Categories
वैदिक संपत्ति

आर्य वस्त्र और वेशभूषा, वैदिक सम्पत्ति – 262

ये लेखमाला हम पंडित रघुनंदन शर्मा जी की वैदिक सम्पत्ति नामक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।

गतांक से आगे …

आ र्य सभ्यता में केशों की भाँति नाखूनों का भी बड़ा महत्व है। नाखूनों के द्वारा श्रम की इयत्ता अर्थात् मर्यादा और प्रकार अर्थात् विधि से सम्बन्ध रखनेवाली दो बातें जानी जाती है। एक तो यह कि ऐसे काम किये जायें, जिनसे नाखुन आप ही आप घिस जायें, कटाना न पड़े और दूसरा यह कि इतना काम किया जाय, जिससे न तो नाखून परिमाण से अधिक घिस ही जायें और न बने ही रहें। खेती करनेवाले किसान और घरों में काम करनेवाली स्त्रियों को कभी नाखून बढ़ाने की आवश्यकता नहीं होती। परन्तु कसरत के द्वारा श्रम करनेवालों को अथवा कुछ भी काम न करनेवालों को नाखून कटाना पड़ते हैं। इससे ज्ञात होता है कि न तो निकम्मे बैठना ही अच्छा है और न डण्ड बैठक जैसे व्यर्थ श्रमों का करना ही अच्छा है, प्रत्युत इस प्रकार का काम करना अच्छा है, जिस प्रकार के काम किसान अथवा घर में काम करनेवाली स्त्रियाँ करती हैं। किन्तु स्मरण रखना चाहिये कि कृषकों के समान काम करनेवालों के भी नाखून इतना न घिस जाना चाहिये कि जिससे जिन्दा नाखून कट जाय। मनुष्यों को श्रम करने का क्षेत्र केवल भोजन और वस्त्रादि उत्पन्न करना ही है।

इसलिए तत्सम्बन्धी श्रम ही उसके लिए आवश्यक है। किन्तु दुःख से कहना पड़ता है कि कसरत करनेवाले व्यर्थ ही घण्टों श्रम करते हैं और उस श्रम से कुछ भी जीविका उत्पन्न नहीं कर सकते। उलटा दूसरों की कमाई खाते हैं और अपनी खूराक में इतना अधिक खर्च करते हैं कि एक पहलवान की खुराक में चार भले आदमियों का निर्वाह हो सकता है। अगर नाखून का विज्ञान ज्ञात होता तो वे कभी ऐसा न करते। नाखून कटाना निकम्मेपन की दलील है। 25 वर्ष पूर्व चीन में वह आदमी अधिक अमीर समझा जाता था जिसके नाखून बहुत बड़े हों। यह अमीरत की स्पर्धा यहां तक बढ़ गई थी कि लोगों के नाखून चार चार इञ्च तक बढ़ गये थे। नाखून बढ़ाने की गरज से वे लोग कुछ भी काम नहीं करते थे। तात्पर्य यह कि नाखून चाहे बढ़ाये जायें और चाहे बड़े हुए कटाये जायँ दोनों का अर्थ निकम्मापन ही है। पर आर्यसभ्यता सिखलाती है कि वानप्रस्थी फल, फूल खाकर रहें और केश तथा नाखून न कटाएँ। इसका मतलब स्पष्ट है कि वानप्रस्थ वन और वाटिकाओं में श्रम करके खूराक पैदा करें, जिससे नाखून आप ही आप घिस जायें। यह बात आज भी वनवासियों में देखी जाती है। जंगलनिवासी न कभी नाखून कटाते हैं और न कभी उनके नाखून बढ़े हुए देखे गये हैं। इससे यही ज्ञात होता है कि नाखून हमारे श्रम की कसौटी है- पैमाना हैं- इसलिए नाखून कभी न कटाना चाहिये, प्रत्युत खेतों और वाटिकाओं में इतना और इस प्रकार का काम करना चाहिये, जिससे नाखून स्वयं घिस जायें।

आर्य सभ्यता में घातु के आभूषणों के लिए स्थान नहीं है। क्योकि वैदिक आर्य सुगन्धित फूलों के ही आभूषण पहनते थे और सोने – चांदी के आभूषण नहीं पहनते थे। वे सोने चांदी के आभूषण तो पशुयों (गायों) को पहिनाते थे। इतना होने पर भी वे सुवर्ण के गुणों को खूब जानते थे, इसलिए यद्यपि सुवर्ण के आभूषण नहीं पहनते थे, पर सुवर्ण को शरीर के किसी न किसी भाग में लगा हुआ अवश्य रखते थे। इसका कारण यह है कि आर्यों की सभ्यता के अनुसार सुवर्ण का धारण करना और सुवर्ण अथवा चाँदी का आभूषण पहनना दोनों अलग अलग बातें मानी गई हैं। जिस प्रकार विना चेन के घड़ी केवल समय देखने के लिए गुप्त रीति से पाकेट में पड़ी रहना एक बात है और सोने की सुन्दर चेन में घड़ी को बाँधकर कलाई में पहनना दूसरी बात है। उसी तरह सुवर्ण धारण करना और सुवर्ण का आभूषण पहिनना दोनों अलग अलग समझा गया है। कलाई में सुवर्ण की चेन के साथ घड़ी का बाँधना आभूषण की श्रेणी में है और समय देखने के लिए घड़ी का पाकेट में पड़ा रहना सुवर्ण के धारण करने की श्रेणी में है। जिस प्रकार घड़ी का मुख्य उद्देश्य समय देखना है, आभूषण बनाना नहीं उसी तरह सुवर्ण का शरीर में लगा रहना स्वास्थ्य के लिए है, आभूषण के लिए नहीं ।

आर्य सभ्यता में सुवर्ण आयुवर्धक माना गया है। यही कारण है कि आर्य लोग लड़का के पैदा होते ही सुवर्ण शलाका से उसकी जिह्वा में ओ३म् लिखते हैं और मरने के समय भी बीमार के मुंह में सुवर्ण डालते हैं। सुवर्ण डालते ही नही प्रत्युत मृत्यु के कई दिन पूर्व से सुवर्ण के बने हुए चन्द्रोदआदि रसों का प्रयोग करना आरम्भ कर देते हैं। जन्ममृत्यु के समयों के अतिरिक्त भी कुण्डल अथवा अंगूठी के रूप में आर्य लोग सदैव सुवर्ण को धारण किये रहते थे, पर कुण्डल बौर अगूठी को आभूषण नहीं समभते थे। कुण्डल का अर्थ गोल छल्ला है ओर अँगूठी भी एक छल्ला ही है। छल्ला आभूषण नहीं है, क्योंकि इसमें कुछ भो कारीगरी नहीं होती – फूल पत्ती का काम नहीं होता। कानों में छिद्र होने के कारण ही औषधिरूप कुण्डल पहने जाते हैं, आभूषण के लिए नहीं। क्योंकि सुवर्ण के वर्को और सुवर्ण से बने हुए चन्द्रोदयादि रसों के खाने से अच्छी प्रकार ज्ञात होता है कि सुवर्ण में दीर्घायु का गुण है। इसी गुण का वर्णन करते हुए वेद में बतलाया गया है कि दीर्घायु के लिए सुवर्ण अवश्य धारण करना चाहिये। अथर्ववेद और यजुर्वेद में लिखा है कि-

पुनाति एवं एनं यो हिरण्यं विभर्ति । (अथर्व० 19/2679)
जरामृत्युर्भवति यो [हिरण्य] विभर्ति। (अथर्व० 19/26/1/)
यो विभर्ति दाक्षायण हिरण्य स देवेषु कृणुते दीर्घमायुः स मनुष्येषु कृणुते दीर्घमायुः ।। (यजुर्वेद34/5)

अर्थात् सुवर्ण उसको पवित्र कर देता है, जो उसे धारण करता है। जो सुवर्ण धारण करता है, वह वृद्ध हो कर मरता है। जो उत्तम सुवर्ण धारण करता है, वह दीर्घजीवी होता है।

सुवर्ण के इस महान् गुण के ही कारण शतपथ ब्राह्मण ४।३।४।२४ और १०/४/११६ में आयुः हिरण्यं, अमृतं हिरण्यं अर्थात् सुवर्ण आयु है और सुवर्ण अमृत है, कहा गया है। इसी गुण के कारण आर्य लोग जन्म से मृत्यु- पर्यन्त सुवर्ण को कान में या अँगुली में पहनते थे। पर इन छल्लों को भी आभूषण नहीं कहते थे। आभूषण तो वे सदैव फूलों का ही पहनते थे। क्योंकि फूलों के आभूषणों से मन प्रफुल्लित होता है और शीतलता प्राप्त होती है। फूल सबको सरलता से एक समान ही प्राप्त हो सकते हैं और परस्पर की ईर्ष्या-द्वेष से बचाते हैं। यही कारण है कि ऋषि लोग फूलों के आभूषण बना कर ऋषि पत्नियों को पहिनाते थे। एक बार चुनि कुसुम सुहाये। निज कर भूषण राम बनाये । सीताह पहिराये प्रभु सादर का सुन्दर वर्णन रामायण में किया गया है।

इससे ज्ञात होता है कि आर्यलोग आभूषण फूलों के ही पहिनते थे और कुण्डल आदि सादे छल्ले तो केवल आरोग्यता प्राप्त करने के ही अभिप्रायः से पहिनते थे, आभूषणों के अभिप्राय से नहीं। आर्य सभ्यता से सम्बन्ध रखने- वाले जितने प्राचीन आभूषण हैं, उनके नामों से ज्ञात होता है कि वे फूलों के ही होते थे। कर्णफूल, कण्ठश्री और वेणीपर्ण आदि नाम फूल, पत्तों के ही सूचक हैं। इसके अतिरिक्त जितने आभूषण हैं, सबमें बेल, फूल, कली और पत्ते ही बने होते हैं। फूल-पत्तों की ही नक्काशी होती है, अतएव यह बात निर्विवाद है कि आदिम काल में आर्यों के आभूषण फूलों के ही होते थे । परन्तु अनुमान होता है कि कुछ दिन के बाद गौभक्त गायों ने कारीगरों से सोने के फूल-पत्ती बनवाकर और उनमें फूलों के ही रङ्गों के मूल्यवान् पत्थर जड़वाकर गायों के लिए आभूषण तैयार करवाये और मणिमुक्ताखचित आभूषणों से अपनी गायों को सजाया। फल यह हुआ कि कुछ दिन के बाद फूलों के आभूषणों के स्थान में सुवर्ण के आभूषण बनने लगे और सब लोग धातुनिर्मित अनेक प्रकार के गहने पहिनने लगे । परन्तु आर्यों की आदिम सभ्यता में धातु निर्मित आभूषणों के लिए बिल्कुल ही स्थान नहीं है। जिस प्रकार उनके वस्त्र सादे हैं ओर जिस प्रकार उनका भेष सादा है उसी प्रकार उनकी भूषा भी सादा ही है।

क्रमशः

प्रस्तुति: – देवेंद्र सिंह आर्य
चैयरमेन ‘उगता भारत’

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
kolaybet giriş
hellocasino giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti 2026
Kolaybet Giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
Kolaybet
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
Kolaybet Giriş
Kolaybet
betpark giriş
betpark giriş
Kolaybet Giriş
matbet giriş
matbet giriş
matbet giriş
matbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
Hititbet Giriş
Hititbet
betgaranti giriş
Hititbet
Hititbet Giriş
Hititbet Güncel Giriş
hititbet
vdcasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
hititbet
bettilt
hititbet giriş
hititbet
vdcasino giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
Kuponbet
onwin giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
onwin giriş
sahabet güncel giriş
sahabet güncel giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
onwin giriş
onwin giriş
onwin giriş
onwin giriş
holiganbet giriş
grandpashabet giriş
onwin giriş
onwin giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
Mariobet
Mariobet Güncel Giriş
onwin giriş
onwin giriş
mariobet giriş
mariobet güncel giriş
Betorder
betorder giriş
betorder güncel giriş
betorder mobil giriş
betpark giriş
betorder
mariobet giriş