पाश्चात्य विद्वानों की दृष्टि में उपनिषद

भारत की संस्कृति की अमूल्य धरोहर उपनिषद न केवल भारतीयों की आध्यात्मिक तृप्ति का साधन बने , अपितु उन्होंने अपने दिव्य ज्ञान की आभा से पश्चिमी विद्वानों को भी प्रभावित किया । अनेकों पश्चिमी विद्वानों ने भारत के उपनिषदों को पढ़कर अपने जीवन में भारी परिवर्तन किए । इतना ही नहीं कइयों ने तो बाइबल की शिक्षाओं को उपनिषदों की शिक्षाओं के सामने नगण्य ही घोषित कर दिया। उन्होंने अपने अनुभवों को बड़े विस्तार से लिखा । इसी प्रकार कई मुस्लिम विद्वान भी हुए हैं जिन्होंने कुरान की शिक्षाओं को उपनिषदों की शिक्षाओं के समक्ष बहुत बौना समझा ।

जिन पश्चिमी विद्वानों के लिए आत्मा और परमात्मा का संवाद सुनना तक असंभव था , उन्होंने जब ब्रह्मविद्या को उपनिषदों के माध्यम से हृदयंगम किया तो उनके हृदय के तार झंकृत हो उठे । उन्हें लगा कि जीवन और जगत की समस्याओं का वास्तविक समाधान तो उपनिषदों की ब्रह्मविद्या के पास है । जिसे समझकर कुछ और समझने के लिए शेष नहीं रह जाता । इसी अनुभूति ने पश्चिमी विद्वानों की आंखें खोलीं और उन्हें लगा कि भारत वास्तव में ‘विश्वगुरु ‘ के योग्य है । इसकी शिक्षाओं को समझकर ही विश्व वास्तविक शांति का अनुभव कर सकता है , अर्थात विश्व के वर्तमान कोलाहल से मानव समाज मुक्ति प्राप्त कर सकता है ।

भारत केअनेकों लोगों ने ईसाई धर्म को प्रगतिशील धर्म कहकर उसका अनुकरण करने का प्रयास किया है , परंतु ईसाई जगत के अनेकों विद्वानों ने उपनिषदों को पढ़कर वास्तविक प्रगतिशीलता को अनुभव किया। उन्हें लगा कि उपनिषद की शिक्षाएं ही वे शिक्षाएं हैं जो किसी भी प्रकार की जड़ता , रूढ़िवादिता और मनुष्य को बंधनों में जकड़ने वाले अविद्या और अज्ञान से मुक्त करती हैं । हमारे उपनिषदों की आध्यात्मिकता और विषय की निरपेक्षता ऐसे विशेष गुण रहे हैं , जिनसे इसाई जगत के विद्वान इनके प्रति स्वाभाविक रूप से आकर्षित होते रहे हैं । यह विद्वान उपनिषदों की धार्मिक अनुभूति तथा अध्यात्मिक जगत की रहस्यमयी गूढ़ अभिव्यक्तियों से वे चमत्कृत होते रहे हैं और मुक्त कण्ठ से इनकी प्रशंसा करते आये हैं।

अलबेरूनी नाम का अरब देश का रहने वाला विदेशी विद्वान जब भारत आया तो उसने उपनिषदों और गीता की शिक्षाओं का अध्ययन किया । उनके अध्ययन से उसे जब आत्मिक शांति प्राप्त हुई तो उसके मुंह से अनायास ही ये शब्द निकल गए —’उपनिषदों की सार-स्वरूपा ‘गीता’ भारतीय ज्ञान की महानतम् रचना है।’

दारा शिकोह शाहजहां का एक बहुत ही प्यारा बेटा था। यह राजकुमार उपनिषदों से असीम अनुराग रखता था । यही कारण था कि वह किसी भी प्रकार की सांप्रदायिकता से निरपेक्ष रहकर मानवतावाद से प्रभावित था । यदि उसकी परंपरा भारत में आगे चलती रहती तो इससे न केवल मुगल वंश को भारतवर्ष में स्थायित्व प्राप्त होता बल्कि भारत के लोग मुगल वंश को अपना मानकर उसके शासन की के स्थायित्व की कामना भी करने लगते । इस राजकुमार अर्थात शहजादे ने उपनिषदों के अध्ययन के उपरांत कहा था — ” मैने क़ुरान, तौरेत, इञ्जील, जुबर आदि ग्रन्थ पढ़े। उनमें ईश्वर सम्बन्धी जो वर्णन है, उनसे मन की प्यास नहीं बुझी। तब हिन्दुओं की ईश्वरीय पुस्तकें पढ़ीं। इनमें से उपनिषदों का ज्ञान ऐसा है, जिससे आत्मा को शाश्वत शान्ति तथा आनन्द की प्राप्ति होती है। हज़रत नबी ने भी एक आयत में इन्हीं प्राचीन रहस्यमय पुस्तकों के सम्बन्ध में संकेत किया है। ”

दारा शिकोह पर यह वैदिक धर्म के उपनिषदों का ही प्रभाव था कि वह हिंदू धर्म के प्रति बहुत ही विनम्र भाव रखता था । यह इस देश का दुर्भाग्य रहा कि उसे मारकर औरंगजेब देश का बादशाह बन गया और दारा शिकोह की परंपरा इस देश में आगे नहीं बढ़ पाई।

जर्मन दार्शनिक आर्थर शोपेन हॉवर एक ऐसा विदेशी विद्वान है जो उपनिषदों की शिक्षाओं को पाकर नाच उठा था । उसे लगा था कि आज उसने अपने जीवन का सबसे बड़ा खजाना पा लिया है । उसकी आत्मा की तृप्ति क्या हुई वह तृप्ति के आनंद में इतना भावविभोर हो गया कि उपनिषदों को सिर पर रख कर नाचने लगा। उसका मत है कि — ” मेरा दार्शनिक मत उपनिषदों के मूल तत्त्वों के द्वारा विशेष रूप से प्रभावित है। मैं समझता हूं कि उपनिषदों के द्वारा वैदिक-साहित्य के साथ परिचय होना, वर्तमान शताब्दी का सनसे बड़ा लाभ है, जो इससे पहले किसी भी शताब्दी को प्राप्त नहीं हुआ। मुझे आशा है कि चौदहवीं शताब्दी में ग्रीक-साहित्य के पुनर्जागरण से यूरोपीय-साहित्य की जो उन्नति हुई थी, उसमें संस्कृत-साहित्य का प्रभाव, उसकी अपेक्षा कम फल देने वाला नहीं था। यदि पाठक प्राचीन भारतीय ज्ञान में दीक्षित हो सकें और गम्भीर उदारता के साथ उसे ग्रहण कर सकें, तो मैं जो कुछ भी कहना चाहता हूं, उसे वे अच्छी तरह से समझ सकेंगे उपनिषदों में सर्वत्र कितनी सुन्दरता के साथ वेदों के भाव प्रकाशित हैं। जो कोई भी उपनिषदों के फ़ारसी, लैटिन अनुवाद का ध्यानपूर्वक अध्ययन करेगा, वह उपनिषदों की अनुपम भाव-धारा से निश्चित रूप से परिचित होगा। उसकी एक-एक पंक्ति कितनी सुदृढ़, सुनिर्दिष्ट और सुसमञ्जस अर्थ प्रकट करती है, इसे देखकर आंखें खुली रह जाती है। प्रत्येक वाक्य से अत्यन्त गम्भीर भावों का समूह और विचारों का आवेग प्रकट होता चला जाता है। सम्पूर्ण ग्रन्थ अत्यन्त उच्च, पवित्र और एकान्तिक अनुभूतियों से ओतप्रोत हैं। सम्पूर्ण भू-मण्डल पर मूल उपनिषदों के समान इतना अधिक फलोत्पादक और उच्च भावोद्दीपक ग्रन्थ कही नहीं हैं। इन्होंने मुझे जीवन में शान्ति प्रदान की है और मरते समय भी यह मुझे शान्ति प्रदान करेंगे।”

शोपेन हॉवर ने यह बात भली प्रकार समझ ली थी कि बाइबल का धर्म बहुत ही उथला धर्म है । क्योंकि वह मानवता को जोड़कर चलने में विश्वास नहीं रखता । यही कारण है कि उसने अनेकों देशों पर अपने विचारों को बलात थोपने का प्रयास किया है । जिसके लिए उसके द्वारा अनेकों देशों की स्वतंत्रता का हनन किया गया है । असंख्य लोगों का नरसंहार कर उन पर बलात अपना राज्य स्थापित करने के अमानवीय और पाशविक कार्य किए गए हैं । उसने यह भी अनुभव किया कि बाईबिल के धर्म के अनुयायी लोगों ने लोकतंत्र के नाम पर संपूर्ण विश्व में लोकतंत्र को स्थापित किया और लोगों का खून चूस चूस कर अपने पेट को बड़ा किया । इसके साथ – साथ उसने यह भी अनुभव किया कि उपनिषदों का धर्म मानवतावाद को प्रोत्साहित करता है और मानव को मानव से जोड़कर चलने में विश्वास रखता है । वह किसी भी प्रकार के वितंडावाद या विखंडनवाद या विभाजनकारी मानसिकता को प्रोत्साहित नहीं करता । वह मनुष्य को शांत रहकर अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित होकर जीवन जीने की कला सिखाता है। जो कि मानव जीवन का अभीष्ट है । यही कारण है कि शोपन हावर ने आगे भी कहा— ‘भारत में हमारे धर्म की जड़े कभी नहीं गड़ेंगी। मानव-जाति की ‘पौराणिक प्रज्ञा’ गैलीलियो की घटनाओं से कभी निराकृत नहीं होगी, वरन भारतीय ज्ञान की धारा यूरोप में प्रवाहित होगी तथा हमारे ज्ञान और विचारों में आमूल परिवर्तन ला देगी। उपनिषदों के प्रत्येक वाक्य से गहन मौलिक और उदात्त विचार प्रस्फुटित होते हैं और सभी कुछ एक विचित्र, उच्च, पवित्र और एकाग्र भावना से अनुप्राणित हो जाता है। समस्त संसार में उपनिषदों-जैसा कल्याणकारी व आत्मा को उन्नत करने वाला कोई दूसरा ग्रन्थ नहीं है। ये सर्वोच्च प्रतिभा के पुष्प हैं। देर-सवेर ये लोगों की आस्था के आधार बनकर रहेंगे।”

शोपेन हावर से प्रेरणा लेकर पश्चिमी जगत के अनेक विद्वानों ने उपनिषदों को पढ़ा और उनसे अपने जीवन को लाभान्वित किया।

इसके बाद अनेकों विद्वानों ने पश्चिमी जगत के विचारों का भारत के उपनिषदों के साथ सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया । उन्होंने उपनिषदों और अपने विचारों का तुलनात्मक अध्ययन किया । कई विद्वानों ने अपनी धारणाएं बदलीं और उनको यह स्पष्ट अनुभव हुआ कि भारत के प्राचीन आर्ष ग्रंथों का ही प्रभाव पश्चिमी जगत के आध्यात्मिक विचारों पर पड़ा है । यह अलग बात है कि उनकी कुछ व्याख्याएं ऐसी कर दी गई हैं जो प्रकृति और सृष्टि के नियमों के विपरीत हैं या ऐसी हैं कि जिन्हें बुद्धि संगत नहीं कहा जा सकता । इस विषय में इमर्सन का कहना है कि — ”पाश्चात्य विचार निश्चय ही वेदान्त के द्वारा अनुप्राणित हैं।”

यद्यपि मैक्समूलर ने कई स्थानों पर भारत के आर्ष ग्रंथों की ऐसी व्याख्या की है जो उचित नहीं कही जा सकती और जो आपत्ति का भी विषय है । इसके पीछे कहीं-कहीं उसका शत्रु भाव झलकता है तो कहीं कहीं यह भी माना जा सकता है कि वह संस्कृत का विद्वान नहीं था , इसलिए उससे ऐसी गलत व्याख्या होना स्वाभाविक है । इन सब बातों को अलग रखकर यदि उसके बारे में भी विचार किया जाए तो वह भी भारत के उपनिषदों से बड़ी गहराई से प्रभावित था । वह यह अनुभव कर चुका था कि भारत के उपनिषदों को पढ़कर ही मनुष्य मात्र सत्य की प्राप्ति कर सकता है और जगत के कोलाहल से अलग हटकर आत्मविजय के मार्ग पर आरूढ़ हो सकता है । उसने यह भी स्पष्ट किया कि यूरोप भी यदि उपनिषदों की शिक्षाओं को अपना ले तो उसका भी कल्याण हो सकता है और आज नहीं तो कल यूरोप को भी उपनिषदों की शिक्षाओं को अपनाने के मार्ग पर आना ही पड़ेगा। मैक्समूलर ने कहा है —” मृत्यु के भय से बचने, मृत्यु के लिए पूरी तैयारी करने और सत्य को जानने के इच्छुक जिज्ञासुओं के लिए, उपनिषदों के अतिरिक्त कोई अन्य-मार्ग मेरी दृष्टि में नहीं है। उपनिषदों के ज्ञान से मुझे अपने जीवन के उत्कर्ष में भारी सहायता मिली है। मै उनका ॠणी हूं। ये उपनिषदें, आत्मिक उन्नति के लिए विश्व के समस्त धार्मिक साहित्य में अत्यन्त सम्मानीय रहे हैं और आगे भी सदा रहेंगे। यह ज्ञान, महान, मनीषियों की महान प्रज्ञा का परिणाम है। एक-न-एक दिन भारत का यह श्रेष्ठ ज्ञान यूरोप में प्रकाशित होगा और तब हमारे ज्ञान एवं विचारों में महान परिवर्तन उपस्थित होगा।”

सुकरात , अरस्तु , प्लेटो जैसे विद्वानों को प्रस्तुत कर यूरोप ने अपने विद्वान होने का डंका पीटने का प्रयास किया । उसने यह भी प्रयास किया कि इन विद्वानों के समक्ष भारत की मनीषा बहुत बौनी है । परंतु उपनिषदों का अध्ययन करने के पश्चात पश्चिम के अनेकों विद्वानों की धारणाओं में भारी परिवर्तन आया । उन्होंने यह स्पष्ट रूप से अनुभव किया कि सुकरात , प्लेटो , अरस्तु जैसे विद्वान तो भारत की मनीषा के पैरों की धोवन मात्र हैं । उन जैसे विद्वानों के पास जितना भी ज्ञान है वह भारत की ही मनीषा का उच्छिष्टभोजन है । प्रो. ह्यूम ने इस विषय में स्पष्ट लिखा — ” सुकरात, अरस्तु, अफ़लातून आदि कितने ही दार्शनिकों के ग्रन्थ मैंने ध्यानपूर्वक पढ़े है, परन्तु जैसी शान्तिमयी आत्मविद्या मैंने उपनिषदों में पायी, वैसी और कहीं देखने को नहीं मिली।”

जीवन और जगत की अनेकों ऐसी गुत्थियां हैं जिन्हें आज तक वैज्ञानिक और पश्चिमी जगत के विद्वान लोग सुलझा नहीं पाए । अपने प्रचलित ज्ञान विज्ञान के आधार पर उन्होंने इन गुत्थियों को जितना सुलझाने का प्रयास किया उतनी ही वे उलझती चली गयीं । उन्हें ऐसे निर्मल ज्ञान की आवश्यकता सदा अनुभव होती रही , जिसे पाकर जीवन और जगत की उलझी हुई गुत्थियों को सुलझाने का कार्य संपन्न हो सके । इस विषय में प्रो. जी. आर्क ने लिखा है — ” मनुष्य की आत्मिक, मानसिक और सामाजिक गुत्थियां किस प्रकार सुलझ सकती है, इसका ज्ञान उपनिषदों से ही मिल सकता है। यह शिक्षा इतनी सत्य, शिव और सुन्दर है कि अन्तरात्मा की गहराई तक उसका प्रवेश हो जाता है। जब मनुष्य सांसारिक दुःखों और चिन्ताओं से घिरा हो, तो उसे शान्ति और सहारा देने के अमोघ साधन के रूप में उपनिषद ही सहायक हो सकते हैं। ”

जीवन और मृत्यु की पीड़ा को समझने के लिए भी पश्चिमी जगत के विद्वानों के पास कोई आधार नहीं रहा । उन्होंने इस विषय में अपनी – अपनी धारणाएं , अपने – अपने विचार और अपनी – अपनी सोच को अपने- अपने ढंग से प्रस्तुत किया । परंतु जीवन और मृत्यु की पीड़ा का कोई सही समाधान प्रस्तुत नहीं कर पाए । जब उपनिषद प्रकाश उन्होंने अपने अंतर्मन में अनुभव किया तो इस संबंध में उनकी धारणा में भारी परिवर्तन आया ।पॉल डायसन ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि — ” वेदान्त (उपनिषद-दर्शन) अपने अविकृत रूप में शुद्ध नैतिकता का सशक्ततम आधार है। जीवन और मृत्यु की पीड़ाओं में सबसे बड़ी सांत्वना है।”

डा. एनीबेसेंट भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं और वैदिक ज्ञान विज्ञान से बहुत अधिक प्रभावित हुईं । उन्होंने भारत को अपनी कर्मस्थली बनाया और भारत के वैदिक साहित्य का बड़ी गहनता से अध्ययन किया । उन्होंने उपनिषदों को भी पढ़ा और पढ़ने के पश्चात असीम शांति की अनुभूति अपने अंतर्मन में की। तब उन्होंने लिखा — ” भारतीय उपनिषद ज्ञान मानव चेतना की सर्वोच्च देन है। ”

वेबर जैसे विद्वान को भी उपनिषदों ने बड़ी गहराई से प्रभावित किया । उन्होंने लिखा है — ” भारतीय उपनिषद ईश्वरीय ज्ञान के महानतम ग्रन्थ हैं। इनसे सच्ची आत्मिक शान्ति प्राप्त होती है। विश्व-साहित्य की ये अमूल्य धरोहर है।”

उपरोक्त उद्धरणों से स्पष्ट है कि भारत के उपनिषदों ने विदेशी विद्वानों को बड़ी गहराई से प्रभावित किया है । इसके उपरांत भी जो लोग भारत में पश्चिमी ज्ञान विज्ञान और आध्यात्मिक विचारों को यह कहकर हम पर थोपने का प्रयास करते हैं कि पश्चिम का ज्ञान विज्ञान और आध्यात्मिक विचार ही प्रगतिशील है – उनकी बुद्धि पर तरस आता है ।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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