वैदिक संपत्ति 272 वेदमंत्रों के उपदेश

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(ये लेखमाला हम पं. रघुनंदन शर्मा जी की ‘वैदिक सम्पत्ति’ नामक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहें हैं)

प्रस्तुतिः देवेन्द्र सिंह आर्य
(चेयरमैन ‘उगता भारत’)

जो लोग कहते हैं कि प्राचीन सायं सन्तान के पीछे दिवाने फिरते थे, वे गलती पर हैं। मोक्षार्थी आर्य कभी सन्तान की इच्छा नहीं करते थे। क्योंकि अथर्ववेद में लिखा है कि ‘ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाध्नत’ अर्थात् तपस्वी विद्वान् आजीवन ब्रह्मचर्य-बल से ही मृत्यु को मारकर मोक्ष प्राप्त करते हैं। सच है, जो मनुष्य दूसरों को उत्पन्न नहीं करता वह निश्वय ही दूसरों के द्वारा उत्पन्न नहीं होता । उत्पन्न न होने का सबसे सुगम तरीका यह है कि मनुष्य आजीवन ब्रह्मचारी रहे। परन्तु यह महाव्रत सबके मान का नहीं है। सब मनुष्य तो सन्तान की इच्छा ही करते हैं। इसीलिए दूसरे प्रकार के भी प्रमाण मिलते हैं। इन प्रमाणों के अनुसार सन्तान की इच्छा करना अच्छा भी समझा गया है। क्योंकि इसमें दो लाभ हैं। एक तो सन्तान से गृहस्थाश्रम कायम रहता है जिसके आश्रय में सारा मनुष्य समाज जीविका प्राप्त करता है और दूसरा वीर्य में पड़े हुए जीव बाहर आकर मोक्षप्राप्ति की साधना करते हैं। यदि सन्तान का जन्म ही न हो तो वे प्राणी जो अन्य योनियों से घूमकर अब मनुष्य शरीर के द्वारा मोक्ष में जानेवाले हैं, सब बीच ही में फंसे रह जायें। इसलिए अत्यन्त आवश्यक है कि योग्य पुरुष एक दो सन्तान को अवश्य उत्पन्न करके और शिक्षा दीक्षा से योग्य बनाकर समाज को बल पहुँचावे और उन्हें मोक्षमार्गी बनावे। यह बात आर्यसभ्यता में बड़े महत्त्व की है और आर्यसमाज को पुष्ट करनेवाली है। इसीलिए आपत्तिरहित समाज के समय में आर्यों को एक सन्तान उत्पन्न करने के लिए बल दिया गया है। मनुस्मृति में लिखा है कि-

ज्येष्ठेन जातमात्रेण पुत्री भवति मानवः । (मनु० 9/106)

स एव धर्मजः पुत्रः कामजानितरान्विदुः । (मनु० 9/107 )

अर्थात् प्रथम पुत्र के उत्पन्न होते ही मनुष्य पुत्री हो जाता है। अतः ज्येष्ठ पुत्र ही धर्मज है और दूसरे सब कामज हैं। इस प्रमाण से पाया जाता है कि वैदिक आर्यसभ्यता के अनुसार एक ही सन्तान उत्पन्न करना चाहिये, अधिक नहीं। कई सन्तान उत्पन्न करने से कामुकता का संस्कार हो जाता है और यह दोष समाज और मोक्ष दोनों का बाधक हो जाता है। वेद स्वयं आज्ञा देते हैं कि बहुत सी सन्तान उत्पन्न न करना चाहिये। ऋग्वेद 1।164।32 में लिखा है कि ‘ बहुप्रजा निच्छ तिमा विवेश’ अर्थात् बहुत सन्तानवालों को बहुत दुःख उठाना पड़ता है। इसलिए ऋग्वेद 3/1/ 6 में आशा देते हैं। हैं कि ‘सना अत्र युवतयः सयोनीरेकं गर्भ दधिरे सप्त वाणीः’ अर्थात् सप्तपदी (विवाह) की हुई युवती स्त्रियाँ एक ही गर्भ धारण करें। इन प्रमाणों से सूचित होता है कि सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आर्यों को एक ही सन्तान उत्पन्न करने की आशा है, अधिक की नहीं। कदाचित् एक भी पुत्र उत्पन्न न हो तो कोई चिन्ता करने की बात नहीं। पुत्र के अभाव की चिन्ता से कुछ लोग दूसरे का पुत्र गोद लेते हैं पर वह वेदानुकूल नहीं है। क्योंकि वेद में दत्तक पुत्र गोद लेने का निषेध किया गया है। ऋग्वेद में लिखा है कि-

नहि प्रभायारणः सुशेबोऽन्योदर्यो मनसा मन्तवा उ ।
अधा चिदोकः पुनरित्स एत्या नो वाज्यभीषाडेतु नव्य । (7/4/8)

अर्थात् जो दूसरे के पेट से उत्पन्न हुआ है उसको कभी अपना पुत्र नहीं समझना चाहिये । अन्योदर्य पुत्र का मन सदैव बहीं जायगा जहाँ से वह आया है, इसलिए अपने ही पुत्र को पुत्र समझना चाहिये। अपना भी एक ही पुत्र पुत्र है शेष कामज हैं अतः यह एक पुत्र का सिद्धान्त दूसरी श्रेणी का ऐतिहासिक प्रमाण है। इस प्रमाण के अनुसार अपना भी एक ही पुत्र उत्तम है, अनेक नहीं। किन्तु कभी कभी आवश्यकता पड़ने पर कई सन्तानों की भी आवश्यकता होती है अतः तीसरी श्रेणी के भी प्रमाण मिलते हैं। जिसने राष्ट्रों के इतिहास पढ़े हैं वह जानता है कि कभी कभी राष्ट्रको बहुत सी सन्तानों की भी आवश्यकता हो जाती है। युद्धों के समय में अथवा युद्ध समाप्त हो जाने पर अनेक युवा पुरुषों के मारे जाने के कारण कभी कभी राष्ट्र पुरुषों से शून्य हो जाता है। महाभारत के समय अथवा गत योरोपीय महायुद्ध के समय अनेक राष्ट्रों को इस प्रकार की स्थिति का सामना करना पड़ा है और एक एक पुरुष ने कई कई स्त्रियों के साथ विवाह या नियोग करके भी अनेक सन्तानों को उत्पन्न किया है। ऐसी ही आपत्ति के समय के लिए वेद में ‘ दशास्यां पुत्रानाधेहि अर्थात 10 पुत्रों के उत्पन्न करने की प्रार्थना की गई है। इस प्रकार से आर्य सभ्यता में प्रजोत्पत्ति के तीन सिद्धांत स्थिर किए गए हैं।

क्रमशः

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