें स्वामी जी ने “ ज्ञान – विज्ञान का कोष “ बताकर आधुनिक युग के लिए भी उनकी आवश्यकता सिद्ध की । इस प्रकार वेदों की महिमा बढ़ी और लोगों को उनके अध्ययन की प्रेरणा मिली ।

( 7 ) देश के हज़ारों वर्ष के इतिहास में वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने वेदों का अनुवाद सामान्य जन की भाषा हिंदी में किया ।

( 8 ) उस युग के अन्य सुधारकों ने जहाँ नए सम्प्रदाय बनाए, वहां महर्षि दयानंद ने कोई नया सम्प्रदाय नहीं बनाया । उन्होंने मानव संस्कृति के मूल आधार ग्रन्थ वेदों में जो कुछ कहा गया है उनमें से उन बातों को स्पष्ट करने का प्रयास किया जिन्हें वेदों के पठन – पाठन की परम्परा नष्ट हो जाने के कारण लोग भूलते चले गए, अज्ञानता के गर्त में गिरते चले गए, कूपमंडूक बनते चले गए, और फिर विभिन्न प्रकार के अंधविश्वासों से घिरते चले गए। स्वामी जी ने बार – बार कहा है कि मेरा प्रयोजन कोई नवीन मत चलाने का नहीं है, बल्कि आदि – सृष्टि से लेकर ब्रह्मा, जैमिनि पर्यंत ऋषिगण जो मानते आए हैं, उपदेश देते आए हैं, उसे ही बताना, जो सत्य है उसे मानना – मनवाना और जो असत्य है उसको छोड़ना – छुड़वाना मुझे अभीष्ट है।

उनके जिन विचारों के कारण समाज में विभिन्न स्तरों पर चेतना आई उनमें से अधिकांश का परिचय उनके अमर ग्रन्थ ” सत्यार्थप्रकाश ” से प्राप्त किया जा सकता है। यह एकमात्र ऐसा ग्रंथ है जिससे वैदिक धर्म के साथ ही तत्कालीन भारत में प्रचलित लगभग सभी मत-मतान्तरों का भी परिचय मिल जाता है । इसीलिए इसे धर्मों का विश्वकोश कहा जाता है. । ग्रंथ काफी बड़ा है। उसमें बड़े आकार के लगभग 600 पृष्ठ हैं। स्वामी जी के एक प्रशंसक राजा जयकृष्ण दास डिप्टी कलक्टर थे जो अलीगढ़, वाराणसी, बिजनौर, मुरादाबाद आदि स्थानों पर रहे। उन्हें ब्रिटिश सरकार से C I E की उपाधि भी मिली थी। उन्होंने ही स्वामी जी से यह ग्रन्थ लिखने का अनुरोध किया और पुस्तक के मुद्रण एवं प्रकाशन की जिम्मेदारी स्वयं उठाने का निश्चय किया । इतना ही नहीं, उन्होंने पुस्तक लिखने में स्वामी जी की सहायता करने के लिए पंडित चन्द्रशेखर नामक एक महाराष्ट्रीय व्यक्ति को नियुक्त कर दिया । स्वामी दयानंद ने यह ग्रन्थ बोल-बोल कर लगभग तीन महीने में लिखाया। किसी पुस्तकालय की सुविधा के बिना केवल स्मृति के आधार पर बोल- बोल कर लिखाई पुस्तक में वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों, उपनिषदों, स्मृतियों , विभिन्न दर्शन ग्रंथों, सूत्रों, महाभारत आदि 377 ग्रंथों के सन्दर्भ और 1542 वेदमंत्रों / श्लोकों के उद्धरण देख कर स्वामी जी की असाधारण स्मरण शक्ति पर आश्चर्य होता है। इसे 1875 ई. में राजा जयकृष्ण दास ने ही प्रकाशित कराया। यह पहला ग्रंथ है जिसमें दार्शनिक विषय भी हिंदी में समझाए गए हैं । पुस्तक की लोकप्रियता निरंतर बढ़ती गई और न केवल विभिन्न भारतीय भाषाओं में, बल्कि अंग्रेजी, फ्रांसीसी, चीनी, जापानी, अरबी, बर्मी, स्वाहिली आदि विश्व की प्रमुख भाषाओँ में भी इसके अनुवाद हुए । स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने इसे ऐसा ग्रंथ बताया जिसकी विद्यमानता में कोई विधर्मी हमें बहका नहीं सकता, तो प्रसिद्ध लेखक आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने इसे गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरित मानस के पश्चात हिंदी का सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रंथ बताया ।

पुस्तक में दो भाग हैं – पूर्वार्ध और उत्तरार्ध। पूर्वार्ध में दस अध्याय हैं और उत्तरार्ध में चार। इस प्रकार कुल 14 अध्याय हैं जिन्हें ‘ समुल्लास ‘ कहा है। पुस्तक के अंत में ‘ स्व मन्तव्यामन्तव्य प्रकाश ” ( मैं कौन सी बातें मानता हूँ, और कौन सी नहीं ) शीर्षक से स्वामी जी ने धर्म से संबंधित 51 ऐसे विषयों की वैदिक मान्यताओं के आधार पर बहुत संक्षेप में व्याख्या की है जिनके बारे में समाज में बहुत भ्रम फैला हुआ है ; जैसे, ईश्वर, सगुण – निर्गुण स्तुति , वेद, तीर्थ, मुक्ति, मुक्ति के साधन, प्रारब्ध (भाग्य ), पुरुषार्थ , गुरु, स्वर्ग, नरक, प्रार्थना, उपासना, आदि। इसे हम इस पुस्तक का परिशिष्ट भी कह सकते हैं, और पूरी पुस्तक का सारांश भी। इसे यदि ठीक से समझ लिया जाए तो महर्षि के मन्तव्य को भी ठीक से समझा जा सकता है।

पूर्वार्ध के दस अध्यायों में मानव जीवन का निर्माण करने वाली वैदिक विचारधारा , आश्रम व्यवस्था (अर्थात ब्रह्मचर्य – गृहस्थ – वानप्रस्थ – संन्यास की व्यवस्था), शिक्षा – दीक्षा, राजनीतिक व्यवस्था, दार्शनिक मान्यताओं, साधना पद्धति, भक्ष्य – अभक्ष्य आदि की विवेचना की गई है जो किसी विशेष “ पन्थ “ के अनुयायियों के लिए नहीं, मानव मात्र के स्वीकार करने और आचरण करने योग्य हैं। उत्तरार्ध के चार अध्यायों में भारतवर्ष में प्रचलित विभिन्न सम्प्रदायों, मत-मतान्तरों आदि की ऐसी मान्यताओं की समीक्षा की गई है जिनके कारण समाज में अन्धविश्वास, आलस्य और अज्ञान फैला है। स्वामी जी ने यह समीक्षा पूरी सदाशयता के साथ इस प्रकार की है जिससे अन्धविश्वास दूर करने की सामान्य जन को भी प्रेरणा मिले। उनके जीवनकाल में विभिन्न मतावलंबी उनकी सदाशयता से कितने प्रभावित हुए इसका एक उदाहरण है देश की पहली आर्यसमाज की स्थापना जो मुंबई में एक पारसी सज्जन डा माणेक जी अदेरजी की कोठी में हुई , जिसके प्रधान और मंत्री जैन परिवार के युवक (क्रमशः गिरधरलाल दयालदास कोठारी और पानाचंद आनंदजी पारेख) बने, और जब इस भवन का विस्तार करने का निश्चय किया गया तो सर्वाधिक दान (पांच हजार रु.) एक मुस्लिम व्यापारी (सेठ हाजी अलारखिया रहमतुल्ला सोनावाला) ने दिया । जिन लोगों ने किसी भी कारण से अभी तक यह ग्रंथ नहीं पढ़ा है, उनकी सुविधा के लिए इसके प्रत्येक समुल्लास का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत है ।

राकेश कुमार आर्य ( बागपत )

सह संपादक

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