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वैदिक संपत्ति

वैदिक सम्पत्ति – 270 चतुर्थ खण्ड वेदों की शिक्षा

(ये लेखमाला हम पं० रघुनाथ शर्मा जी की वैदिक सम्पत्ति नामक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।)

प्रस्तुति – देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन ‘उगता भारत

सन्तति-बिस्तार का भयङ्कर चित्र खींचते हुए प्रो० माल्थस आदि प्रजनन शास्त्री कहते हैं कि संसार में जन संख्या सदैव बढ़ती रहती है और उस वृद्धि को प्रकृति सदैव दुष्काल, महामारी और युद्धों के द्वारा न्यून किया करती है। इसलिए यदि दुष्काल, महामारी और युद्धों के सन्ताप से बचना है और यदि बहु सन्तानजन्य दारिद्रध से बचना है तो सन्ताननिरोध का उपाय करना चाहिये, अन्यथा एक दिन ऐसा आनेवाला है कि जनसंख्यावृद्धि के कारण पृथिवी पर तिल रखने की भी जगह न रहेगी। इस आशङ्का को ध्यान में रखकर पाश्चात्य विद्वानों ने सन्ततिनिरोध के तीन तरीके निश्चित किये हैं। पहिले तरीके में उन्होंने कहा है कि कुछ ऐसे यन्त्रों का उपयोग किया जाय जिससे गर्भ ही न ठहरे, दूसरा तरीका यह बतलाया है कि ऐसी औषधियाँ खा ली जायें कि सन्तान का उत्पन्न होना ही बन्द हो जाय और तीसरा तरीका यह बतलाया है कि इन्द्रियसंयम के द्वारा अखण्ड ब्रह्मचर्य धारण किया जाय जिससे सन्तान की वृद्धि रुक जाय । इन तीनों तरीकों का अब तक जो अनुभव हुआ है वह बड़ा ही दुःखद है। यन्त्रों और औषधियों के उपयोग से अनेकों प्रकार की व्याधियाँ उत्पन्न हुई हैं जिनके कारण लाखों स्त्री और पुरुष दुःख पा रहे हैं। मि० थस्र्स्टन ने इन यन्त्रों और औषधियों के दुष्परिणामों का बड़ा ही लोमहर्षण वर्णन किया है। अब रहा इन्द्रियनिग्रह, वह इन दोनों से भी भंयङ्कर है। इन्द्रियनिग्रह करना किसी ऐसे वैसे साधारण मनुष्य का काम नहीं है। उसे तो बहुत ही योग्य पुरुष कर सकते हैं। जो योग्य हैं उन्हीं से योग्य सन्तान भी उत्पन्न हो सकती है। परन्तु यदि योग्य मनुष्य संयम करके योग्य सन्तान का उत्पन्न करना बन्द कर दें और अयोग्य अर्थात् नालायक मनुष्य सन्तान का उत्पन्न करना जारी रक्खें तो परिणाम यह होगा कि भविष्य में समस्त पृथिवी नालायक प्रजा से ही भर जायगी और फिर वही दुष्काल, महामारी, युद्ध और दुःख दारिद्रथ से मनुष्यों का संहार होने लगेगा। इसलिए योग्यों को तो कभी सन्ततिनिरोध के फेर में पड़ना ही न चाहिये ।

अब रहे अयोग्य; सो वे संयम कर नहीं सकते, इसलिए पश्चिमीय विद्वानों के ढूंढ़े हुए तीनों तरीके उपयोगी सिद्ध नहीं हुए। परन्तु आर्यसभ्यता शोभा, शृङ्गार, ठाट बाट और आमोद प्रमोद को हटाकर सादे और यत्किञ्चित् अर्थ के द्वाना बिना किसी प्रकार का अर्थसंकट उत्पन्न किये, अपने ब्रह्मचर्य व्रत से समस्त मनुष्यों को मोक्षाभिमुखी बना कर सन्ततिविस्तारजन्य अर्थसंकट की उलझन को बहुत ही अच्छी तरह सुलझाती है। हमने आर्यों के अर्थ का विस्तृत वर्णन करके दिखला दिया है कि आर्यसभ्यता में बनाव चुनाव, शोभा सिंगार और ठाट बाट के लिए बिलकुल ही स्थान नहीं है। आर्यों का अर्थ बिलकुल ही सादा है, इसलिए उसमें कामुकताजन्य अर्थसंकट के उपस्थित होने के लिए कुछ भी आशंका नहीं है। रही सन्ततिविस्तार की बात, उसको आर्यों ने अपनी एक विशेष शक्ति के द्वारा बहुत ही अच्छी तरह हल किया था। उन्होंने शृङ्गारशून्य किन्तु सादे अर्थ के द्वारा ब्रह्मचर्य व्रत को धारण करके ऊध्वंरेतत्व और अमोपवीर्यत्व की शक्ति से वह सामर्थ्य प्राप्त कर लिया था, जिससे वे जब चाहते थे तब आवश्यक सन्तान उत्पन्न कर लेते थे और जब चाहते थे तब सन्तान का उत्पन्न करना एकदम बन्द कर देते थे। ऐसी मनोनिग्रह-शक्ति का सम्पादन आज तक संसार में कोई भी सभ्य जाति नहीं कर सकी। यही कारण है कि संततिनिरोध के जटिल प्रश्न को भी काज तक कोई जाति हल नहीं कर सकी। इसलिए हम यहाँ आर्यों की सन्ततिनिरोध की शक्ति और नीति का सारांश देकर बतलाते हैं कि किस प्रकार उन्होंने इस दुरूह समस्या को हल किया है।

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