वैश्विक स्तर पर भारतीय रुपए के मान को गिरने से बचाने हेतु कम करना होगा आयात

INR down

एक अमेरिकी डॉलर की तुलना में भारतीय रुपया 86.62 रुपए तक के रिकार्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है, बहुत सम्भव है कि आगे आने वाले समय में यह 87 रुपए अथवा 90 रुपए के स्तर को भी पार कर जाय। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपए की गिरावट के लिए वैश्विक स्तर पर कई कारक जिम्मेदार है परंतु मुख्य रूप से अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लगातार मजबूत होने के संकेत मिल रहे हैं, जैसे, रोजगार हेतु नई नौकरियों की तो जैसे बहार ही आई हुई है। जनवरी 2025 माह में दिसम्बर 2024 माह के जारी किए के आंकड़ों के अनुसार अमेरिका में 256,000 से अधिक नई नौकरियां पैदा हुई हैं जबकि अनुमान लगभग 200,000 नौकरियों का ही था, नवम्बर 2024 माह में 212,000 नौकरियां पैदा हो सकी थीं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मजबूती के चलते फेडरल रिजर्व, यूएस फेड रेट में कमी की घोषणा को रोक सकता है एवं अब अमेरिकी अर्थशास्त्रियों का मत है कि केलेंडर वर्ष 2025 में केवल एक अथवा दो बार ही फेड रेट में कमी की घोषणा हो, क्योंकि, रोजगार के क्षेत्र में मजबूती के चलते बहुत सम्भव है कि मुद्रा स्फीति में कमी लाने में अधिक समय लग सकता है। अमेरिका में बढ़ी हुई ब्याज दर के चलते अमेरिकी डॉलर इंडेक्स एवं अमेरिकी ट्रेजरी बिल पर यील्ड भी मजबूत बनी हुई है इससे अमेरिकी डॉलर लगातार और अधिक मजबूत हो रहा है एवं पूरे विश्व से डॉलर अमेरिका की ओर आकर्षित हो रहा है जबकि इसके विरुद्ध अन्य देशों की मुद्राओं पर स्पष्टत: दबाव दिखाई दे रहा है।

दिनांक 20 जनवरी 2025 को श्री डानल्ड ट्रम्प के अमेरिका के राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद बहुत सम्भव है कि अमेरिका में आयात किए जाने वाले कई उत्पादों पर आयात कर की दर बढ़ा दी जाय क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति पद के चुनाव प्रचार के दौरान बार बार इसका जिक्र किया गया है। यदि ऐसे निर्णय अमेरिका में लागू किए जाते हैं तो इससे अमेरिका में मुद्रा स्फीति फैलेगी और यदि ऐसा होता दिखाई देता है तो यू एस फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में कमी के स्थान पर वृद्धि की घोषणा भी कर सकता है। इससे अमेरिकी डॉलर में और अधिक मजबूती आएगी और अन्य देशों की मुद्राओं का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक अवमूल्यन होने लगेगा।

दूसरे, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें भी एक बार पुनः बढ़ती हुई दिखाई दे रही है जो 81 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गई हैं। इससे भी भारतीय रुपए पर दबाव बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। भारत आज भी अपने कच्चे तेल की कुल खपत का 87 प्रतिशत से अधिक तेल का आयात करता है और इस आयातित कच्चे तेल का भुगतान अमेरिकी डॉलर में करना होता है, जिससे भारत के लिए अमेरिकी डॉलर की मांग भी लगातार बढ़ रही है। बल्कि इससे तो भारत में भी मुद्रा स्फीति के बढ़ने का खतरा उत्पन्न हो रहा है। पिछले वर्ष भारत ने कच्चे तेल के आयात पर 13,200 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि खर्च की है।

तीसरे, विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार से अपना पैसा निकालने में लगे हुए हैं क्योंकि उन्हें अमेरिका में ब्याज दरों के अच्छे स्तर को देखते हुए अपने निवेश पर अधिक आय की सम्भावना दिखाई दे रही है। विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा 27 सितम्बर 2024 से भारतीय शेयर बाजार में लगातार बिकवाली की जा रही है और दिनांक 17 जनवरी 2025 तक 232,317 करोड़ रुपए की बिकवाली शेयर बाजार में उनके द्वारा की जा चुकी है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक देश की मुद्रा की तुलना में दूसरे देश की मुद्रा की कीमत यदि गिरने लगे तो इसके पीछे सामान्यतः दोनों देशों में मुद्रा स्फीति की दर को जिम्मेदार माना जाता है। जैसे यदि अमेरिका में मुद्रा स्फीति की दर 3 प्रतिशत प्रतिवर्ष है और भारत में मुद्रा स्फीति की दर 5.5 प्रतिशत प्रतिवर्ष है तो भारतीय रुपए की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी डॉलर की तुलना में 2.5 प्रतिशत से गिरनी चाहिए। इस दृष्टि से अर्थशास्त्र में यह एक सैद्धांतिक कारण माना जाता है और इस सिद्धांत को अपनाकर विदेशी निवेशक उन्हीं देशों में अधिक निवेश करते हैं जहां मुद्रा स्फीति की दर नियंत्रण में रहती है।

पूरे विश्व का 88 प्रतिशत विदेशी व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता है। जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी डॉलर की मांग लगातार बढ़ती जा रही है। बाजार में जिस भी उत्पाद की मांग बढ़ेगी और यदि उस उत्पाद की आपूर्ति बाजार में नियंत्रित है तो उस उत्पाद की कीमत भी बाजार में बढ़ेगी। यही हाल अमेरिकी डॉलर का अंतरराष्ट्रीय बाजार में आज हो रहा है। अमेरिकी डॉलर की कीमत बढ़ रही है तो अन्य देशों की मुद्राओं की कीमत स्वाभाविक रूप से गिर रही है। साथ ही, 17 जनवरी 2025 को अमेरिकी डॉलर इंडेक्स 109.35 के स्तर पर पहुंच गया है। अमेरिकी डॉलर इंडेक्स का बढ़ना यानी दुनिया भर में डॉलर की मांग बढ़ रही है। अमेरिका में 10 वर्षीय बांड पर यील्ड भी 4.65 प्रतिशत प्रतिवर्ष से भी आगे निकल गई है। अन्य देशों की मुद्राओं की बाजार कीमत भारतीय रुपए की तुलना में अधिक तेजी से गिरी है। जनवरी 2024 से लेकर जनवरी 2025 के बीच अमेरिकी डॉलर अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगभग 10 प्रतिशत मजबूत हुआ है। जबकि गिरने वाली मुद्राओं में भारतीय रुपया 3.5 प्रतिशत, ब्रिटिश पाउंड 3.8 प्रतिशत, यूरो 6.59 प्रतिशत, स्विस फ्रैंक 7.07 प्रतिशत, आस्ट्रेलियन डॉलर 8.09 प्रतिशत, स्वीडिश क्रान 9.5 प्रतिशत, न्यूजीलैंड डॉलर 12.5 प्रतिशत, टरकिश लीरा 18.5 प्रतिशत एवं ब्राजीलियन रीयल 24.74 प्रतिशत तक गिरा है। अब यदि भारतीय रुपए की तुलना अमेरिकी डॉलर को छोड़कर अन्य देशों की मुद्राओं से करें तो भारत की स्थिति मजबूत दिखाई देती है परंतु अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिकतम उपयोग तो अमेरिकी डॉलर का करना होता है। अतः अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर की तुलना में कितना गिरा है, यह तथ्य अधिक महत्वपूर्ण है।

अमेरिका में राष्ट्रपति पद के चुनाव प्रचार के दौरान श्री डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा अपने चुनाव अभियान के दौरान लगातार यह घोषणा की जाती रही है कि उनके राष्ट्रपति चुने जाने के बाद वे अमेरिका में आयात की जाने वाली अनेक वस्तुओं पर भारी मात्रा में आयात कर लागू कर देंगे जिससे अमेरिका में इन देशों से वस्तुओं के आयात को कम किया जा सके एवं इन वस्तुओं का उत्पादन अमेरिका में ही प्रारम्भ किया जा सके। विशेष रूप से अमेरिका में चीन से आयात होने वाले उत्पादों पर तो 60 से 100 प्रतिशत तक का आयात शुल्क लगाये जाने की बात की जा रही है। श्री ट्रम्प की इन घोषणाओं का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में हुआ है एवं विदेशी निवेशक अपनी पूंजी अन्य विकासशील देशों के पूंजी बाजार से निकालकर इस उम्मीद में अमेरिकी पूंजी बाजार में निवेश करने लगे हैं कि आगे आने वाले समय में अमेरिका एक बार पुनः विनिर्माण केंद्र के रूप में विकसित होगा और उनके निवेश पर अमेरिका में ही उन्हें अधिक आय की प्राप्ति होगी। हालांकि, ट्रम्प प्रशासन यदि अमेरिका में आयात की जाने वाली वस्तुओं पर भारी मात्रा में आयात कर बढ़ाता है तो शुरुआती दौर में तो इससे अमेरिका में मुद्रा स्फीति की दर और अधिक तेज होगी क्योंकि अमेरिका में इन वस्तुओं की आयातित लागत बढ़ेगी। आज पूरे विश्व में सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कार्य करने वाली सबसे बड़ी कम्पनियों में 73 प्रतिशत अमेरिकन कम्पनियां हैं, इसी प्रकार स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्य कर रही सबसे बड़ी कम्पनियों में 65 प्रतिशत अमेरिकन कम्पनियां हैं। और, इन कम्पनियों द्वारा अन्य विकासशील देशों में अपनी विनिर्माण इकाईयां स्थापित की हुई हैं। यदि ट्रम्प प्रशासन द्वारा अन्य देशों में इन कम्पनियों द्वारा निर्मित उत्पादों के आयात पर भारी मात्रा में आयात कर लगाया जाता है तो ये कम्पनियां अपनी विनिर्माण इकाईयों को अमेरिका में स्थापित करेंगी, इससे अन्य देशों के निर्यात प्रभावित होंगे और अमेरिका में अन्य देशों से आयात कम होंगे।

अतः अब भारत को भी विभिन्न क्षेत्रों में अपने आप को आत्म निर्भर बनाना होगा ताकि अन्य देशों से विभिन्न उत्पादों के आयात पर निर्भरता कम की जा सके। आज भारत में विभिन्न वस्तुओं का भारी मात्रा में आयात हो रहा है, विशेष रूप कच्चे तेल एवं स्वर्ण जैसे पदार्थों का। जबकि, भारत से वस्तुओं के निर्यात की वृद्धि दर अपेक्षाकृत कम है जिससे चालू खाता घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है और अंततः इससे अमेरिकी डॉलर की मांग हमारे देश में बढ़ रही है और रुपए पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अतः भारत को कच्चे तेल एवं स्वर्ण के आयात में कमी लानी ही होगी ताकि चालू खाता घाटे को कम किया जा सके। साथ ही, अब भारत को अपने यहां मुद्रा स्फीति को भी नियंत्रण में रखना अति आवश्यक है। इसके लिए केंद्र सरकार द्वारा केंद्रीय बजट में सरकारी घाटे को नियंत्रण में रखना होगा। क्योंकि, अधिक ऋण लेने से सरकार को अपनी आय का एक बड़ा भाग ब्याज के भुगतान के लिए उपयोग करना होता है और इससे देश की विकास दर प्रभावित होती है एवं विदेशी निवेशक अपने निवेश को नियंत्रित करने लगते हैं। भारत में हालांकि केंद्र सरकार द्वारा अपने बजटीय घाटे को लगातार कम करने में सफलता अर्जित की जा रही है। कोरोना महामारी के दौरान केंद्र सरकार के बजट में यह घाटा 9 प्रतिशत के आसपास पहुंच गया था परंतु अब यह घटकर 5 प्रतिशत के आसपास आ गया है। परंतु, अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार अभी भी यह अधिक है। बजटीय घाटे को कम करने से भारत सरकार को ऋण पर ब्याज के रूप में कम राशि खर्च करनी होगी एवं देश के विकास कार्यों के लिए अधिक राशि उपलब्ध होगी, इससे विदेशी निवेश भी अधिक मात्रा में आकर्षित होगा।

– प्रहलाद सबनानी
सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक

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