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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से वंदे मातरम पर बवाल क्यों ?

वंदे मातरम पर बवाल क्यों ? अध्याय – 3

स्वराज्य, विश्व कल्याण और वंदेमातरम

  • डॉ राकेश कुमार आर्य

वेद ने अपने राष्ट्र के नागरिकों से अर्थात आर्यजनों से राष्ट्र को महान बनाए रखने के संदर्भ में विशेष अपेक्षा की है। उसका मानना है कि राष्ट्र के निवासी ऊंचे चरित्र वाले हों। ऊंचे चिंतन वाले हों। ऊंची सोच वाले हों। उनके विचारों में महानता हो। वाणी में महानता हो और कार्य में महानता हो।
स्वामी दयानंद जी महाराज ‘ सत्यार्थ प्रकाश’ के प्रथम समुल्लास में यजुर्वेद के ब्राह्मण वचन को उद्धृत करते हुए कहते हैं :-

यन्मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति,
यद्वाचा वदति तत् कर्मणा करोति,
यत् कर्मणा करोति तदभिसम्पद्यते ॥

अर्थात ” जीव जिसका मन से ध्यान करता उसको वाणी से बोलता, जिसको वाणी से बोलता उसको कर्म से करता, जिसको कर्म से करता उसी को प्राप्त होता है।”
यजुर्वेद के इस ब्राह्मण वचन पर यदि विचार किया जाए तो पता चलता है कि राष्ट्र के नागरिक मनसा – वाचा- कर्मणा बहुत ही पवित्र होने चाहिए। उनकी कथनी करनी में किसी प्रकार का अंतर नहीं होना चाहिए । उनके आचार , विचार और उच्चार में समानता होनी चाहिए। इस प्रकार की समानता किसी भी राष्ट्र और उसके समाज को महान बनाती है। वेद ने राष्ट्र के नागरिकों को एकता के सूत्र में पिरोने के लिए और उनके ऊंचे चरित्र से मानवता रूपी धर्म की रक्षा किए रखने के उद्देश्य से इस प्रकार की आचार संहिता का निर्माण किया। इस प्रकार की आचार संहिता के माध्यम से वेद कदम-कदम पर हमारी रक्षा करता है। वेद हमारी रक्षा करता है ,इसीलिए वह हमारे लिए धर्म की व्यवस्था करता है। क्योंकि धर्म भी वही है जो हमारी रक्षा करता हो। हमको धारण करता हो। हमें संसार के छल फरेबों से बचाता हो।

सर्वत्र वेद का डंका बजता रहा

वेद प्रतिपादित इस प्रकार की आचार संहिता को अपनाकर भारत के प्राचीन काल के आर्यजन अर्थात राष्ट्र के नागरिक संपूर्ण विश्व के गुरु के रूप में कार्य करते रहे। सर्वत्र वेद का डंका बजता रहा। अनाचार, पापाचार, अत्याचार कहीं पर नहीं था। सर्वत्र शांति थी। सुव्यवस्था थी। लोग एक दूसरे के साथ मिलकर कार्य करते थे। आचार , विचार और उच्चार की एकता अर्थात मनसा – वाचा- कर्मणा कथनी – करनी की एकता व हृदय की पवित्रता और चरित्र की ऊंचाई धर्म की रक्षा का आधार था। लोग एक दूसरे पर भरोसा करते थे। एक दूसरे का सहयोग करते थे । एक दूसरे के प्रति समर्पित रहने में आनंद की अनुभूति करते थे। यही भारत का समाजवाद था।
वेद ने कहा कि सत्य, ज्ञान (ब्रह्म), तप और धर्म – ये राष्ट्र के आधार हैं। जिस राष्ट्र के नागरिक सत्य, ज्ञान, तप और धर्म को धारण करने वाले होते हैं,उनके अनुसार आचरण करने वाले होते हैं और उनके अनुसार अपनी साधना को ऊंचाई देते हैं, उनका राष्ट्र उन्नति को प्राप्त होता है। उसमें सुव्यवस्था होती है। इनसे राष्ट्र मजबूत बनता है। राष्ट्र के संदर्भ में वेद की यह व्यवस्था भी बहुत ही महत्वपूर्ण है :-

सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति ।
सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु ॥ ( अथर्व १२.१.१ )

भावार्थ : इस वेद मंत्र के माध्यम से राष्ट्र के नागरिकों को संदेश दिया गया है कि उन्हें सत्य का उपासक होना चाहिए, महानता (बृहत्) का साधक होना चाहिए , ऋत अर्थात ब्रह्मांडीय व्यवस्था को बनाए रखने में सहायक होना चाहिए। राष्ट्र की उन्नति के लिए उन्हें उग्र तप करने से पीछे नहीं हटना चाहिए। दीक्षा (शिक्षा) के विस्तार के लिए कार्य करना चाहिए, तपस्या (तप) का जीवन धारण करना चाहिए, ब्रह्म (ब्रह्मचर्य/ज्ञान) और यज्ञ (त्याग/अनुष्ठान) करने में किसी प्रकार का प्रमाद नहीं करना चाहिए।

मनुष्यों को इन नियमों का पालन करना चाहिए

हमें यह समझ लेना चाहिए कि ये सभी गुण (सत्य, नियम, तपस्या, ज्ञान, त्याग) मानव धर्म के पालन करने में सहायक होते हैं। जिनके पालन करने से ही पृथ्वी टिकी रह सकती है। यदि मनुष्य अपने धर्म पालन में इन गुणों का परित्याग कर देता है तो उससे पृथ्वी पर अनेक प्रकार की कठिनाइयों, समस्याओं और आपदाओं का प्रादुर्भाव होता है। इसलिए संपूर्ण पृथ्वी पर शांति सुव्यवस्था बनाए रखने के लिए अर्थात सृष्टि का कल्याण करने के लिए मनुष्य को इन नियमों का पालन करना चाहिए। उपरोक्त मंत्र में राष्ट्र को मजबूत करने का उपाय बताया गया है इसमें राजा से अपेक्षा की गई है कि वह उग्र हो। उग्र का अभिप्राय आतंकवाद से नहीं है। उग्र का अभिप्राय है कि राजा तेजस्वी हो। जो लोग अपनी आतंकी सोच से या विखंडन भरी सोच से राष्ट्र का अहित करते हों या उसे तोड़ने के कामों में लगे हों, उनके प्रति राजा को पूर्ण तेजस्विता के साथ कदम उठाने चाहिए। उसका यह तेजस्वी स्वरूप ही इसका उग्र होना है अर्थात देश विरोधी शक्तियों को उसके तेजस्वी स्वरूप से भय निरंतर सताता रहे।
इसी मंत्र में ऋतु की बात भी कही गई है। ऋतु का अर्थ है ब्रह्मांडीय व्यवस्था। इसमें सारी खगोलीय घटनाएं आ जाती हैं। अंतरिक्ष की सारी घटनाओं का समावेश हो जाता है। सूर्य चंद्रमा की गति और उसका दिन रात पर प्रभाव भी समाहित हो जाता है। इस प्रकार ऋतु का अभिप्राय हुआ कि राष्ट्र में ऐसे खगोलविद अंतरिक्ष विज्ञानी भी होने चाहिए, जो इस प्रकार के सारे ज्ञान- विज्ञान को जानते हों।
इस प्रकार की सुंदरतम व्यवस्था भारत का स्वराज्य था। जिसका लाभ संपूर्ण विश्व उठा रहा था। सर्वत्र वैदिक व्यवस्था का डंका बज रहा था। कहीं पर किसी प्रकार का अन्याय अथवा शोषण नहीं था।
धीरे-धीरे इस व्यवस्था में पतन के लक्षण दिखाई देने लगे और यह व्यवस्था एक दिन पतन को ही प्राप्त हो गई। तब हमारे राष्ट्र की दुर्गति हुई। राष्ट्र के चिंतन में विकार आया तो राष्ट्र की सीमाएं सिमटने लगीं। चिंतन के विकार ने राष्ट्र को अस्वस्थ कर दिया।

वंदे मातरम और राष्ट्र जागरण

जब राष्ट्र अस्वस्थ होता है तो उसे स्वस्थ करने के लिए महापुरुष फिर से उग्र तप करते हैं। उग्र साधना करते हैं।
इतिहास में उनके इस प्रकार के उग्र तप अथवा साधना को किसी आंदोलन अथवा अभियान के नाम से जाना जाता है। उस आंदोलन या अभियान को वह महापुरुष किसी नारे के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया करते हैं। जिससे एक शब्द पूरे राष्ट्र की चेतन को झंकृत करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है। उस एक शब्द से यह स्पष्ट करने का प्रयास किया जाता है कि हमारे राष्ट्र की दुर्गति से हमें इसे बाहर निकालना है और इसके लिए इसे इसके प्राचीन स्वरूप में स्थापित करना है। यदि अपने देश के क्रांतिकारी स्वाधीनता आंदोलन पर विचार किया जाए तो वंदेमातरम एक ऐसा ही नारा था, जिसने हमारे स्वाधीनता आंदोलन का वह मंतव्य स्पष्ट करने में सफलता प्राप्त की जो उसका निहित अर्थ था अर्थात राष्ट्र का जागरण और फिर उसे उसके प्राचीन गौरवपूर्ण वैभवशाली स्थान पर स्थापित करना।

स्वाधीनता प्राप्ति का आदर्श

संपूर्ण भारतवर्ष के क्रांतिकारी नेताओं और आंदोलन के योद्धाओं ने एक ही चिंतन, एक ही आदर्श , एक ही लक्ष्य और एक ही उद्देश्य के प्रति समर्पित होकर कार्य किया था कि हमें अपना देश स्वाधीन करना है । स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात उसे उसका प्राचीन स्वरूप प्रदान करना है। उनके चिंतन में यह भी स्पष्ट था कि हम स्वाधीनता के पश्चात किसी विदेशी व्यवस्था के पिछलग्गू नहीं बनेंगे अर्थात अपनी प्राचीन वैदिक व्यवस्था के अनुरूप अपने समाज को और अपनी संस्कृति को बचाने और अपने समाज को उसी के अनुरूप ढालने का प्रयास करेंगे। किसी भी स्थिति में हम विदेशों की ओर नहीं देखेंगे। विशेष रूप से बौद्धिक संपदा के क्षेत्र में हम अपने स्वयं के बौद्धिक बल और मेधाशक्ति के आधार पर राष्ट्र निर्माण के कार्य में जुटेंगे। इस ऊंची आदर्श लक्ष्य साधना को ‘वंदेमातरम’ ने प्रकट किया। लोगों के मन मस्तिष्क में उतारने में सफलता प्राप्त की कि हम अपनी मातृभूमि की वंदना करते हुए एक ऐसा भारत बनाना और बसाना चाहते हैं जो अपने प्राचीन आर्यजनों के सपनों के अनुरूप हो।

वेद मंत्र पर विचार

अब वेद के उपरोक्त मंत्र “सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा….” पर थोड़ा विचार करते हैं। वेद का यह मंत्र जहां हमारे राष्ट्र को मजबूत करने की प्रेरणा हमको देता है, उसके सूत्र हमको प्रदान करता है, वहीं यह हमारे वंदेमातरम का आधार सूत्र भी कहा जा सकता है अर्थात हमें राष्ट्रवाद की शिक्षा देने वाले उन अनेक वेद मंत्रों में से यह मंत्र एक ऐसा बीज मंत्र है जो प्राचीन काल से हमें अपनी मां भारती अथवा अपने राष्ट्र के प्रति समर्पित रहने, उसे मजबूत करने और उसके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए प्रेरित करता आया है।
इस मंत्र के माध्यम से हमको प्रेरणा मिलती है कि हमें सत्य का उपासक होना चाहिए अर्थात उस परमपिता परमेश्वर का उपासक होना चाहिए जो इस सृष्टि का आधार है, संचालक है और अंत में संहारक भी है। हमें समझना चाहिए कि हम एक ही पिता की संतानें हैं और एक ही पिता की संतान होने के कारण हम सबके भीतर एक ही जैसा रक्त प्रवाहित होता है अतः हमको किसी भी प्रकार के वैमनस्य को पालने की आवश्यकता नहीं है । जिस प्रकार एक ही पिता की अनेक संतानें एक साथ मिलकर रहती हैं , उसी प्रकार हमें भी एक साथ मिलकर रहने का प्रयास करना चाहिए। परमपिता परमेश्वर द्वारा निर्धारित एक ही धर्म अर्थात वेद धर्म के हम मानने वाले हैं। धर्म हमारे लिए जोड़ने की वस्तु है । लड़ाने की वस्तु नहीं है। संसार में जितने भर भी मजहब हैं वे सब हमको तोड़ते हैं। परस्पर लड़ाते हैं।

हमें बृहत का उपासक होना चाहिए

हमें महानता का अर्थात बृहत का उपासक होना चाहिए। हमारे चिंतन में महानता हो, हमारी वाणी में महानता हो और हमारी कृति में भी महानता हो। महान वह नहीं है जिसने संसार में रहकर अपने लिए कुछ किया, दूसरों की संपत्तियों पर अधिकार किया, दूसरों की बहन बेटियों के साथ बलात्कार किया। दूसरों का धन छीना। लोगों को मारा और अपना विशाल साम्राज्य स्थापित किया। इसके विपरीत भारतीय विचारधारा में अथवा वैदिक चिंतन में महान वह है जिसने दूसरों के लिए जीवन जिया। दूसरों की संपत्तियों के को लेकर लोभ नहीं पाला। दूसरों की बहन बेटियों को अपनी मां, बहन या बेटियों के समान माना। दूसरों के धन का संरक्षण किया। किसी के जीवन को छीना नहीं बल्कि दूसरे लोगों अथवा जीवधारियों के जीवन का सम्मान किया। वैदिक चिंतन के इस प्रकार के आदर्श को पकड़कर जो जीवन जीते हैं ,उन्हीं का जीवन महानता की साधना करने वाला जीवन होता है अथवा महानता में ढला हुआ जीवन होता है। ऐसे स्वभाव के लोगों से हिंसक जीवधारी भी प्रेम करते हैं।
हमारे यहां पर अनेक ऐसे महात्मा हुए हैं जिनके प्रवचनों को सुनने के लिए या जिनके प्रति सम्मान का भाव व्यक्त करने के लिए स्वयं शेर जैसा हिंसक प्राणी भी आकर शांत होकर बैठ जाया करता था। इस प्रकार की ऊंची साधना जीवन को महानता में ढालती है। वेद का यह मंत्र इसी प्रकार की ऊंची साधना के लिए मानव मन को चेतनित कर रहा है। उससे कह रहा है कि यदि संसार में आकर वास्तव में महानता के कीर्तिमान स्थापित करने हैं तो अपने आप को उस महान की महान साधना में ढालने का प्रयास कर।
वेद की भावना का सम्मान करते हुए हम लोगों को संसार में रहते हुए ऋत अर्थात ब्रह्मांडीय व्यवस्था को बनाए रखने में सहायक होना चाहिए। ब्रह्मांडीय व्यवस्था हमें जहां व्यवस्था के प्रति जागरूक करती है, वहीं हमें सृष्टि विज्ञान के बारे में भी जानकारी देती है कि ये सारी व्यवस्था किसी विज्ञान के आधार पर चल रही है और इस व्यवस्था का बनाने वाला भी कोई है। व्यवस्था, व्यवस्थापक और व्यवस्थापिका के प्रति हमें सावधान रहना चाहिए। इसका अभिप्राय है कि हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले हों। ब्रह्मांड की व्यवस्था कैसे चल रही है ? इसका सूक्ष्म विज्ञान राष्ट्र के नागरिकों को अर्थात आर्यों को समझ आना चाहिए। उस पर उनका अनुसंधान चलना चाहिए।
जितना ही हम सृष्टि के उस सूक्ष्म ज्ञान विज्ञान के बारे में जानकारी लेते चले जाते हैं, उतना ही हम संसार की इस व्यवस्था को बनाए रखने में सहायक होते चले जाते हैं। हमारा शुद्ध, निर्मल, पवित्र ज्ञान हमें संसार के प्रति शुद्ध , निर्मल और पवित्र बनाता है। जिससे हम संसार के लोगों के साथ समन्वय बनाने की कला में पारंगत होते चले जाते हैं। राष्ट्र के नागरिक परस्पर सद्भाव और मित्रता का व्यवहार करते हुए एक दूसरे के प्रति विनम्र रहने का प्रयास करते हैं। जिससे सात्विकता पूरे समाज का श्रृंगार बनकर वास करती है।

अंधकार मिटा ,पाखंड मिटा,
ब्रह्मांड रचा जगनायक ने,
महान दयालु ,महा कृपालु
प्रकाश रचा सुख- दायक ने।
शुद्ध बताया – बुद्ध बताया
उसे मुक्त बताया गायक ने,
रचयिता वही सारे जग का,
महत्व बताया गुण गायक ने।।

आगे वेद का मंत्र कहता है कि राष्ट्र की उन्नति के लिए राष्ट्र के नागरिकों को उग्र तप करने से पीछे नहीं हटना चाहिए। उग्र तप का अभिप्राय है कि राष्ट्रवासियों को तेज धारी होना चाहिए। राष्ट्र को दुर्बल करने वाली शक्तियों के प्रति उन्हें कठोर होना चाहिए। कितनी ही समस्याओं का समाधान उग्रता से ही निकलता है। उग्रता का अभिप्राय आजकल आतंकवाद से लिया जाता है, जबकि ऐसा नहीं है। उग्रता का अभिप्राय उस तेजबल की साधना से है , जिसके सामने आतंकवादी अथवा देश, समाज और राष्ट्र के शत्रु लोगों का मनोबल टूट जाता है। राष्ट्र की मुख्यधारा से इतर जाकर राष्ट्र को कमजोर करने के उनके सारे प्रयास असफल हो जाते हैं। ऐसे लोगों के विरुद्ध यदि सभी राष्ट्रवासी एकताबद्ध होकर खड़े हो जाएं तो एक भी व्यक्ति राष्ट्र को दुर्बल करने के बारे में सोच नहीं सकता अर्थात ढूंढने से भी राष्ट्र का कोई शत्रु दिखाई नहीं देगा। आजकल लोग भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर राष्ट्र को दुर्बल करने के हर संभव प्रयास कर रहे हैं। जिस राष्ट्र के भीतर तेजबल होता है अर्थात उग्रता की साधना शासक वर्ग के द्वारा जहां की जाती है , वहां पर राष्ट्र को दुर्बल करने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता।

शिक्षा का महत्व

वेद का मंत्र आगे कह रहा है कि दीक्षा (शिक्षा) के विस्तार के लिए कार्य करना चाहिए। शिक्षा का विस्तार देश के नागरिकों के भीतर सुसंस्कार उत्पन्न करता है। उन्हें सुसंस्कृत बनाता है। शिक्षा हमें राष्ट्रवादी बनाती है अर्थात हमें मानव मानव के बीच समन्वय स्थापित करने की कला सिखाती है। जो शिक्षा मानव मानव को एक दूसरे से दूर करे, उनके भीतर सांप्रदायिकता का विस्तार करे या उन्हें जातिवाद की बात समझाने का प्रयास करे या उन्हें किसी प्रकार की अन्य ऐसी संकीर्णता में प्रविष्ट कराने में सफल हो जाए जो मानव को मानव के प्रति ही घृणा के भावों से भरती हो तो वह शिक्षा शिक्षा नहीं कहीं जा सकती। स्वामी दयानंद जी महाराज राष्ट्र में एक ही प्रकार की शिक्षा अर्थात समान शिक्षा लागू करने के समर्थक थे। स्वामी जी महाराज की मान्यता थी कि समान शिक्षा लोगों को एक ही जैसे भावों से भरती है और उन्हें अपने समाज और राष्ट्र के प्रति समर्पित करती है। शिक्षा का सांप्रदायिकीकरण करना राष्ट्र को संकट में डालना होता है। शिक्षा को सहज सरल तो होना ही चाहिए उसे मानव निर्माण से राष्ट्र निर्माण करने वाली भी होना चाहिए। इस प्रकार की शिक्षा हमें वैश्विक नागरिकता प्रदान करती है, क्योंकि इस प्रकार की शिक्षा के ग्रहण करने से हम व्यापक और विशाल दृष्टिकोण वाले हो जाते हैं। हमारे व्यक्तित्व का विस्तार होता है और हम संपूर्ण संसार के कल्याण के भावों से भर जाते हैं।

संसार के द्वंद भाव और मानव जीवन

वेद मंत्र की मान्यता है कि हमें तपस्या (तप) का जीवन धारण करना चाहिए। संसार में रहते हुए अनेक प्रकार के कष्ट हमारे जीवन में आते हैं। कई क्षण ऐसे आते हैं जिनमें हमें दूसरे के साथ समन्वय स्थापित करना कठिन हो जाता है। भूख – प्यास ,सर्दी – गर्मी आदि के ताप-संताप भी परेशान करते हैं। संसार अनेक प्रकार के द्वंद्वभावों से भरा हुआ है। उन सबके बीच रहकर भी मुस्कुराना तप करना होता है। अनेक प्रकार के लोगों को सहन करना उनके साथ कष्ट झेलते हुए भी साथ चलना तपस्या की बहुत बड़ी साधना होती है। राष्ट्र के भीतर भी अनेक प्रकार के जन होते हैं, उन सभी के साथ सामंजस्य बैठाना बहुत आवश्यक होता है । यह आवश्यक नहीं होता कि जैसे आप हैं अथवा जैसे आपके विचार हैं वैसे ही दूसरे लोग होंगे अथवा उनके विचार भी वैसे ही होंगे । विभिन्नताएं सर्वत्र बिखरी हुई दिखाई देती है । परंतु इन विभिन्नताओं को अपने विशाल और व्यापक दृष्टिकोण के चलते समन्वित करना और एक दूसरे को झेलने व समझने का भाव विकसित करना तपस्या होती है। जब सभी राष्ट्रवासी इस प्रकार की भावनाओं से भरे हुए होते हैं तो वे एक दूसरे के भावों का सम्मान करते हुए राष्ट्र निर्माण के कार्य में जुटे रहते हैं।

अंत में वेद मंत्र कहता है कि ब्रह्म और यज्ञ करने में किसी प्रकार का प्रमाद नहीं करना चाहिए। ब्रह्म ब्रह्मचर्य और ज्ञान का प्रतीक है ,जबकि यज्ञ त्याग और अनुष्ठान का प्रतीक है। राष्ट्र के नागरिक ब्रह्मचर्य और ज्ञान की साधना करने वाले हों। दूसरे , त्याग और अनुष्ठान करने वाले हों। ब्रह्मचर्य की साधना और उसका ज्ञान राष्ट्र के नागरिकों के चरित्र को ऊंचा करता है। जिससे मर्यादाओं का पालन करने में सहायता मिलती है। लोग सभी की प्रतिष्ठा का ध्यान रखते हैं। एक दूसरे की प्रतिष्ठा का ध्यान रखते हैं। जब कोई लंपट किसी की बहन बेटी के साथ कोई बलात्कार आदि का केस कर डालता है तो सामान्यतया लोग कहते हैं कि अमुक व्यय ने अमुक महिला या अमुक परिवार की प्रतिष्ठा पर हाथ डाल दिया है तो इसका अभिप्राय यही होता है कि उस लंपट व्यक्ति ने किसी की प्रतिष्ठा को मिट्टी में मिला दिया है या उस परिवार की इज्जत को मिटाने का काम किया है।
जब हमारे देश में रहकर विदेशी शासक अंग्रेज या उनसे पहले मुस्लिम हमारे राष्ट्र की एकता और अखंडता के साथ खिलवाड़ कर रहे थे उसके सामाजिक मूल्यों अर्थात सत्य, बृहत, ऋत आदि का हनन कर रहे थे, तब राष्ट्र जागरण का कार्य आरंभ हुआ। राष्ट्र जागरण का अभिप्राय है कि राष्ट्र के उपरोक्त मूल्यों पर चिंतन मंथन होना आरंभ हुआ।

स्वामी दयानंद जी महाराज ने कहा कि वेदों की ओर लौटो और वहां जाकर इस बात को ढूंढने का प्रयास कीजिए कि राष्ट्र का निर्माण कैसे होता है ? अथवा राष्ट्र को मजबूती कैसे मिलती है ? तब वेदों के माध्यम से राष्ट्र जागरण की चासनी तैयार की जाने लगी। उस चासनी में मिठास घोलने में वंदेमातरम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वेद मंत्र तो अपने आप में एक बीज का काम करते ही हैं ,वंदेमातरम ने उस बीज को और भी सूक्ष्म बना दिया। उस सूक्ष्म ने जब अपना आकार लिया तो उससे अनेक बरगद पैदा होने लगे। विदेशी सत्ता जिस प्रकार हम पर निर्ममता से अत्याचार कर रही थी, वंदेमातरम के नारे ने उसके पैरों के तले की धरती खिसका दी। सारे देश में वंदेमातरम का नारा हमारी राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बन गया। वंदेमातरम बोलने का अभिप्राय था हम सब एक हैं। हम सब की दिशा एक है। हम सब की सोच एक है। हम सब का लक्ष्य एक है। हम सब वैदिक धर्मी है और हमारा सबका एक ही उद्देश्य है कि प्रचलित क्रूर व्यवस्था को क्रांति की लपटों में धू- धू कर जलने के लिए मजबूर कर दिया जाए।

– डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)

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