वैदिक सम्पत्ति – 257.. वेद मित्रों के उपदेश

वेदमंत्रों के उपदेश
यह लेखमाला हम पंडित रघुनंदन शर्मा जी की वैदिक सम्पत्ति नामक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।

गतांक से आगे …

कलियुग का वर्णन करते हुए महाभारत वनपर्व अध्याय ११० में लिखा है कि-

ये यवान्ना जनपदा गोधूमात्रास्तथैव च ।
तान् देशान् संश्रयिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ।।

अर्थात् जिन देशों में यव और गेहूँ आदि विशेष रूप से उत्पन्न होते हैं, कलियुग के लोग उन्हीं देशों का आश्रव लेंगे। इससे ज्ञात होता है कि दूसरे युगों में लोग उन देशों का आश्रय लेते थे, जहाँ फल फूल ही अधिक हो, अन्न नहीं। यही कारण है कि हिन्दु जगत् में फलाहार की अब तक जितनी प्रतिष्ठा है, उतनी दूसरे खाद्य की नहीं है। फलाहार एक प्रकार का महान् उच्च आवरण और तप समझा जाता है। यही नहीं, किन्तु जितने व्रत, शुभ अनुष्ठान अर्थात् सतोगुणी कार्य है, सबमें फलाहार ही का विधान है। इसका भाव स्पष्ट है कि फलाहार सात्त्विक आहार है। इसलिए सतोगुणी अनुष्ठानों में उसका उपयोग होता है। इसी से हम बलपूर्वक कहते हैं कि आर्य-भोजन फलाहार ही है। इस आर्य-भोजन की अधिक प्रतिष्ठा का कारण यह है कि फलाहार कामचेष्टा का भी प्रतिषेधक है। कोई मनुष्य यदि बह्य- चारी रहना चाहे, तो उसे फलाहार ही करना चाहिये। फलाहार से कामचेष्टा कम हो जाती है। इसलिए विधवा स्त्रियों को फलाहार के द्वारा काम को शरीर में ही शोषण करने के लिए मनु भगवान् ने विधान किया है। इसके अतिरिक्त फल और फूलों से मनुष्य का सारा जीवन निर्विघ्नता से बीत सकता है। आज भी साल के तीन मास हमारे अवध के बैसवारा प्रांत में आम महुवा और जामुन से ही काटे जाते हैं। ज्येष्ठ से भाद्रमास तक, ग्राम, महुवा और जासुन बहुत से घरों में चूल्हा जलता ही नहीं, पर कोई भूख से व्याकुल या दुर्बल दिखलाई नहीं पड़‌ता । यह तो हुई आर्य शास्त्र और आर्यावर्त की बात। अब हम दूसरे देश के प्रमाणों से भी दिखलाना चाहते हैं कि फलाहारी लोग कितने बलवान्, परिश्रमी और दीर्घकाय होते है। एक ही प्रकार के फलों को खाकर मनुष्य की शारीरिक अवस्था का वर्णन करते हुए सीरिया प्रान्त के अस्सद याकूब कयात नामी एक विद्वान् ने अपने भाषण में कहा कि मैं लेवेनन पर्वत पर गया था। वहाँ मैंने मनुष्यों को राक्षसों की भाँति बलवान् और चञ्चल देखा। ये लोग केवल खजूर पर ही निर्वाह करते हैं। इनमें अनेकों की आयु एक सौ दश वर्ष की थी।

इस वर्णन से ज्ञात होता है कि जब एक प्रकार के फल से इतना लाभ है, तो नाना प्रकार के फलाहार से बहुत महा लाभ संभव है। अतएव स्पष्ट है कि मनुष्य फलों के द्वारा अच्छी प्रकार निर्वाह कर सकता है और फलाहार से दीर्घायु, दीर्घकाय और बलवान् भी हो सकता है। जो लोग समझते हैं कि फलाहार से मेहनत करने की ताकत नहीं रह जाती, वे भी गलती पर है। सन् १६०२ में जर्मन के विटनसटाइड नामक स्थान में अन्तरजातीय पैदल दौड़ हुई थी। यह दौड़ ड्रस्डन से बर्लिन तक १२४।। मील लम्बी थी। दौड़नेवाले सब ३२ आदमी थे। मौसम गर्मी (अर्थात् १८ वी मई सन् १६०२) का था। दौड़नेवाले ड्रस्डन से ७।। बजे निकले। इनमें कुछ फलाहारी, कुछ शाकानाहारी और कुछ मांसा हारी थे। शाकाहारियों में बर्लिन का प्रसिद्ध चलनेवाला कार्लमान भी था। बर्लिन में जो सबसे पहले पहुंचनेवाले ६ मनुष्य थे, वे तो शाकाहारी और फलाहारी ही थे। इनमें कार्लमान प्रथम था। कार्लमान ने २६ घंटे और ५८ मिनिट में जत्रा समाप्त की थी। दौड़ की समाप्ति पर वह बिलकुल तरोताजा था, किन्तु बड़े बड़े प्रसिद्ध मांसाहारी पहलवान थकावट से चकनाचूर होकर पहुंचे थे। यह घटना बतलाती है कि मनुष्य मांसाहारी नहीं प्रत्युत फलाहारी है। क्योंकि मनुष्य के शरीर की बनावट, उसके दांत और आतों को देखकर डॉक्टरों ने निर्णय किया है कि मनुष्य की स्वाभाविक खुराक फल ही है। डॉक्टर लुई कुन्हें के हवाले से पूज्य पण्डित महावीरप्रसाद द्विवेदी कहते हैं कि मनुष्य का स्वाभाविक भोजन फल, फूल और कन्द आदि स्वाभाविक भोजन फल, फूल और कन्द आदि है। स्वाभाविक भोजन के छोड़ते ही से हमलोग विविध भांति के रोगों से पीड़ित हो रहे हैं।अभ्यास से मनुष्यों ने अपनी इंद्रियों को स्वाभाविक शक्ति को ऐसा बिगड़ा है कि जिस वस्तु को देखकर हम को घृणा होनी चाहिये, उसे ही हम प्रसन्नातापूर्वक खाते हैं। इस विषय में पशु ही हमसे अच्छे हैं जो पशु घास खाते हैं वह मांस की तरफ देखते भी नहीं और जो मांस खाते हैं वह घास की ओर दृष्टिपात भी नहीं करते ।

इसी प्रकार फल और कन्द आदि खानेवाले जीव भी उन पदार्थों को छोड़कर घास-पात नहीं खाते और प्यास लगने पर भी सोडावाटर और मद्य नहीं पीते, परन्तु मनुष्य एक विलक्षण पशु है। यह घास-पात, फल फूल मांस-मदिरा सभी उदरस्थ कर जाता है। फिर भला उसका शरीर क्यों न रोगों का घर बन जावे? भोजन के अनुसार स्थलचर पशुओं के तीन भेद है-मांसभक्षी, वनस्पतिभक्षी, और फलभक्षी। बिल्ली, कुत्ता और सिंह आदि जितने हिंसक जन्तु हैं, वे सब मांसभक्षी है। उनका स्वाभाविक भोजन मांस ही है इसलिए उनके दाँत लम्बे और नुकीले और दूर दूर होते हैं। इस प्रकार के दाँतों से से जीव मांस को फाड़कर निगल जाते हैं। उनके दाँतों की रचना से यह सूचित होता है कि ईश्वर ने इन्हें मांस खाने के ही लिए वैसे दाँत दिये हैं। गाय, बैल, भेंस, बकरी आदि जीव वनस्पतिभक्षी हैं। इसलिए ईश्वर ने उनके दाँत ऐसे बनाये हैं, जिसने के उन दाँतों ने घास को सहज ही में काट सकें। उनके दाँतों की रचना ही उनके वनस्पतिभक्षी होने का प्रमाण है। किन्तु मनुष्य के दाँत न तो मांसभक्षी पशुधों से मिलते हैं और न घासपक्षी पशुओं से ही। उनकी बनावट ठीक वैसी ही है जैसी बन्दर आदि फलभोगी जीवों की होती है। इसलिए यह बात निर्विवाद है, निर्भान्त है और निःसंशय है कि ईश्वर ने मनुष्यों के दाँत फल खाने ही के लिए बनाए हैं। परन्तु हम लोग जब उनसे मांस और मच्छली काटने लगे हैं, आगरे की दालमोठ और लखनऊ की रेवड़ी तोड़ने लगे हैं, इस पर भी कोई नीरोग होने का दावा कर सकता है ?
क्रमशः

प्रस्तुति – देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन ‘उगता भारत’

Comment:

betpark giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
holiganbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
holiganbet güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
holiganbet güncel
holiganbet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
klasbahis giriş
klasbahis giriş
klasbahis
holiganbet güncel
imajbet güncel
bettilt giriş
bettilt giriş
grandpashabet giriş
holiganbet güncel giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş