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उगता भारत न्यूज़

गुरुकुल नवप्रभात वैदिक विद्यापीठ नुआंपाली बरगड़म ओडिशा का वार्षिकोत्सव हुआ सम्पन्न

बरगड़म। ( विशेष संवाददाता ) जिसे हम आजकल उड़ीसा कहते हैं, वह महाभारत काल में अंग देश के नाम से विख्यात रहा था। इसी प्रांत का राजा दुर्योधन ने अपने मित्र कर्ण को बनाया था। सम्राट अशोक के शासनकाल में इसे कलिंग देश के नाम से भी जाना गया। जिस पर सम्राट अशोक ने हमला किया था। यहां के वीर लोगों ने मरना तो स्वीकार किया था परंतु अशोक की गुलामी स्वीकार नहीं की थी। इसी प्रांत को उत्कल प्रांत के नाम से भी जाना गया है। हमारे वर्तमान राष्ट्रगान में उत्कल के नाम से ही उड़ीसा का नाम दिया गया है।

आज इसी प्रांत में गुरुकुल शिक्षा प्रणाली को स्थापित कर वैदिक विद्वानों का एक बहुत बड़ा संगठन कार्य करता हुआ दिखाई दे रहा है। गुरुकुल नवप्रभात वैदिक विद्यापीठ नुआंपाली बरगड़म ओडिशा के प्रबंधन तंत्र के रूप में जिस प्रकार विभिन्न वैदिक विद्वान अपना तन- मन- धन समर्पित कर भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भावना को बलवती कर उसकी परंपराओं को स्थापित करने के प्रति संकल्पित दिखाई देते हैं, उनका वह महान पुरुषार्थ निश्चय ही सूर्योदय का आभास दे रहा है।

इस गुरुकुल का वार्षिक उत्सव बहुत ही हर्ष और उल्लास के साथ संपन्न हुआ। यह कार्यक्रम 10 से 12 फरवरी तक चला।इस अवसर पर यहां सामवेद पारायण यज्ञ का भी आयोजन किया गया। जिसमें गुरुकुल के ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारिणियों ने बढ़ चढ़कर भाग लिया। ब्रह्मचारियों और ब्रह्मचारिणियों ने अपने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत कर सभी उपस्थित लोगों का मन मोह लिया। उनके कार्यक्रमों को देखकर भारत के प्राचीन गुरुकुलों के संस्कारों का आभास स्पष्ट दिखाई दे रहा था।
यह गुरुकुल उड़ीसा जैसे प्रांत में कार्य कर अपने भविष्य की उज्जवल योजना का संकेत दे रहा है। सारी टीम का एक ही लक्ष्य है कि भारत की ऋषि परंपरा को स्थापित किया जाए। ब्रह्मचारी और आचार्यगण परस्पर संस्कृत में संवाद करते हैं तो प्राचीन गौरव लौटता हुआ अथवा कहिए कि पुनर्स्थापित होता हुआ स्पष्ट दिखाई देता है। सारे गुरुकुल का परिवेश बहुत ही सात्विक है। प्राकृतिक सौंदर्य से भरे हुए वातावरण में विद्यार्थी अपना जीवन निर्माण कर रहे हैं।

आर्य जगत के स्वनामधन्य वीतराग संन्यासी पूज्य स्वामी विवेकानंद जी महाराज की अध्यक्षता में संपन्न हुए इस कार्यक्रम में दिनांक 11 फरवरी को मुख्य अतिथि के रूप में अपने विचार व्यक्त करते हुए सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान स्वामी आर्यवेश जी ने कहा कि गुरुकुल प्राचीन काल से ही भारतीय शिक्षा संस्कार के केंद्र रहे हैं। जिनसे मानव निर्माण से राष्ट्र निर्माण की योजना फलीभूत होती रही है। मध्यकाल में विदेशी आक्रमणकारियों के द्वारा इस परंपरा को विनष्ट करने का भयंकर अपराध किया गया। हम सभी को स्वामी दयानन्द जी महाराज के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए , जिन्होंने इस प्राचीन परंपरा को जीवित करने का गंभीर और सार्थक प्रयास किया। जिनके प्रयासों से आज भारत भूमि पर फिर से गुरुकुलों के माध्यम से मानव निर्माण और राष्ट्र निर्माण का कार्य संपन्न हो रहा है। इस गुरुकुल के प्रबंधन तंत्र ने जिस गौरवशाली परंपरा का निर्वाह करते हुए गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति के प्रति अपना समर्पण व्यक्त किया है, वह बहुत ही प्रशंसनीय है। इनकी तपस्या, त्याग और समर्पण का यह पवित्र भाव निश्चय ही राष्ट्र और मानवता के लिए कल्याणकारी रक्षित होगा। उन्होंने कहा कि वास्तव में आचार्य लोग ही राष्ट्र के निर्माता होते हैं। वह जिस प्रकार के संस्कार अपने छात्र-छात्राओं को देते हैं, उसी प्रकार के राष्ट्र का निर्माण होता है।

इस अवसर पर आर्य जगत के सुप्रसिद्ध विद्वान स्वामी आदित्यवेश जी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारत का गौरव वेद और वैदिक व्यवस्था है। इसके कारण ही भारत ज्ञान की दीप्ति अर्थात आभा में रत रहने वाला संपूर्ण भूमंडल का पवित्रतम राष्ट्र है। इसके शिक्षा संस्कारों के माध्यम से ही संसार का कल्याण होना संभव है। उन्होंने कहा कि भारत का सनातन स्वरूप कभी न मिटने वाला है, यद्यपि इसमें अनेक प्रकार की विकृतियां आकर समाविष्ट हो गई हैं । इन विकृतियों को हमें खोज खोज कर दूर करना है और इसके सत्य सनातन स्वरूप को स्वामी दयानंद जी के दृष्टिकोण से पुनः स्थापित करने के लिए कार्य करना है।

दिनांक 12 फरवरी को ‘ शिक्षा,संस्कृति और राष्ट्र ‘ विषय पर आयोजित की गई संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में अपने विचार व्यक्त करते हुए सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता डॉ राकेश कुमार आर्य ने कहा कि भारत में राष्ट्र की अवधारणा प्राचीन काल से ही रही है। उन्होंने कहा कि वेद और वैदिक संस्कृति में राष्ट्र को बहुत महत्व दिया गया है। वेद में अनेक स्थानों पर राष्ट्र शब्द आया है। भारत के राष्ट्र संबंधी चिंतन का सीधा अर्थ संपूर्ण वैश्विक- व्यवस्था से है। उन्होंने कहा कि सज्जन शक्ति का उद्धार और दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों का संहार करना हमारा राजधर्म रहा है और आज भी इसे राजधर्म बनाने की आवश्यकता है।
डॉ आर्य ने कहा कि भारतीय संस्कृति का उद्देश्य मानवता और प्राणी मात्र का हितचिंतन करना है। अपने इसी चिंतन के कारण हमारे पूर्वजों ने दीर्घकालिक स्वाधीनता संग्राम लड़ा ।इसी व्यवस्था को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए श्री राम , श्री कृष्ण, चंद्रगुप्त ,चाणक्य , छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप और नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कार्य किया। भारत को सोते से जगाने के लिए स्वामी दयानंद जी महाराज ने हमें राष्ट्र संबंधी वैदिक चिंतन से पुनः परिचित कराया। जिसका परिणाम यह हुआ कि देश स्वाधीन हो गया। उन्होंने कहा कि आज रविदास जयंती भी है। रविदास जी ने महाराणा संग्राम सिंह का मार्गदर्शन करते हुए उन्हें भारत के चक्रवर्ती राजाओं के महासंकल्प का स्मरण कराते हुए उनसे विदेशी शत्रुओं को भारत भूमि से बाहर भगाने का संकल्प करवाया था।

सभी पर अपने आशीर्वाद की अमृत वर्षा करते हुए पूज्य स्वामी विवेकानंद जी महाराज ने कहा कि जब यह गुरुकुल अगले वर्ष अपना रजत जयंती समारोह मना रहा होगा तो उस समय हम यहां पर 2500 कुंडीय यज्ञ करने का संकल्प लें। उन्होंने कहा कि ब्रह्मचारी को 25 वर्ष तक वसु का जीवन जीना होता है, इसलिए रजत जयंती समारोह को वसु जयंती समारोह का नाम दिया जाना चाहिए। स्वामी जी महाराज ने कहा कि मनुष्य की संकल्प शक्ति के सामने प्रत्येक चुनौती छोटी पड़ जाती है। उसे सर झुका कर निकालना पड़ता है। इसलिए यदि हम संकल्प लेंगे तो यह 2500 कुंडीय यज्ञ भी निश्चित रूप से संपन्न होगा । इसके उपरांत भी यदि प्रबंधन तंत्र इसे किसी दूसरे स्वरूप में करना चाहता है तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी।

स्वामी जी महाराज ने कहा कि गुरुकुल संस्कारों को बलवती करने का केंद्र होता है। मनुष्य के जीवन को सुव्यवस्थित कर उसे संसार के लिए उपयोगी बनाने का एक माध्यम होता है। सबसे बड़ा कारखाना होता है। इस माध्यम को अथवा कारखाने को पवित्र बनाए रखना और इसके वातावरण को बच्चों के जीवन निर्माण के लिए अनुकूल बनाए रखना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी होती है।

विभिन्न सत्रों के कार्यक्रमों का सफलतापूर्वक संचालन कर रहे प्रो० सोमदेव शतांशु ने कार्यक्रम की भव्य रूपरेखा को प्रस्तुत करते हुए भविष्य की योजनाओं पर भी अपने विचार प्रकट किये । उन्होंने लोगों से आवाहन किया कि वह पूज्य स्वामी विवेकानंद जी महाराज के नेतृत्व में आस्था व्यक्त करते हुए भविष्य में भी इस गुरुकुल के प्रति अपना सहयोग बनाए रखें। जिससे भारत और भारतीय संस्कारों को स्थापित करने में हमें सहायता मिल सके। उन्होंने कहा कि मानव का जीवन लोकोपकार के लिए मिला है। इसमें जितना हम दान आदि के माध्यम से लोकोपकार कर जाएंगे, उतना ही हमारे लिए भला होगा।

कार्यक्रम के संयोजक के रूप में कार्य कर रहे वैदिक विद्वान और भारतीय संस्कारों से पूर्णतया ओतप्रोत आचार्य प्रेम प्रकाश शास्त्री ने हमें बताया कि इस गुरुकुल के लिए इस समय 135 एकड़ भूमि प्राप्त हो चुकी है। यह लोगों के उदारता पूर्वक दान देने की प्रवृत्ति का ही प्रतीक है। उन्होंने कहा कि छात्र-छात्राओं की पढ़ाई लिखाई के संबंध में स्वामी दयानंद जी महाराज के चिंतन को ध्यान में रखा गया है । यही कारण है कि ब्रह्मचारियों का गुरुकुल अलग है और ब्रह्मचारिणियों का गुरुकुल चार-पांच किलोमीटर अलग रखा गया है। पर्वत श्रृंखला की तलहटी में बनाए गए दोनों गुरुकुल यद्यपि अभी अपनी प्रारंभिक अवस्था में हैं, परंतु फिर भी भविष्य का एक अच्छा आभास दे रहे हैं। गुरुकुल में पारिवारिक संबंधों से लेकर सामाजिक संबंधों के बारे में भी पूर्ण जानकारी दी जाती है। वर्ण व्यवस्था और आश्रम व्यवस्था की गंभीर जिम्मेदारियों, कर्तव्यों और उनके धर्म के विषय में भी बालक बालिकाओं को परिचित कराया जाता है। कुल मिलाकर बालक बालिकाओं के सर्वांगीण विकास पर ध्यान किया जाता है।

उन्होंने बताया कि अन्नू रानी मेरठ स्थित गुरुकुल प्रभात से विद्याध्ययन करके निकली हैं , जिन्हें पूज्य स्वामी विवेकानंद जी महाराज का विशेष सानिध्य और आशीर्वाद प्राप्त हुआ। उक्त बेटी ने भाला फेंकने में अर्जुन पुरस्कार प्राप्त किया। खेलों में अपनी विशेष प्रतिभा को राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसने स्थापित करने में सफलता प्राप्त की है। जिससे गुरुकुल परिवार को भी गौरव की अनुभूति होती है। उन्होंने बताया कि बेटी अन्नू रानी ने अपनी पुरस्कार राशि में से 35 लाख रुपए ब्रह्मचारिणियों के गुरुकुल के लिए दिए हैं। जिससे गुरुकुल परिवार को आगे बढ़ाने में सहायता मिली है। यहां पर यह भी बताना आवश्यक है कि अन्नू रानी ने साधनों के अभाव में भाला फेंकने का अपना अभ्यास आगे बढ़ाया था। उन्होंने हमें बताया कि मैंने घर में भाला न मिलने के कारण गन्ना फेंकने से भाला फेंकने की प्रक्रिया का आरंभ किया था।

आचार्य श्री प्रेम प्रकाश जी ने हमें बताया कि यहां के लोगों का आहार मांस मछली है। परंतु गुरुकुल के सात्विक परिवेश का परिणाम यह हुआ है कि 70% लोगों ने मांसाहार छोड़ दिया है। इसी प्रकार के दूसरे व्यसनों से भी बचकर लोग सात्विक जीवन शैली को अपना रहे हैं। जिससे क्षेत्र का परिवेश अच्छा बनता जा रहा है। बच्चों पर गुरुकुल के संस्कारों का अच्छा प्रभाव पड़ रहा है।

कार्यक्रम को सफल बनाने में प्रो0 श्री वत्स शास्त्री,आचार्य भगवानदेव , स्वामी व्रतानंद सरस्वती, आचार्य बृहस्पति, आचार्य पुरंदर ,आचार्य भारती नंदन, आचार्य नरेंद्र आदि का विशेष योगदान रहा। कार्यक्रम में जनपद गौतम बुद्ध नगर नोएडा से उपस्थित रहे श्री राकेश कुमार यादव, अन्नू रानी, दयानंद आर्य, आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किये। आर्य जगत के सुप्रसिद्ध भजनोपदेशक कविंद्र आर्य ने अपने सुमधुर गीतों से सभी को आकर्षित करने में सफलता प्राप्त की।

ध्यान रहे कि उड़ीसा जैसे प्रांत में इस प्रकार का कार्य किया जाना बहुत ही महत्वपूर्ण है । विशेष रूप से तब जबकि ईसाई मिशनरी यहां पर कार्य करते हुए भारत के सनातन को मिटाने का कार्य कर रही हों। उनके बीच लोगों को अपने सनातन धर्म के साथ जोड़ना बहुत बड़ा पुरुषार्थ ही माना जाएगा। यहां आर्थिक असंतुलन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है या तो लोग बहुत धनी हैं या एकदम निर्धन हैं । निर्धन लोगों के भीतर धर्म के प्रति आस्था है, परंतु उनके पास धार्मिक स्थलों या संस्थाएं में दान देने के लिए धन नहीं है, जबकि धनी वर्ग व्यसनी हो चुका है। ऐसी स्थितियों में धार्मिक संस्थाओं को खड़ा करना और उन्हें आगे बढ़ाना बड़ा कठिन होता है।

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