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वैदिक संपत्ति

वैदिक सम्पत्ति – 267 आर्य गृह, ग्राम और नगर

(यह लेखमाला हम पंडित रघुनंदन शर्मा जी की ‘वैदिक सम्पत्ति’ नामक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।)

प्रस्तुति: देवेंद्र सिंह आर्य
(चेयरमैन ‘उगता भारत ‘)

गतांक से आगे …

आर्य -गृहस्थी में यन्त्रों का भी समावेश है। पर वैदिक यन्त्र वही हैं, जो किसी पशु या मनुष्य का कर्म क्षेत्र संकीर्ण नहीं करते। आर्य सभ्यता में ऐसे यंत्रों का समावेश नहीं है, जो किसी पशु की सहायता के बिना केवल स्प्रिंग, स्टीम अथवा विद्युच्छक्ति के द्वारा थोड़े से मनुष्यों की सहायता से चलाये जायें और जिनको कारण हजारों पशुओं और मनुष्यों का कर्मक्षेत्र रुक जाय । वैदिक यन्त्रों का नमूना सूत कातने का पुराना चर्खा, कपड़ा बुनने का पुराना साँचा और बर्तन बनाने का कुम्हार का पुराना चक्र है। परन्तु अवैदिक यन्त्र आजकल के मोटर, ट्राम, रेल और मिलइंजिन हैं, जिनके कारण लाखों पशु और मनुष्य निकम्मे, निरुपयोगी और भाररूप हो गये हैं। यन्त्र हिंसाकारी हैं, इसलिए आर्य सभ्यता में इनका समावेश नहीं है। आार्ययन्त्र तो वही है जो सनातन से पशुओं और मनुष्यों के द्वारा चलाये जाते हैं । इसलिए आर्य-गृहस्थी में उनका संग्रह अवश्य होना चाहिये ।

आर्य गृहस्थी में शस्त्रास्त्र भी आवश्यक हैं। प्राचीन कुल्हाड़ी, आरा, बसूला, निहाय, हतौड़ा, संसी, सूई, कैथी अस्तुरा, धनुषबाण, तलवार और भाला आदि आर्य सभ्यता के शस्त्रास्त्र हैं। इनमें किसी प्रकार की कला का प्रयोग नहीं होता, इसीलिए ये आर्य सभ्यता में गिने जाते हैं। किन्तु जिनमें कला का योग होता है, वे अन्य प्राणियों का कर्मक्षेत्र रोकनेवाले होते हैं, इसीलिए वे आार्य सभ्यता में नहीं गिने जाते । परन्तु आर्यों के घरों में शस्त्रास्त्रों का रहना बहुत ही आवश्यक है, अतएव सादे शस्त्रास्त्र ही आर्य-गृहस्थी में स्थान पाने योग्य हैं। गृहस्थी से सम्बन्ध रखनेवाले इन सात प्रकार के पदार्थों के अतिरिक्त यदि और कोई वस्तु गृहस्थी में उपयोगी और आवश्यक समझी जाय, तो उसका भी संग्रह करना चाहिये। पर इस बात का सदैव ध्यान रखना चाहिये कि आर्य-गृहस्थी की चीज वही हो सकती है, जिसके प्राप्त करने में न किसी प्राणी की कोई हानि हो, न मनुष्य-समाज में असमानता और ईर्ष्या उत्पन्न हो और न उसके प्राप्त करने में अपने को ही कष्ट करना पड़े, प्रत्युत जो पदार्थ आसानी से सबको एक समान प्राप्त हो सकें वही आर्य-गृहस्थी में सम्मिलित हो सकते हैं। क्योंकि मोहक पदार्थों का संग्रह करके मनुष्यों में प्रकरणान्तर से चोरी की प्रकृति उत्पन्न कराना आर्य सभ्यता के विपरीत है। आर्य सभ्यता में चोरी के लिए गुंजायश नहीं है। यही कारण है कि आर्यों की भाषा संस्कृत् में ताला और चाभी के लिए कोई शब्द नहीं है। इसलिए आर्यो की ऐसी ही गृहस्थी हो सकती है, जिसके लिए ताला चाभी का प्रबन्ध न करना पड़े।

यहाँ तक हमने आर्यों के अर्थ की चारों शाखाओं की आलोचना करके देखा तो ज्ञात हुआ कि जिस ढंग से वे इस सृष्टि से अर्थ का संग्रह करते हैं, उससे न तो किसी भी प्राणी को कोई कष्ट ही होता है और न आर्यो के लोक-परलो कसम्बन्धी उद्देश्यों की पूर्णता में कोई रुकावट ही होती है, प्रत्युत सृष्टि की सीधी (मनुष्य), आड़ी (पश्वादि) और उलटी (वृक्षादि) समस्त योनियों के देन -लेन में सामञ्जस्य उत्पन्न हो जाता है और सबके लिए मोक्ष मार्ग सरल हो जाता है। क्योंकि आर्य लोग अपने अर्थ के चारों विभाग प्रायः पशुओं और वृक्षों से ही लेते हैं और उनकी आयु तथा भोगों का सदैव ध्यान रखते हैं। वे जानते है कि जिस प्रकार मनुष्यों को पशुओं और वृक्षों की आवश्यकता होती है, उसी तरह पशुओं को वृक्षों और वृक्षों को जलों की आवश्यकता होती है। इसलिए वे सदैव कृषि और जङ्गलों के द्वारा पशुओं के लिए अन्न और घास का तथा यज्ञों के द्वारा वनस्पतियों के लिए जलों का प्रबन्ध करते हैं। वे इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि मनुष्य का जीवन केवल अकेली एक गाय के दूध से ही पार हो सकता है और गाय केवल जङ्गलों की घास पर ही बसर कर सकती है। इसीलिए आर्यो ने अपनी सभ्यता की परिभाषा में मनुष्यों को प्रजा, पशुओं को प्रजापति और वृक्षों को पशुपति कहा है। इसका यही मतलब है कि प्रजा को पशु पालते हैं ओर पशुओं को बनस्पतियाँ पालती हैं। वेद में सैकड़ों जगह पर मनुष्य को ‘प्रजया सुबीराः’ कहा गया है। इसी तरह शतपथ ब्राह्मण में पशुओं को प्रजापति कहा गया है। वहां पूछा गया कि ‘कतमः प्रजापतिरिति’ अर्थात् प्रजापति कौन है ? तो उत्तर दिया गया है कि ‘पशुरिति’ अर्थात् पशु ही प्रजापति है। जिस प्रकार पशुओं को प्रजापति कहा गया है, उसी तरह वृक्षों को पशुपति कहा है। शतपथ ब्राह्मण ३।२।१२ में लिखा है कि ओषधयो वै पशुपतिः तस्मात् यदा पशव ओषधीः लभन्ते अथ पतीयन्ति’ अर्थात् औषधि ही पशुपति हैं, अतः जब पशु औषधियाँ खाते हैं तभी स्वामी के कार्यक्षम होते हैं। इसी तरह यजुर्वेद १६।१७ में भी वृक्षेभ्यः हरिकेशेभ्यो पशूनां पतये नमः लिखकर वृक्षों को हरितकेशवाले पशुपति कहा गया है। तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार प्रजा (मनुष्य) का पालन पशु करते हैं और पशुओं का पालन वृक्ष करते हैं उसी तरह लौटकर मनुष्य भी पशुओं से घी लेकर और वृक्षों से काष्ठ लेकर यज्ञ करताहै और यज्ञ से पानी बरसाकर वृक्षां का भी पालन करता है जिससे वृक्ष, पशु और मनुष्य आदि सभी प्राणी पूर्ण आयु जीकर और अपने अपने कर्मफलों को भोगकर मोक्ष मार्ग के पथिक बन जाते हैं। यही आर्यों के अर्थशास्त्र का मूल है और यही आार्यों के अर्थ की प्रधानता का सारांश है।
क्रमशः

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