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इतिहास के पन्नों से हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

हिंदू राष्ट्रनीति व हिंदवी स्वराज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज (क)

सन 1674 तक शिवाजी अधिकांश प्रांतों या क्षेत्रों पर अपना अधिकार स्थापित कर चुके थे जो उन्हें पुरंदर की संधि के अंतर्गत मुगलों को देने पड़े थे । अतः अब वह अपने आपको राजा घोषित कराने की तैयारी करने लगे थे । उधर मुगलों ने जब शिवाजी महाराज के उद्देश्यों को समझा तो उन्होंने शिवाजी को रोकने के लिए अपनी ओर से प्रयास करने आरंभ कर दिए । मुगलों ने यह घोषित करा दिया कि यदि उनके राज्य का कोई ब्राह्मण शिवाजी का राज्याभिषेक करेगा तो उसका वध कर दिया जाएगा ।
शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक से पूर्व षड्यंत्रकारियों ने कई प्रकार के प्रश्न उठाने का प्रयास किया । उनमें से सबसे पहला प्रश्न यह था कि शिवाजी किस वर्ण के हैं ? कवि भूषण ने अपनी प्रख्यात कृति ” शिवराज भूषण ” में भोंसले घराने को सिसोदिया राजपूत क्षत्रिय लिखा है। इसी प्रकार साह जी महाराज ने कर्नाटक से बीजापुर दरबार को एक पत्र में यह सम्मान पूर्वक लिखा बताते हैं — ” आम्हे तो राजपूत ” – हम तो राजपूत हैं ।(संदर्भ : “छत्रपति शिवाजी” लेखक डॉ. प्रभाकर माचवे, प्रकाशक : ग्रंथ विकास सी 37 राजा पार्क, आदर्श नगर, जयपुर पृष्ठ : 75)

उनका पराक्रम , उनका शौर्य ,उनके गुण ,कर्म ,स्वभाव – सब क्षत्रिय वाले थे । वह क्षत्रिय ही थे – यह निर्विवाद है , पर राज्याभिषेक के समय यह प्रश्न उठाया गया कि उनका उपनयन यज्ञोपवीत संस्कार नहीं हुआ था । फिर उसका भी हल निकाला गया कि राज्याभिषेक से पूर्व यदि उनका यज्ञोपवीत किया जाए तो यह कठिनाई भी दूर हो जाएगी और वह छत्र सिंहासन के अधिकारी भी होंगे । यह निर्णय दिया था तत्कालीन विद्वान गागा भट्ट तथा अनंत देव भट्ट ने , जो उस धार्मिक संस्कार संस्कार के प्रमुख पुरोहित थे । इसलिए शिवाजी ने धर्म और परंपरा को मानते हुए पंडितों को चर्चा का अवसर प्रदान किया और उन्हीं की राय को स्वीकार किया। “

शिवाजी का राज्यारोहण

डॉक्टर कमल गोखले को उद्धृत करते हुए प्रभाकर माचवे ने लिखा है — “यह दिन शिवाजी महाराज के जीवन को ही नहीं , उनके चरित्र महाराष्ट्र तथा जनमानस के लिए भी एक अभूतपूर्व घटना थी । शिवाजी ने राज्याभिषेक से 20 वर्ष पूर्व अपने शौर्य एवं धैर्य से अपने पिताश्री द्वारा अर्जित जागीर को एक स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थापित किया था । यवनों तथा विदेशों से आए पश्चिमी व्यापारियों पर शिवाजी के पराक्रम की पूरी तरह से धाक जम चुकी थी। उन्होंने गढ़ और किले जीते थे । थलसेना और नौसेना का गठन किया था । इस कार्य के पीछे शिवाजी का प्रमुख उद्देश्य था – अपनी प्रजा में विश्वास जगाना। वह अपनी प्रजा के प्रिय नेता थे । उन्हें अपने रक्षक से स्थायित्व की भावना प्राप्त हुई थी।” (संदर्भ : “छत्रपति शिवाजी” लेखक डॉ. प्रभाकर माचवे, प्रकाशक : ग्रंथ विकास सी 37 राजा पार्क, आदर्श नगर, जयपुर पृष्ठ : 73)

यद्यपि शिवाजी अपने प्रांत में सत्ताधारी थे , लेकिन जब तक वे राजा की पदवी प्राप्त नहीं कर लेते , सामान्य नागरिक ही माने जाते । वह एक नागरिक के रूप में प्रजा की निष्ठा एवं भक्ति पर कोई विधिक अधिकार प्राप्त नहीं कर सकते थे , और जब तक प्रमाणिक अधिकारों की पवित्रता एवं सत्यता प्राप्त नहीं कर सकते थे , तब तक वैध रूप से किसी भूमि पर अधिकार नहीं कर सकते थे। वैसे महाराष्ट्र में एक राज्य की स्थापना तो हो चुकी थी ,परंतु वह राज्य राजाविहीन था । शिवाजी महाराज को राज्यपद की एवं अधिकार की कभी कोई अभिलाषा नहीं रही , लेकिन इन सब कठिनाइयों को देखते हुए शास्त्रोक्त रूप से राज्याभिषेक करा लेना ही एक युक्तिपूर्ण उपाय था ।

जब शिवाजी की जय जयकार और राज्याभिषेक की चर्चा हो रही थी तो मोहिते जाधव तथा निबालकर आदि सरदार घराने में शिवाजी के प्रति ईर्ष्या होने लगी । शिवाजी इन लोगों की आंखें खोलना चाहते थे कि अपनों की चाटुकारिता की अपेक्षा गर्व से रहना ही श्रेयस्कर है । शिवाजी चाहते थे कि यह सरदार घराने भी आगे आएं और देश को विदेशियों के शिकंजे से मुक्त करा कर स्वतंत्र राज्य की स्थापना में सहयोग करें ।

“शिवाजी ने जिस पराक्रम का प्रदर्शन किया , जो ख्याति अर्जित की , जो राज्य अर्जित किया ,राज्याभिषेक और राजा का पद भी उसी का एक परिणाम है । जो लोग सोचते हैं कि शिवाजी ने संत महंतों को विशेष महत्व देकर धर्म की रूढिगत कल्पनाओं को नया रूप दिया तो वह यह भूल जाते हैं कि प्रबल सत्ताधारियों से विरोध करने के लिए जनता का साथ लेकर उनमें उत्तेजना भरना भी आवश्यक है ,और जनता जो धर्म ,परंपरा , निष्ठा में अटूट श्रद्धा रखती है उसे उसी दृष्टि में उत्साहित किया जा सकता है । शिवाजी महाराज अभिषिक्त राजा बने । लेकिन उनका उद्देश्य व ध्येय समाज एवं देश कल्याण ही रहा। राजपद को लेकर उन्होंने समाज को कभी लूटा नहीं , जो दुखी व निरीह थे , उन्हें शिवाजी ने सांत्वना दी — स्वराज की प्रतिष्ठा पाने की। “ ( वही पुस्तक पृष्ठ 74)

अपने राज्यारोहण से पूर्व शिवाजी के निजी सचिव बालाजी ने काशी में तीन दूतों को भेजा । काशी उन दिनों मुगल साम्राज्य के अधीन था ।काशी पहुंचकर शिवाजी के दूतों ने वहां के ब्राह्मणों को यह संदेश दिया कि वह शिवाजी महाराज के राजतिलक के लिए यहां से ब्राह्मणों को लेने के लिए आए हैं , तो ऐसा समाचार सुनकर काशी के ब्राह्मणों ने बहुत ही प्रसन्नता व्यक्त की । जब मुग़ल सत्ताधीशों और उनके सैनिकों को इस बात का पता चला कि शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के लिए काशी से ब्राह्मण आ सकते हैं तो उन लोगों ने काशी के ब्राह्मणों पर अत्याचार करना आरंभ कर दिया । यद्यपि यह ब्राह्मण लोग अपने बौद्धिक चातुर्य से इन मुगल सैनिकों के चंगुल से बच निकलने में सफल हो गए ।

जिन ब्राह्मणों को मुगलों के सैनिकों ने बलात रोककर रखा था , वही उनकी आंखों में धूल झोंककर दो दिन पश्चात ही अचानक रायगढ़ में पहुंचने में सफल हो गए। वहां जाकर उन्होंने वह महान कार्य संपादित किया जिसे शिवाजी के राज्याभिषेक के नाम से इतिहास में जाना जाता है । इन ब्राह्मणों का वास्तव में यह बहुत ही बड़ा और सराहनीय कार्य था । जिसमें उन्होंने अपने साहस का भी परिचय दिया था।

शिवाजी ने विभिन्न राज्यों के दूतों, प्रतिनिधियों के अतिरिक्त विदेशी व्यापारियों को भी इस समारोह में आमंत्रित किया था । यद्यपि उनके राज्याभिषेक अर्थात 6 जून 1674 के 12 दिन पश्चात ही उनकी माता का देहांत हो गया था । यह भी ध्यान देने योग्य तथ्य है कि शिवाजी ने अपने राज्यारोहण के साथ ही हिंदवी स्वराज्य या हिंदू पद पातशाही की स्थापना की थी । माता जीजाबाई का इस प्रकार बिछुड़ना शिवाजी के लिए बहुत बड़ा आघात था। क्योंकि शिवाजी के निर्माण में माता जीजाबाई का महत्वपूर्ण योगदान रहा था । यदि माता जीजाबाई उनके जीवन में मां के रूप में ना रही होती तो निश्चय ही शिवाजी जिस रूप में हमें इतिहास में दिखाई देते हैं , उस वंदनीय स्वरूप में वह ना होते । तब बहुत संभव था कि वह एक सामान्य व्यक्ति का जीवन जीकर संसार से चले गए होते ।

माता जीजाबाई के इस प्रकार देहांत होने के पश्चात 4 अक्टूबर 1674 को दूसरी बार शिवाजी ने छत्रपति की उपाधि ग्रहण की। दो बार हुए इस समारोह में उस समय लगभग 50 लाख रुपये खर्च हुए थे ।
इस समारोह में हिन्दू स्वराज अर्थात हिंदू राष्ट्र की स्थापना का उद्घोष किया गया था। शिवाजी संपूर्ण भारत को एक ईकाई के रूप में देखते थे और मराठा ,सिक्ख ,जाट, गुर्जर आदि की संकीर्णताओं से ऊपर उठकर वह सारे बहुसंख्यक समाज को हिंदू नाम से अभिहित करना अधिक श्रेयस्कर और उपयुक्त समझते थे । उनके इस दृष्टिकोण को इतिहासकारों के एक वर्ग ने चाहे समझने का प्रयास न किया हो , लेकिन अन्य इतिहास लेखकों को उनके इस प्रयास को समझना ही पड़ेगा। तभी हम शिवाजी के समग्र चिंतन और समग्र व्यक्तित्व का निरूपण करने में सक्षम हो सकेंगे।

जितना ही हम शिवाजी को मराठा नाम की किसी जाति विशेष से बांधने का प्रयास करेंगे या उनको वर्तमान की सबसे मूर्खतापूर्ण अवधारणा अर्थात धर्मनिरपेक्षता के छद्मवादी सिद्धांत के साथ बांधने का प्रयास करेंगे , उतना ही हम उनके महान व्यक्तित्व के साथ न्याय करने में असफल सिद्ध होंगे ।

यह मात्र एक संयोग नहीं है कि जिस समय दक्षिण के एक महत्वपूर्ण विजयनगर साम्राज्य का पतन हो रहा था उसी समय शिवाजी का उत्थान हो रहा था । हम इसे भारत के ‘पुनरुज्जीवी पराक्रम ‘ का प्रतीक मानते हैं । जब – जब कहीं हम पतन की ओर जा रहे होते थे , तब – तब ही हम फिर से अपने पुनरुज्जीवी पराक्रम का परिचय देते हुए यह सिद्ध करने में भी सफल होते रहे कि हम जीना जानते हैं और गर्व के साथ आगे बढ़ना भी जानते हैं । यह एक अद्भुत संयोग है कि जब हमारे एक राजवंश का पतन हो रहा होता था तो उसी समय कहीं दूसरे स्थान पर हिंदू जनमानस अंगड़ाई ले रहा होता था । हिंदू राज्य वंश की अंगड़ाई का यह केंद्र इस बार विजयनगर से हटकर रायगढ़ पहुंच गया था।

विजयनगर के पतन के मात्र 28 वर्ष पश्चात ही दक्षिण भारत में एक ऐसी हिंदू शक्ति का उदय हो गया जिसने अपने नाम का सिक्का चलाने का स्तुत्य प्रयास किया । कुछ लोगों ने इसे शिवाजी के सत्ता विरोधी स्वभाव से इस प्रकार जोड़ने का प्रयास किया है कि उन्होंने तत्कालीन मुगल सत्ता के विरोध में जाकर जो कार्य किया वह उचित नहीं था , परंतु वास्तव में शिवाजी जब अपने नाम का सिक्का चला रहे थे तो वह यह डिंडिम घोष कर रहे थे कि भारत की अंतश्चेतना आज भी जीवित है और वह किसी की पराधीनता स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है । शिवाजी के नाम का सिक्का चलना उससे पहले विजयनगर के शासकों के नाम का सिक्का चलना यह बताता है कि पराभव के उस काल में भी हमारी अंतश्चेतना जीवित , जागृत ,सचेत और सतर्क रही । ( संदर्भ : हिंदवी स्वराज्य के संस्थापक शिवाजी और उनके उत्तराधिकारी, लेखक : डॉ राकेश कुमार आर्य, पृष्ठ संख्या 55, प्रकाशक : सनातन प्रकाशन, कार्यालय 1223/ 25 अजायब घर का रास्ता, किशनपोल बाजार, जयपुर)

शिवाजी को इतिहास में एक जनसेवी और हृदयसम्राट शासक के रूप में जाना जाता है । शिवाजी न केवल महाराष्ट्र के लोगों के ह्रदय पर आज भी शासन करते हैं ,अपितु संपूर्ण भारतवर्ष के प्रत्येक राष्ट्रवादी व्यक्ति के हृदय में भी उनके प्रति अतीव सम्मान का भाव है । शिवाजी को एक कुशल और प्रबुद्ध सम्राट के रूप में जाना जाता है।

शिवाजी महाराज के विषय में यह भी एक रोचक तथ्य है कि उन्हें अपने बचपन में कोई विशेष शिक्षा नहीं मिल पाई थी , परंतु इसके उपरांत भी उन्होंने भारतीय राजनीति शास्त्र को समझने के लिए प्राचीन ग्रंथों का गंभीरता से अनुशीलन कर लिया था । जिनके आधार पर वह अपने राजनीति के धर्म को समझने में सफल हो गए थे । वे भारतीय इतिहास और राजनीति से सुपरिचित थे। उन्होंने शुक्राचार्य तथा कौटिल्य को आदर्श मानकर कूटनीति को बड़ी गहराई से समझ लिया था और यह जान लिया था कि कब किस परिस्थिति में कौन सी कूटनीति से काम ले कर अपने लक्ष्य को साध लेना है ? – राजनीति में इसी तथ्य को समझ लेना राजनीतिशास्त्र का मर्मज्ञ हो जाना है । शिवाजी की नीतियों , व्यवहार और राजनीतिक बौद्धिक चातुर्य की जितनी भर भी कहानियां आज महाराष्ट्र में या देश के अन्य भागों में सुनने व समझने को मिलती हैं , उनको यदि देखा व समझा जाए तो पता चलता है कि उन जैसा कूटनीतिज्ञ उनके समय में अन्य दूसरा कोई शासक नहीं था ।
अपने समकालीन मुगलों की भांति वह भी निरंकुश शासक थे, अर्थात शासन की समूची बागडोर राजा के हाथ में ही थी। परंतु शिवाजी की निरंकुशता और मुगलों की निरंकुशता में आकाश पाताल का अंतर था । मुगल स्वेच्छाचारी थे , और साथ ही साथ अत्याचारी भी थे । जबकि शिवाजी स्वयं को सदा नैतिकता और मर्यादाओं की सीमाओं में ही रखते थे । इस प्रकार उनका निरंकुश शासन जनहितकारी था ।

उनके प्रशासकीय कार्यों में सहायता के लिए आठ मंत्रियों की एक परिषद थी । जिन्हें अष्टप्रधान कहा जाता था। इसमें मंत्रियों के प्रधान को पेशवा कहते थे। जो राजा के पश्चात सबसे प्रमुख व्यक्ति होता था।
अमात्य वित्त और राजस्व के कार्यों को देखता था । जबकि मंत्री राजा की व्यक्तिगत दैनन्दिनी का ध्यान रखता था। सचिव राजकीय कार्यालयों के कार्य करते थे । जिसमे शाही मुहर लगाना और सन्धि पत्रों का आलेख तैयार करना भी सम्मिलित था। सुमन्त उस समय का विदेशमंत्री था। सेना के प्रधान को सेनापति कहते थे। दान और धार्मिक विषयों के प्रमुख को पण्डितराव कहते थे। न्यायाधीश न्यायिक विषयों का प्रधान था।

मराठा राज्य को अपनी सुविधा के अनुसार शिवाजी महाराज ने चार भागों में विभक्त किया था। उसी के अनुसार वह प्रशासनिक कार्य चलाते थे ।प्रत्येक प्रांत में प्रांतपति नियुक्त किया गया था। सारी की सारी व्यवस्था शुक्राचार्य और कौटिल्य के राजनीतिक सिद्धांतों के आधार पर थी । प्रत्येक प्रांतपति के पास अपना उसी प्रकार का एक मंत्रिमंडल होता था , जिस प्रकार आज के प्रांतप्रति अर्थात मुख्यमंत्री के पास अपना एक मंत्रिमंडल होता है। प्रांत पति के इस मंत्रिमंडल को अष्टप्रधान समिति कहा जाता था ।कुछ प्रान्त प्रशासनिक विषयों में स्वतंत्र थे , परंतु उनको कर देना पड़ता था।

न्यायव्यवस्था प्राचीन पद्धति पर आधारित थी। शुक्राचार्य, कौटिल्य और हिन्दू धर्मशास्त्रों को आधार मानकर निर्णय दिया जाता था। शिवाजी की इस प्रकार की न्याय व्यवस्था से स्पष्ट पता चलता है कि वह भारतीय परंपराओं के प्रति अति श्रद्धालु थे । वह चाहते थे कि भारत की प्राचीन राज्यव्यवस्था और न्यायव्यवस्था से ही देश को चलाया जाए । क्योंकि उसी में ऐसे सूत्र उपलब्ध थे जो व्यक्ति व्यक्ति के मध्य वास्तव में न्याय कर सकने में सक्षम और समर्थ थे । गाँव के पटेल फौजदारी वादों की जाँच करते थे। राज्य की आय का साधन भूमिकर था। पर चौथ और सरदेशमुखी से भी राजस्व वसूला जाता था। शिवाजी अपने को मराठों का सरदेशमुख कहते थे और सरदेशमुख के रूप में ही वह सरदेशमुखी कर वसूल करते थे ।

शिवाजी के समय तक मुगलों और तुर्कों के शासन को चलते लंबा समय हो चुका था । फलस्वरूप हमारी प्रशासनिक शब्दावली में उनके अरबी व फारसी के शब्द प्रविष्ट हो गए थे । जिससे राज्य व्यवस्था और न्याय व्यवस्था दोनों में ही भाषायी अस्त-व्यस्तता देखने को मिल रही थी । इस प्रकार की भाषायी अस्त-व्यस्तता और अव्यवस्था को दूर करने के लिए राज्याभिषेक के पश्चात शिवाजी महाराज ने अपने एक मंत्री (रामचन्द्र अमात्य) को शासकीय उपयोग में आने वाले फारसी शब्दों के लिये उपयुक्त संस्कृत शब्द निर्मित करने का कार्य सौंपा। यह कार्य बहुत ही गौरवपूर्ण था । इससे पता चलता है कि उनको अपनी भाषायी संस्कृति और संस्कृत के शब्दों के प्रति असीम लगाव था । उनका यह संस्कृति प्रेम हमें बताता है कि वह भारत की प्राचीन राज्यव्यवस्था और न्यायव्यवस्था में अटूट विश्वास रखते थे । कुछ लोगों की दृष्टि में उनका यह संस्कृति प्रेम उनकी सांप्रदायिकता हो सकती हैं , परंतु अपने गौरवपूर्ण अतीत के प्रति श्रद्धालु होना प्रत्येक देशभक्त और राष्ट्रवादी व्यक्ति का पहला कार्य होता है । शिवाजी ने यहीं से अपने शासन का शुभारंभ किया तो यह उनकी उत्कृष्ट संस्कृति प्रेमी भावना का एक शानदार उदाहरण है । शिवाजी महाराज के दिशा निर्देशों का पालन करते हुए रामचन्द्र अमात्य ने धुन्धिराज नामक विद्वान की सहायता से ‘राज्यव्यवहारकोश’ नामक ग्रन्थ निर्मित किया। इस कोश में 1380 फारसी के प्रशासनिक शब्दों के तुल्य संस्कृत शब्द थे। इसमें रामचन्द्र ने लिखा है-

कृते म्लेच्छोच्छेदे भुवि निरवशेषं रविकुला-वतंसेनात्यर्थं यवनवचनैर्लुप्तसरणीम्।
नृपव्याहारार्थं स तु विबुधभाषां वितनितुम्।नियुक्तोऽभूद्विद्वान्नृपवर शिवच्छत्रपतिना ॥81॥

तनिक विचार कीजिए कि जिस समय मुगलों का शासन अपने चरमोत्कर्ष पर था तब शिवाजी किस कल्पना लोक में रहकर अपने भारत के सुनहरे भविष्य की नींव रखने का कार्य कर रहे थे ? –मानो शिवाजी ने 6 जून 1674 को अपने राज्याभिषेक के समय हिंदू राष्ट्र की घोषणा कर दी थी और उस समय देश स्वतंत्र हो गया था।

धार्मिक नीति

शिवाजी एक समर्पित हिन्दु थे तथा वह धार्मिक सहिष्णु भी थे। उनके साम्राज्य में मुसलमानों को धार्मिक स्वतंत्रता थी। कई मस्जिदों के निर्माण के लिए शिवाजी ने अनुदान दिया। हिन्दू पण्डितों की तरह मुसलमान सन्तों और फ़कीरों को भी सम्मान प्राप्त था। उनकी सेना में मुसलमान सैनिक भी थे। शिवाजी हिन्दू संस्कृति को बढ़ावा देते थे। पारम्परिक हिन्दू मूल्यों तथा शिक्षा पर बल दिया जाता था। अपने अभियानों का आरम्भ वे प्रायः दशहरा के अवसर पर करते थे। ( संदर्भ: लेखक की वही पुस्तक, पृष्ठ 58)

शिवाजी का चरित्र

शिवाजी के भीतर भारतीय संस्कृति के महान संस्कार कूट-कूट कर भरे थे । वह सदैव अपने माता – पिता और गुरु के प्रति श्रद्धालु और सेवाभावी बने रहे । उन्होंने कभी भी अपनी माता की किसी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया और पिता के विरुद्ध पर्याप्त विपरीत परिस्थितियों के होने के उपरांत भी कभी विद्रोही स्वभाव का परिचय नहीं दिया । वह उनके प्रति सदैव एक कृतज्ञ पुत्र की भांति ही उपस्थित हुए । शिवाजी महाराज को अपने पिता से स्वराज की शिक्षा मिली। जब बीजापुर के सुल्तान ने शाहजी राजे को बन्दी बना लिया तो एक आदर्श पुत्र की भांति उन्होंने बीजापुर के शाह से सन्धि कर शाहजी राजे को मुक्त करा लिया। इससे उनके चरित्र की उदारता का बोध हमें होता है और हमें पता चलता है कि वह हृदय से कृतज्ञ रहने वाले महान शासक थे। उस समय की राजनीति में पिता की हत्या कराकर स्वयं को शासक घोषित करना एक साधारण सी बात थी । यदि शिवाजी चारित्रिक रूप से महान नहीं होते तो वह अपने पिता की हत्या तक भी करा सकते थे , परंतु उन्होंने ऐसा कोई विकल्प नहीं चुना । शाहजी राजे के निधन के उपरांत ही उन्होंने अपना राज्याभिषेक करवाया । यद्यपि वह उस समय तक अपने पिता से स्वतंत्र होकर एक बड़े साम्राज्य के अधिपति हो गये थे। कहने का अभिप्राय है कि उनकी अधिपति होने की यह स्थिति उनके भीतर अहंकार का भाव उत्पन्न कर सकती थी , परंतु शिवाजी सत्ता को पाकर भी मद में चूर नहीं हुए । उनके नेतृत्व को उस समय सब लोग स्वीकार करते थे । यही कारण है कि उनके शासनकाल में कोई आन्तरिक विद्रोह जैसी प्रमुख घटना नहीं हुई थी। यह भी एक विचारणीय तथ्य है कि जिस समय शिवाजी शासन कर रहे थे , उस समय इस प्रकार की स्वाभाविक स्वामीभक्ति सचमुच हर किसी शासक को उपलब्ध नहीं थी ।

शिवाजी शत्रु के प्रति दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करने की नीति में विश्वास रखते थे ,अर्थात जैसे के साथ तैसा करना वह उचित समझते थे । यही उस समय की राजनीति का तकाजा भी था। तुर्की ब तुर्की प्रत्युत्तर देना राजनीति का धर्म होता है । हमने ‘सद्गुण विकृति ‘ के कारण कई बार अपनी उदारता का परिचय देते हुए शत्रु पर अधिक विश्वास किया और अंत में उससे हानि ही उठाई । परंतु शिवाजी ऐसा करने को कभी भी तत्पर नहीं होते थे । शिवाजी शत्रु को परास्त करने की नीति में विश्वास रखते थे ।
शिवाजी महाराज ने अपने राज्याभिषेक (6 जून 1674) के अवसर पर हिंदू पद पातशाही की घोषणा की थी। वह देश में हिंदू राजनीति को स्थापित कर देश से विदेशियों को खदेड़ देना चाहते थे। उनकी राजनीति का मूल आधार नीति, बुद्घि तथा मर्यादा-ये तीन बिंदु थे। रामायण, महाभारत, तथा शुक्रनीतिसार का उन्होंने अच्छा अध्ययन किया था। इसलिए अपने राज्य को उन्होंने इन्हीं तीनों महान ग्रंथों में उल्लेखित राजधर्म के आधार पर स्थापित करने का पुरूषार्थ किया। वह राष्ट्रनीति में मानवतावाद को ही राष्ट्रधर्म स्वीकार करते थे। शुक्र नीति में तथा रामायण व महाभारत में राजा के लिए 8 मंत्रियों की मंत्रिपरिषद का उल्लेख आता है। इसलिए शिवाजी महाराज ने भी अपने राज्य में 8 मंत्रियों का मंत्रिमंडल गठित किया था। शेजवलकर का मानना है कि ये अष्टप्रधान की कल्पना शिवाजी ने ‘शुक्रनीतिसार’ से ही ली थी ।

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