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इतिहास के पन्नों से

जब लुई फिशर को निरुत्तर कर दिया था उस वीर सावरकर ने

उन दिनों लुई फिशर भारत की यात्रा पर आये थे। देश के विभाजन की संभावनाएं बड़ी तेजी से बनती जा रही थीं। लुई को यह बता दिया गया था कि विभाजन पर कांग्रेस लगभग सहमत हो चुकी है, परंतु सावरकर और उनका दल अभी भी बड़ी कठोरता से विभाजन का विरोध कर रहा है। तब फिशर जिन्नाह से भेंट करने के पश्चात सावरकर से मिलने पहुंचे। उन्होंने सावरकर जी से पहला प्रश्न ही यह किया-‘‘आपको मुसलमानों को अलग देश देने में क्या आपत्ति है?’’

सावरकरजी अपने अतिथि के मनोभावों को पूर्व से ही समझ चुके थे। इसलिए अतिथि के प्रश्न का उत्तर भी पूर्व से ही बनाये बैठे थे। उन्होंने लुई से प्रतिप्रश्न किया-‘‘आप लोग नीग्रो लोगों की भारी मांग के उपरांत भी उन्हें अलग ‘नीग्रोस्तान’ क्यों नही दे रहे हैं?’’

इस प्रश्न के उत्तर में लुई फिशर हमारे इस आधुनिक शिवाजी के जाल में घिर गया। उसने बिना सोचे समझे कह दिया-‘‘देश का विभाजन राष्ट्रीय अपराध होगा, इसलिए नही करते।’’मानो सावरकर जी की बात को लुई फिशर ने अपने मुंह से कह दिया। सावरकरजी बोले-‘‘आपका उत्तर राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत व तथ्यपूर्ण है। हर राष्ट्रभक्त अपने देश को खंडित होना या टुकड़े-टुकड़े होने देना सहन नही कर सकता। देश का विभाजन चाहने वाले देशभक्त कदापि नही कहे जा सकते। इसीलिए हम भारत विभाजन की योजना को राष्ट्र विरोधी बताकर उसका विरोध कर रहे हैं, जबकि मुस्लिम लीगी, जो इस देश को ही नापाक मानते हैं, इसके टुकड़े करने पर तुले हैं।’’

वीर सावरकर का उत्तर सुनकर लुई फिशर के पास कोई शब्द नही थे। बाद में उन्होंने एक लेख में लिखा था-‘‘मैंने सावरकरजी के हृदय में राष्ट्रभक्ति की असीमित भावना देखी, वहीं जिन्नाह के हृदय में भारत व भारतीय संस्कृति के प्रति घोर घृणा के भाव दिखाई दिये।’’

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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