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इतिहास के पन्नों से

वीतराग संन्यासी की भांति जीवन जीने वाली राजधात्री पन्ना गुजरी

राजा का रमणीय भवन

एक सम्राट ने अपनी राजधानी के मध्य में एक बहुत बड़ा भवन बनवाया। वह भवन बहुत ही सुदृढ़ विशाल और सुंदर था। जो कोई भी राजा के पास आता वह उस भव्य भवन की प्रशंसा किये बिना नही रहता था। इससे राजा को बड़ी प्रसन्नता की अनुभूति होती थी।

एक बार एक वीतराग संन्यासी राजा के पास आया। वह राजा के साथ जितनी देर रहा, उतनी देर राजा से राजनीति की और राज्य के अन्य कार्यों व योजनाओं की चर्चा करता रहा। राजा की बार-बार इच्छा होती थी कि संन्यासी कुछ उसके भव्य-भवन के विषय में कहें, प्रशंसा करें और उसे ऐसा भव्य भवन बनाने के लिए साधुवाद दें। परंतु संन्यासी था कि वह राजा के मनोनुकूल बोलना ही नही चाहता था। तब संन्यासी को राजा ने भवन के ऐसे स्थलों पर भी घुमाया, जहां अतिरिक्त साज सज्जा हो रही थी, उसने उस संन्यासी को भवन की विशालता और सुदृढ़ अवस्था के विषय में भी बताया, परंतु संन्यासी तब भी मौन ही रहा।

अंत में राजा से रहा नही गया। उसने पूछ ही लिया-‘‘महाराज! आप मेरे भवन की प्रशंसा में एक शब्द भी नही बोले, क्या इसमें कोई दोष है या मेरे आतिथ्य सत्कार में कोई न्यूनता रह गयी है’’?

संन्यासी ने मुंह खोला-‘‘राजन, यह महल वास्तव में ही बहुत सुंदर है। इसकी सुदृढ़ता में भी कोई संदेह नही है, यह चिरस्थायी भी है। पर दुख की बात है कि इसमें रहने वाले का जीवन स्थिर नही है। यही एक दोष है जिसके कारण मैं चुप था।’’

भारतीय संस्कृति का सार है इस दृष्टांत में

जीवन का सार है इस दृष्टांत में। भारत की संस्कृति का पूरा निचोड़ पिरो दिया गया है-इस दृष्टांत में। जो यह समझ लेता है कि उस परमपिता परमात्मा के बनाये इस भव्य-भवन ब्रह्मांड में या भूमंडल पर रहने वाला शरीर धारी मानव ही अस्थिर है, यहां हर स्थिति परिस्थिति में परिवर्तन हो रहा है, हर क्षण पुरातन का स्थान नूतन ले रहा है, उसे अपने प्राणों का भय नही रहता, वह मर मिटने के लिए हर क्षण तत्पर रहता है और बलिदानों को वह बांये हाथ का खेल समझता है।

हमारा दधीचि विश्वविद्यालय

इसलिए देश-धर्म के लिए जितने बलिदान भारत ने दिये उतने किसी अन्य देश ने नही दिये। क्योंकि यहां की संस्कृति त्याग की संस्कृति है। यहां ‘दधीचि विश्वविद्यालय’ बारहों मास और चौबीसों घंटे खुला रहता है, जिसमें परहित के लिए ‘स्व’ अस्थियों का दान भी हंसते-हंसते देना सिखाया जाता है। हमारे नालंदा को जलाने वालों को क्षणिक उपलब्धि चाहे मिल गयी कि उन्होंने नालंदा जला दिया, पर वह हमारा ‘दधीचि’ नही जला पाये, यह सत्य है। कटु सत्य!! परम सत्य है!!!

इसी परम सत्य को उद्घाटित कर साक्षात रूप देने वाली एक देवी गुर्जर पुत्री (पन्नाधाय) राणा संग्रामसिंह के समय में मेवाड़ के भव्य भवनों में रहती थी। पूर्णत: ‘वीतराग संन्यासी’ थी वह। जबकि परिवर्तनशील को ही अपरिवर्तनशील मानकर उसकी साधना में लीन रहने वाला ‘बनवीर’ नाम का एक शासक था, जो विक्रमाजीत को हराकर कुछ समय के लिए सरदारों ने मेवाड़ का शासक बना दिया था। उस वीतराग संन्यासी सम जीवन व्यतीत करने वाली देवी का नाम था पन्नाधाय।

पन्नाधाय का आदर्श जीवन

अब हम उसी देवी के जीवन पर प्रकाश डालना चाहेंगे, क्योंकि भारत के मध्यकालीन स्वातंत्रय समर का इतिहास तब तक अधूरा ही माना जाएगा जब तक इस वीरांगना और कत्र्तव्यनिष्ठ संन्यासी के जीवन को और उसके व्यक्तित्व को लोगों के सामने प्रकट नही किया जाएगा।

एक शंका हो सकती है कि इस सन्नारी का देश की स्वाधीनता की लड़ाई से क्या अभिप्राय है? अथवा क्या और कैसा संबंध है? तब हमें तनिक विचार करना चाहिए कि यदि पन्नाधाय ना होती तो राणा उदय सिंह ना होते और यदि राणा उदयसिंह ना होते तो महाराणा प्रताप भी नही होते। इस प्रकार महाराणा प्रताप की निर्मिती में सीधे-सीधे पन्नाधाय का प्रशंसनीय योगदान है। इसलिए उसे मध्यकालीन स्वातंत्रय समर की एक ऐसी अमर साधिका माना जाना चाहिए जिसने अपने राष्ट्र धर्म को सर्वोपरि मानकर उसके लिए ऐसा त्याग किया कि उस जैसा अन्य कोई उदाहरण मिलना विश्व इतिहास में भी दुर्लभ है।

राजधात्री पन्ना गूजरी

पन्नाधाय के लिए दामोदर लाल गर्ग ने एक पुस्तक ‘‘राजधात्री पन्ना गूजरी’’ के प्रारंभ में ही लिखा है, -‘‘गूजर जाति के विषय में हम यहां इसलिए विचार कर रहे हैं चूंकि हमारे इस ग्रंथ की नायिका वीरमाता पन्नाधाय इसी गुर्जर वंश में उत्पन्न हुई थी। गूजर अथवा गुर्जर शब्द किसी जाति विशेष अथवा किसी भूभाग का द्योतक नही, बल्कि तत्कालीन श्रेष्ठताओं अर्थात वीरता तथा स्वामी भक्ति के आधार पर ही इन लोगों को गुरजन, गुजरान जैसे शब्दों से संबोधित किया गया था। जो कालांतर में अपभ्रंश होकर गूजर अथवा गुूर्जर के रूप में स्थापित हो गये।’’

धायमाता का स्थान

उस समय धायमाता का विशेष सम्मान था। राजदरबार में उसे विशिष्ट स्थान प्राप्त होता था। लोग धायमाता के प्रति वैसा ही आदर भाव रखते थे जैसा उसे संबंधित राजपरिवार से मिलता था। राजा लोग धायमाता के पति को भी विशेष जागीरें देकर प्रसन्न रखा करते थे और उसका सम्मान एक माई के रूप में किया करते थे। पन्नाधाय के पति सूरज को राणा संग्राम सिंह के काल में विशेष सम्मान पूर्ण पद प्राप्त था, और सूरज ने राणा संग्राम सिंह के साथ 1527 ई. में खानवा के युद्घ में लड़ते-लड़ते वीरगति प्राप्त की थी। इस प्रकार पन्नाधाय के साथ धायमाता का सम्मानजनक पद तो जुड़ा ही था, वह एक वीर कुल और वीर पति की वीरांगना नारी भी थी। इसलिए उससे सहज ही आशा की जा सकती है कि उसने जो कुछ भी किया उसे वही कर सकती थी, और उसने ही करके भी दिखाया।

राजपूत राजाओं के यहां धाय माता को रखने की परंपरा का प्रमुख कारण होता था बच्चे में अतिरिक्त वीरता के गुणों का समावेश कर दिया जाए। इसके लिए धायमाता को अत्यंत कुलीन परिवार से लिया जाता था।

धायमाता की विशेषताएं

दामोदर लाल गर्ग अपनी उक्त पुस्तक के पृष्ठ 15 पर लिखते हैं-‘‘जवान, स्वस्थ, परिश्रमशील एवं जिसके आंचल में बालक के लिए पर्याप्त दूध हो ऐसी माताएं धाय का पुनीत कार्य कर सकती है, अथवा जिस मां के स्तनों में दूध हो वह भी धायमाता बन सकती है। कहने का तात्पर्य है कि सभी जातियों में सुंदर स्वस्थ और जवान औरतें हो सकती हैं, किंतु अभी तक के सर्वेक्षण में यह देखने में आया है कि गुर्जर जाति की स्त्रियों को ही यह सम्माननीय खिताब मिलता रहा है, अन्य जातियों की माताओं को नही।’’

गूजरी होने के कारण बनी धायमाता

इस प्रकार स्पष्ट है कि पन्ना गूजरी को ही मेवाड़ जैसे सम्मानित और प्रतिष्ठित राजवंश की राजधात्री होने का सौभाग्य केवल इसलिए मिला था कि वह गूर्जर परिवार से थी। वह मूल रूप में गूजर वंश में उत्पन्न हुई थी और गुजर वंश के रणबांकुरे सूरज नाम योद्घा की पत्नी थी। वह चित्तौड़ गढ़ के पास ही स्थित माताजी की पांडोली गांव की रहने वाली थी और उसके पिता का नाम हरचंद हांकला था। वह गांव कमेरी के दशवता के वंश चौहान गूजर हिंदूजी के पौत्र गुर्जर लाला चौहान के पुत्र गुर्जर सूरजमल चौहान की पत्नी थी।

पन्ना के पिता हरचंद हांकला

पन्ना के पिता हरचंद हांकला एक वीर योद्घा थे और अनेकों युद्घों में वह राणा संग्राम सिंह के साथ रहे थे। इतना ही नही वह युद्घ में ही हुतात्मा हो गये थे। ऐसे स्वामी भक्त, देशभक्त और परम निष्ठावान योद्घा की पुत्री को धायमाता बनाना परम सौभाग्य की बात थी। कहते हैं कि रानी कर्मवती से जब उदयसिंह का जन्म हुआ तो रानी तभी से अस्वस्थ रही और निरंतर एक वर्ष गंभीर रूप से अस्वस्थ रहीं। तब उदयसिंह के लालन पालन के लिए पन्ना को धायमाता बनाया गया।

इस धाय ने अपनी स्वामीभक्ति और कत्र्तव्यनिष्ठा से सिद्घ कर दिया था कि वह जन्मजात शेरनी है और गूजरी होकर अपने कत्र्तव्य पथ से विषम से विषम परिस्थिति में भी हटने वाली नही है।

यह बनवीर कौन था?

अपने-अपने राजभवनों में अनेकों दासियां और रानियां रखने का दुर्गुण हिंदू राजाओं को मुस्लिम सुल्तानों की देखा देखी लगा। राणा संग्रामसिंह के यहां भी अनेकों दासियां थीं, उनमें से एक का नाम शीतल सैनी था। वह बहुत ही सुंदर थी, उसी के साथ संसर्ग करने से राणा संग्रामसिंह के ज्येष्ठ भ्राता पृथ्वीसिंह को उससे एक पुत्र प्राप्त हुआ। जिसका नाम बनवीर रखा गया। बनवीर को दासी पुत्र कहलाना प्रिय नही था। जबकि उस समय की सामाजिक परंपरानुसार ऐसी दासियों से उत्पन्न संतान को गोला, या दासी पुत्र कहकर ही संबोधित किया जाता था। इन लोगों को कोई विशेषाधिकार नही होते थे और ये राज्य के उत्तराधिकारी भी नही हो सकते थे।

बनवीर इस प्रकार की स्थिति को अपने लिए दुर्भाग्यपूर्ण मानता था, इसलिए वह अन्य राजकुमारों से घृणा करता था और राज्यप्राप्ति की उसकी लालसा बढऩे लगी। राज्यप्राप्ति के लिए बनवीर कुछ भी करने को तत्पर था। अंत में उसका सपना एक दिन साकार हुआ और ‘श्री राणा बनवीर’ के रूप में राज्यसिंहासन पर बैठने में सफल हो गया।

उदयसिंह को राणा संग्राम सिंह ने ही सौंपा था पन्ना को

1527 ई. में जब महाराणा संग्राम सिंह बाबर का सामना करने के लिए तैयारियां कर रहे थे और उसको परास्त करने के लिए चित्तौड़ से निकल लिए तो उनका विशाल सैन्य दल बयाना की ओर बढ़ रहा था। उस समय महाराणा की छोटी राणी (राणा से ही राणी शब्द बना है, रानी तो अंग्रेजी माध्यम से पढ़े लोगों ने ‘ण’ का ‘न’ बनाकर पढऩा आरंभ कर दिया है) कर्मवती अपने दो पुत्रों विक्रमादित्य और उदयसिंह के साथ रणथंभौर के दुर्ग में रह रही थी। राणा ने यह दुर्ग उन्हें जागीर के रूप में प्रदान कर दिया था। राणी कर्मवती के साथ ही पन्नाधाय भी निवास कर रही थी। बयाना की ओर बढ़ते राणा को अचानक अपने पुत्रों का स्मरण हो आया, हृदय में वात्स्ल्य भाव उत्पन्न हुआ और वह उनसे मिलने चल दिया।

रणथंभौर पहुंचे राणा संग्रामसिंह

रणथंभौर के दुर्ग में प्रवेश करते महाराणा को देखकर प्रसन्न चित्त राणी ने अचानक ही कह दिया कि आज किस शत्रु का नाश करने के लिए यह वीरों वाला भेष धारण किया है? राणा ने कहा कि ‘राणी बाबर जिस प्रकार निरंतर आगे बढ़ता आ रहा है, उससे हमारी चिंताएं बढ़ रही हैं, और चित्तौड़ के लिए महासंकट उत्पन्न हो गया है, इसलिए उसका विनाश करने के लिए वह वेश धारण किया गया है।’

राणी ने यह सुनकर अपने पति की आरती उतारी, मस्तक पर अपने हाथों से तिलक किया और राणा को अपने हाथों से तेग पकड़ाकर एक सच्ची हिंदू क्षत्राणी की भांति उसे विदा करने लगी। तभी राणा के सामने उसके दोनों पुत्र आ जाते हैं, जिनके साथ पन्ना गूजरी भी थी। राणा की दृष्टि जब अपने कनिष्ठ पुत्र उदयसिंह पर पड़ी तो उसे देखकर राणा को अत्यंत हर्ष हुआ। तब महाराणा ने पन्ना की ओर देखा और उसे संबोधित कर कहने लगे-‘‘न राणी करूणावती (करमेती, कर्मवती कर्णवती, कर्णावती) और नही किसी दास दासी वरन इस पुत्र की रक्षा का विश्वास मुझे एकमात्र तुझ पर है। हाड़ी की कोख से उत्पन्न और तेजी से गोद में पलित युद्घ में संसार को मात देने वाली यह राणा की संतति है इसलिए हे पन्ना, इसे मेरी धरोहर मानकर पालन कर। इसके लिए तू ही देवी तू ही देवता और तू ही इसकी संरक्षिका है, समुचित सार संभाल करते रहना। तेरा पति सूरज जैसे मेरा अंगरक्षक होकर मेरे साथ है वैसे ही तू भी कुंवर उदय की अंगरक्षिका बनकर रहना।’’

इस प्रकार राणा ने अपने पुत्र की संरक्षिका, अंगरक्षिका और सब कुछ पन्ना गूजरी को नियुक्त कर दिया था। जब मृत्यु निकट होती है तो कई बार व्यक्ति ऐसी बातें कह दिया करता है, जिन्हें सुनने समझने वाला व्यक्ति अपनी धरोहर समझकर आजीवन उनके प्रति कत्र्तव्यबद्घ रहता है।

पन्नाधाय ने आजीवन स्मरण रखे राणा के बोल

पन्नाधाय से महाराणा यहां पहली बार मिले थे, और कदाचित यही उन दोनों की अंतिम भेंट भी थी। अत: यह भेंट और इस भेंट में महाराणा का अंतिम आदेश पन्ना के लिए ‘ओ३म् नाम’ की माला बन गया, जिसे उसने जीवन भर जपने का संकल्प ले लिया।

राणी कर्मवती ने भी उदयसिंह दे दिया पन्ना को

पन्ना गूजरी ने राणा के द्वारा दी गयी आज्ञा को अपनी श्वांसों में बसा लिया, राणा के देहावसान के पश्चात एक दिन वह भी आया जब राणी कर्मवती ने भी ‘जौहर’ कर लिया और वह भी संसार की ओर से नेत्र बंद करने से पूर्व अपने पुत्र को सुयोग्या पन्नाधाय को सौंपकर चली गयी।

ऐसी परिस्थितियों में पन्ना का महत्व और दायित्व दोनों ही बढ़ गये। इतिहास की अनमोल निधि बनी यह वीरांगना भली भांति जानती थी कि धायमाता बनने का कार्य कितना महत्वपूर्ण है और उसमें भी यदि महाराणा अपने आपको उसे कुछ बता जाएं तो उस समय उसका महत्व कितना बढ़ जाता है? राणा के शब्दों को सुनकर पन्नाधाय को न केवल प्रसन्नता हुई थी अपितु उसका सीना गौरव से फूल भी गया था। वह श्रद्घा और विनम्रता से झुक गयी और ईश्वर से अपने लिए मिले नये दायित्व को पूर्ण कराने के लिए शक्ति देने की प्रार्थना करने लगी। क्योंकि अब वह चंदन के साथ-साथ उदय सिंह की भी माता हो गयी थी। मेवाड़ का भविष्य और ‘उदय’ होता सूर्य अब उसके हाथों में था। पन्ना के लिए परीक्षा की घड़ी

इस क्षत्राणी वीरमाता के लिए धैर्य और परीक्षा की घड़ी तब आयी जब 17 मार्च 1527 ई. को उसका पति सूरजमल युद्घ क्षेत्र में हुतात्मा हो गया। अपने पति के वीरगति प्राप्त करने के समाचार को पाकर पन्ना मूचर््िछत होकर गिर पड़ी थी, वह जौहर नही कर सकती थी, क्योंकि उसके पति तो अपने ऋण से उऋण होकर संसार से चले गये थे परंतु वह अभी अपने ‘ऋण’ से मुक्त नही हो सकती थी। यूं तो पति, पत्नी सामान्यत: एक साथ मिलकर किसी भी प्रकार के ऋण से उऋण होने का प्रयास किया करते हैं और उसमें सफल भी हो जाते हैं, पर पन्ना के लिए यह भी संभव नही था। पति-पत्नी चाहकर भी एक दूसरे की सहायता नही कर सकते थे।

असीम कष्टों को झेलती पन्नाधाय

विषमताएं और विपरीत परिस्थितियां ही व्यक्ति के धैर्य और साहस का पता दिया करती हैं। पन्ना ने वैधव्य के असहनीय कष्ट को सहना आरंभ किया। ईश्वर ने उसे संबल और आत्मबल प्रदान किया और संभलते हुए पुन: आगे बढऩे लगी। वह असहाय नही थी, वह निराश नही थी, वह दुर्बल नही थी, जैसा कि उसे दिखाया जाता है। इसके विपरीत उसमें उच्चतम श्रेणी का आत्मविश्वास था, आत्मबल था और आत्मप्रेरणा थी जिनके आधार पर वह उठी, संभली और चल दी अपने लक्ष्य की ओर।

पन्ना के प्रति राणी कर्मवती के मार्मिक वचन

जब पन्ना का पति वीरगति को प्राप्त हुआ था तो राणी कर्मवती ने उसे ढांढस बंधाते हुए जो कहा वह भी बड़ा ही मार्मिक था। राणी ने कहा-‘‘हे धात्री धैर्य धारण कर, तेरी गोद सूनी नही है, अपितु तू तो दो-दो बच्चों की माता है, तुझे चंदन और उदय को बड़ा भी तो करना है क्योंकि ये दोनों अभी अबोध ही हैं। हे पन्ना! तू राजकुल की धाय है, तुझे ऐसी व्याकुलता शोभा नही देती….देख मेरे स्वामी भी घायलावस्था में हैं।’’

स्वामी ने अपने छोटे कुंवर को भी तुझे ही संभलवाया हुआ है, इसलिए तू कोई साधारण मां नही है, अपितु ‘मेवाड़ मुकुट’ की धायमाता है। तेरा सम्मान और पद मेरे से भी बड़ा है। अरे पन्ना तुझे तो गर्व होना चाहिए कि तेरे पिता ने जैसे स्वामी की सेवा करते हुए अपने प्राण न्यौछावर किये थे उसी प्रकार आज तेरे पति सूरज ने भी स्वामी की रक्षा में अपने प्राणों का उत्सर्ग किया है। तेरा पति कायर की भांति नही मरा, अपितु अपनी छाती पर खेल खाकर सिधारा है, पन्ना तेरे कुल को मेवाड़ कभी भुला नही पाएगा? हां तूने कहा था कि मैं उदय को सूर्य की भांति चमकाऊंगी। इस स्थिति में तू वैसा कैसे कर पाएगी? इसलिए वीर पुत्रों की माता बनकर तू धैर्य धारण कर और महाराणा को दिये वचनों को स्मरण कर ‘सारा मोल चुकावसी, वचन निभावण काज।’’ इसलिए तू हताश मत हो। ध्यान रख जब तक संसार में मेरे पति का नाम रहेगा, तब तक तेरे पति सूरन्ज का सूरज मेवाड़ की धरा पर चमकता ही रहेगा। अरी मूर्ख तुझे तो अपने पति की वीरगति पर गर्व होना चाहिए।’’

पन्ना करने लगी अमरता की साधना

इस प्रकार राणी कर्मवती ने क्षत्राणी वीरमाता को ढांढस बंधाया और वह सन्नारी अपने कत्र्तव्य पथ पर आरूढ़ हो आगे बढऩे लगी। उसकी वास्तविक परीक्षा की घड़ी तो अभी आने वाली थी, जो भारतीय इतिहास में उसे अमरता दिलाने में सहायक बनने वाली थी। पन्ना उसी अमर दायिनी भूमिका के लिए अपने आपको तैयार करने लगी। इसलिए अब उसका पूरा ध्यान अपने दोनों पुत्रों के लालन-पालन पर रहने लगा। मेवाड़ पर राणा सांगा के पश्चात पहला शासक राणा रतन सिंह था, जबकि दूसरा शासक विक्रमादित्य (विक्रमाजीत) स्वयं उदयसिंह का बड़ा भाई और राणी कर्मवती का ज्येष्ठ पुत्र था। पर पन्ना को इससे क्या लेना देना था, वह तो शांतमना अपने कत्र्तव्य पर ध्यान दे रही थी। वह वर्तमान से निरपेक्ष रहकर भविष्य को पाल रही थी।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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