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आओ कुछ जाने आज का चिंतन

कहीं हम हिन्दी से मीलों दूर तो नहीं…?

प्रत्येक वर्ष के समान इस वर्ष भी 14 सितम्बर 2019 को हिन्दी दिवस आ रहा है। जो लोग विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों अथवा सरकारी तन्त्रों से संयुक्त हैं वे लोग ही प्रायः हिन्दी दिवस को मनाते हैं, अन्य लोग प्रायः सामान्यज्ञान से तो जान लेते हैं किन्तु हिन्दी दिवस मानाना नहीं जानते।
जो लोग हिन्दी दिवस मनाते हैं, उन सभी की प्रायः करके मजबूरी होती है, क्योंकि सरकार के आदेश का अनुपालन करना है। हिन्दी दिवस प्रातः 10 बजे से आरम्भ होता है और अधिकतम 5 बजे तक समाप्त हो जाता है। इस समयावधि के काल में आयोजकों की ओर से नियम किया जाता है कि सभी हिन्दी भाषा में ही वार्तालाप तथा विचारों को प्रस्तुत करेंगे।
किन्तु जब हिन्दी दिवस का दिन अर्थात् 14 सितम्बर का समय समाप्त तब शायद हम भूल ही जाते हैं कि हमने हिन्दी दिवस मनाया भी था।
कुछ ध्यान देने का प्रयास करते हैं – हिन्दी दिवस की ऐतिहासिकता पर। 14 सितम्बर 1949 को अत्यन्त तर्क-वितर्कयुक्त वार्तालाप के पश्चात् यह भारतीय संविधान सभा ने भाग-17 के अध्याय की धारा 343-1 के अनुसार एक मत से निर्णय लिया कि ‘संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा।’
किन्तु अधिनियम के खण्ड-2 में लिखा गया कि ‘इस संविधान के लागू होने के समय से 15 वर्ष की अवधि तक संघ के उन सभी प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग होता रहेगा, जिसके लिए इसके लागू होने से तुरन्त पूर्व होता था।’ अनुच्छेद की धारा-3 में व्यवस्था की गई कि – ‘संसद उक्त पन्द्रह वर्ष की कालावधि के पश्चात् विधि द्वारा (क) अंग्रेजी भाषा का (अथवा) अंकों के देवनागरी रुप का ऐसे प्रयोजन के लिए प्रयोग उपबन्धित कर सकेगी जैसे कि ऐसी विधि में उल्लिखित हों।’
चाहिए तो यह था कि संविधान में हिन्दी को ही राष्ट्रभाषा माना जाता। अंग्रेजी के सहयोग की बात ही नहीं आनी चाहिए थी। कारण यह है कि राष्ट्रभाषा राष्ट्र की आत्मा का प्रतीक है।
हमारे साथ स्वतन्त्र होने वाले पाकिस्तान ने उर्दू को राष्ट्र भाषा घोषित कर दिया। तुर्की के जनप्रिय नेता कमाल पाशा ने स्वतन्त्र होने के तुरन्त बाद ही तुर्की को राष्ट्र भाषा बना दिया, इसके साथ ही अपने नाम से पाशा विदेशी शब्द को हटाकर अतातुर्क कर दिया। हमारे पश्चात् स्वतन्त्र होने वाले अनेक राष्ट्रों ने अपनी-अपनी राष्ट्र भाषा को घोषित किया किन्तु भारत के कर्णधार सबको खुश करने की राजनीति कर रहे थे। सबको खुश करने का तात्पर्य सबको नाराज करना होता है और वही हुआ। संविधान निर्माण के समय देश के प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरु थे। वे शरीर से तो भारतीय थे किन्तु आन्तरिक रूप से यूरोपीय थे। पण्डित नेहरु ने राष्ट्र भाषा के सिंहासन पर हिन्दी के राज्याभिषेक का विरोध किया। हिन्दी के राज्याभिषेक से भारत के उत्तर-दक्षिण का बटवारा दिखाई देने लगा। हिन्दी में वैज्ञानिक, सामाजिक, कूटनीतिक, व्यापारिक शब्दावली का अभाव दिखाया गया। कुरुप या कमजोर होने पर क्या माँ को माँ नहीं कहा जाता? अगर उस समय पण्डित नेहरु चाहते तो हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा होती।
येन केन प्रकारेण हिन्दी को राजभाषा का दर्जा तो दिया गया, इसी महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को प्रत्येक क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर 1953 से पूरे भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है।
जब राजभाषा के रूप में हिन्दी भाषा का चयन किया गया और लागू किया गया तो गैर-हिन्दी भाषी राज्य के लोग इसका विरोध करने लगे, जिस कारण से अंग्रेजी भाषा को भी राजभाषा का दर्जा देना पड़ा।
महात्मा गांधी ने स्वयं हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात कही थी। सन् 1918 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए गांधी जी ने कहा था कि हिन्दी ही देश की राष्ट्रभाषा होनी चाहिए, लेकिन आजादी के बाद न गांधी जी रहे न उनका स्वप्न रहा। सत्तासीन गांधीवादियों ने ही गांधी के स्वप्न की होली जला दी। भाषा और जाति के नाम पर राजनीति करने वाले राजनीतिज्ञों ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा नहीं बनने दिया। और तब इन्हीं विवादों के अधीन हुई हिन्दी अब अपना भविष्य सुनिश्चित नहीं कर पा रही है।
संस्कृत भाषा से हिन्दी भाषा का जन्म हुआ है, हिन्दी एक ऐसी भाषा है, जो व्यक्ति के अन्तःकरण को छू लेती है। हिन्दी राष्ट्र की आत्मा है। भारत की एकरुपता की धुरी है। भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता की मूल चेतना को सूक्ष्मता से अभिव्यक्त करने का माध्यम है। राष्ट्रीय विचारों का कोश है। भारतीयता की पहचान है। भारतवर्ष की आजादी में सर्वाधिक यदि किसी भाषा का सहयोग था तो वह थी हिन्दी। हिन्दी भाषा राष्ट्र के नागरिकों में राष्ट्रीय प्रेम के मन्त्रों को उजागर करती है। प्रत्येक गतिविधि को करते हुये शब्दों का उच्चारण एकात्मता को प्रस्तुत करते हैं। प्रत्येक शब्द में उसके भाव छिपे हैं। जब बच्चे का जन्म होता है तब बच्चा बड़े आत्मीय भाव से माँ शब्द का सम्बोधन करता है। माँ शब्द के उच्चारण से ही माता और बच्चे की बीच स्वतः आत्मीय भावों की ज्वाला स्फुटित हो उठती है। ऐसा लगता है कि इन भावों को अंग्रेजियत ने परतन्त्र कर दिया है। जब कभी हमसे कोई गलती हो जाती है तब हम ‘क्षमा’ के स्थान पर ‘साॅरी’ शब्द का प्रयोग करते हैं, जब कभी कोई चोट लग जाये तो उस समय ‘आह’ के स्थान पर ‘आउच्’ की आवाज आती है।
इस अंग्रेजियत के भूत को कोई और आप पर आरोपित नहीं कर रहा अपितु हम स्वयं ही उसको अपने ऊपर आरोपित होने दे रहे हैं। हम स्वयं ही अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में मोटी-मोटी फीस देकर भर्ती करवाते और फिर अभिवादन से लेकर रात्रि सोने तक अंग्रेजी में ही अपनी बात कहने का स्वभाव बना लेते हैं।
पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति ने हिन्दी-भाषी परिवारों को मोहित कर लिया है। अंग्रेजी का जादू सिर चढ़कर बोल रहा है। प्रातः, सायं तथा रात्रि का अभिवादन ‘गुड माॅर्निंग, गुड ईवनिंग, गुड नाइट’ से होता है। माता-पिता ‘मम्मी-डैडी’ बन गये हैं। बहन ‘सिस्टर’ और पत्नी ‘वाइफ’ बन गई है। अंकल-आॅटी के दर्शन हो कहीं भी हो सकते हैं, रिश्तों का कोई औचित्य नहीं, इस अंग्रेजी ने सीमित परिवार का निर्माण कर दिया। वार्तालाप में गैर-अंग्रेजी शब्दों से व्यक्तित्व ही नहीं प्रदर्शित होता।
सेण्ट्रल बोर्ड आफ सेकेण्डरी एजूकेशन की परीक्षा-पद्धति हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन को हतोत्साहित करने का केन्द्रीय षड्यन्त्र है। 11 वीं कक्षा में ‘एक भाषा’ की उत्तीर्णता की अनिवार्यता ने अंग्रेजी लेने को प्रोत्साहित किया और डाॅक्टर, इंजीनियर, विधि-विशेषज्ञ, गणितज्ञ अथवा वैज्ञानिक बनने के इच्छुक छात्रों को हिन्दी त्यागने के लिए विवश किया जा रहा है।
अंग्रेजी का मोह रग-रग में व्याप्त हो रहा है। अंग्रेजी शैली के नृत्य-संगीत तथा यौन-सम्बन्धों के पंखों पर तैरते हुए आनन्द-लोक दिखाई देने लगा, क्लब-सभ्यता में परमानन्द की प्राप्ति प्रतीत होने लगे। फलतः अंग्रेजी का मोह कामवासना और असंतुष्टि का ज्वारभाटा बनकर छा गया और देश की तरुणाई को अज्ञान, अविद्या, भ्रान्ति तथा दुःख की गहरी खाई में डूबो रहा है।
इतना ही नहीं, हिन्दी के नाम पर आजीविका पाने वाले हिन्दी के विस्तारक, ठेकेदार, साहित्यकार, कर्णधार अपने बच्चों को हिन्दी की छाया से भी दूर हटाते जा रहे हैं, उन्हें कान्वेंट स्कूलों में शिक्षा दिला रहे हैं। हिन्दी की अगली पीढ़ी को अंग्रजीभक्त बना रहे हैं। आज बड़े उत्साह व उमंग के साथ हम अपने बच्चों को अंग्रेजियत की चादर उढ़ा रहे हैं। पर वह दिन दूर नहीं जब आपके बच्चे ही आपको कहेंगे कि आपसे अपनी भाषा तो संभाली नहीं गई फिर हम आपको कैसे संभालें? आपको आपके घर से ही दूर कर दिया जायेगा, तब शायद हिन्दी के महत्त्व को समझ सकोगे।
ऐसा नहीं है कि आप परिवर्तन नहीं ला सकते। आपके पास वो शक्ति है तो समस्त विपदाओं को हटा के नये भारत का निर्माण कर सकती है। वर्तमान सरकार हिन्दी प्रिय है। ऐसे में हम अपने घर और समाज की अंग्रेजी-मानसिकता को बदलकर हिन्दी वातावरण का निर्माण कर सकते हैं। घर में हिन्दी बोलें, हिन्दी के दैनिक, साप्ताहिक, मासिक पत्र-पत्रिकाओं को खरीद कर पढ़ें, हिन्दी की श्रेष्ठ साहित्यिक पुस्तकों को पढ़ने का स्वभाव बनाएँ, निजी पत्र-व्यवहार हिन्दी में करें।
अपने बच्चों को कान्वेंट शिक्षण से दूर रखें। अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूलों की शिक्षण-पद्धति से दूर रहें। हिन्दी पठन-पाठन पर बल दें। शिक्षा का माध्यम हिन्दी को ही स्वीकार करें।
घर में अंग्रेजी-संस्कृति की छाप मिटाएँ। मम्मी-डैडी, सिस्टर-ब्रदर, अंकल-आँटी शब्दों के प्रयोग का परित्याग कर माता-पिता, बहिन, भाई, चाची-चाचा शब्दों से रिश्तों का परिचय दें।
अपने नाम-पट्ट, व्यापारिक संस्थाओं के बोर्ड, बीजक, बहीखाते तथा लैटरपैड (पत्रक) हिन्दी में रखें। पत्र-व्यवहार में हिन्दी अपनाएँ।
हमारे देश में हिन्दी को माँ शब्द से सम्बोधित किया जाता है। माँ हमें सही मार्ग दिखाने के लिए तैयार है, हम स्वयं को जागरुक कर अपनी माँ हिन्दी की शरण में पहुँचें। यदि हम हिन्दी को जीवित रखेंगे तो हमारी पहचान सुरक्षित है, अन्यथा हम कूप के गहरे गर्त में गिरते चले जायेंगे। हम हिन्दी को समझ सकें और हिन्दी हमें। यही इस हिन्दी दिवस का प्रयोजन है। कहीं ऐसा न हो कि हिन्दी हमसे कोशों दूर चली जाये…प्रत्येक वर्ष के समान इस वर्ष भी 14 सितम्बर 2019 को हिन्दी दिवस आ रहा है। जो लोग विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों अथवा सरकारी तन्त्रों से संयुक्त हैं वे लोग ही प्रायः हिन्दी दिवस को मनाते हैं, अन्य लोग प्रायः सामान्यज्ञान से तो जान लेते हैं किन्तु हिन्दी दिवस मानाना नहीं जानते।
जो लोग हिन्दी दिवस मनाते हैं, उन सभी की प्रायः करके मजबूरी होती है, क्योंकि सरकार के आदेश का अनुपालन करना है। हिन्दी दिवस प्रातः 10 बजे से आरम्भ होता है और अधिकतम 5 बजे तक समाप्त हो जाता है। इस समयावधि के काल में आयोजकों की ओर से नियम किया जाता है कि सभी हिन्दी भाषा में ही वार्तालाप तथा विचारों को प्रस्तुत करेंगे।
किन्तु जब हिन्दी दिवस का दिन अर्थात् 14 सितम्बर का समय समाप्त तब शायद हम भूल ही जाते हैं कि हमने हिन्दी दिवस मनाया भी था।
कुछ ध्यान देने का प्रयास करते हैं – हिन्दी दिवस की ऐतिहासिकता पर। 14 सितम्बर 1949 को अत्यन्त तर्क-वितर्कयुक्त वार्तालाप के पश्चात् यह भारतीय संविधान सभा ने भाग-17 के अध्याय की धारा 343-1 के अनुसार एक मत से निर्णय लिया कि ‘संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा।’
किन्तु अधिनियम के खण्ड-2 में लिखा गया कि ‘इस संविधान के लागू होने के समय से 15 वर्ष की अवधि तक संघ के उन सभी प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग होता रहेगा, जिसके लिए इसके लागू होने से तुरन्त पूर्व होता था।’ अनुच्छेद की धारा-3 में व्यवस्था की गई कि – ‘संसद उक्त पन्द्रह वर्ष की कालावधि के पश्चात् विधि द्वारा (क) अंग्रेजी भाषा का (अथवा) अंकों के देवनागरी रुप का ऐसे प्रयोजन के लिए प्रयोग उपबन्धित कर सकेगी जैसे कि ऐसी विधि में उल्लिखित हों।’
चाहिए तो यह था कि संविधान में हिन्दी को ही राष्ट्रभाषा माना जाता। अंग्रेजी के सहयोग की बात ही नहीं आनी चाहिए थी। कारण यह है कि राष्ट्रभाषा राष्ट्र की आत्मा का प्रतीक है।
हमारे साथ स्वतन्त्र होने वाले पाकिस्तान ने उर्दू को राष्ट्र भाषा घोषित कर दिया। तुर्की के जनप्रिय नेता कमाल पाशा ने स्वतन्त्र होने के तुरन्त बाद ही तुर्की को राष्ट्र भाषा बना दिया, इसके साथ ही अपने नाम से पाशा विदेशी शब्द को हटाकर अतातुर्क कर दिया। हमारे पश्चात् स्वतन्त्र होने वाले अनेक राष्ट्रों ने अपनी-अपनी राष्ट्र भाषा को घोषित किया किन्तु भारत के कर्णधार सबको खुश करने की राजनीति कर रहे थे। सबको खुश करने का तात्पर्य सबको नाराज करना होता है और वही हुआ। संविधान निर्माण के समय देश के प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरु थे। वे शरीर से तो भारतीय थे किन्तु आन्तरिक रूप से यूरोपीय थे। पण्डित नेहरु ने राष्ट्र भाषा के सिंहासन पर हिन्दी के राज्याभिषेक का विरोध किया। हिन्दी के राज्याभिषेक से भारत के उत्तर-दक्षिण का बटवारा दिखाई देने लगा। हिन्दी में वैज्ञानिक, सामाजिक, कूटनीतिक, व्यापारिक शब्दावली का अभाव दिखाया गया। कुरुप या कमजोर होने पर क्या माँ को माँ नहीं कहा जाता? अगर उस समय पण्डित नेहरु चाहते तो हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा होती।
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इस अंग्रेजियत के भूत को कोई और आप पर आरोपित नहीं कर रहा अपितु हम स्वयं ही उसको अपने ऊपर आरोपित होने दे रहे हैं। हम स्वयं ही अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में मोटी-मोटी फीस देकर भर्ती करवाते और फिर अभिवादन से लेकर रात्रि सोने तक अंग्रेजी में ही अपनी बात कहने का स्वभाव बना लेते हैं।
पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति ने हिन्दी-भाषी परिवारों को मोहित कर लिया है। अंग्रेजी का जादू सिर चढ़कर बोल रहा है। प्रातः, सायं तथा रात्रि का अभिवादन ‘गुड माॅर्निंग, गुड ईवनिंग, गुड नाइट’ से होता है। माता-पिता ‘मम्मी-डैडी’ बन गये हैं। बहन ‘सिस्टर’ और पत्नी ‘वाइफ’ बन गई है। अंकल-आॅटी के दर्शन हो कहीं भी हो सकते हैं, रिश्तों का कोई औचित्य नहीं, इस अंग्रेजी ने सीमित परिवार का निर्माण कर दिया। वार्तालाप में गैर-अंग्रेजी शब्दों से व्यक्तित्व ही नहीं प्रदर्शित होता।
सेण्ट्रल बोर्ड आफ सेकेण्डरी एजूकेशन की परीक्षा-पद्धति हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन को हतोत्साहित करने का केन्द्रीय षड्यन्त्र है। 11 वीं कक्षा में ‘एक भाषा’ की उत्तीर्णता की अनिवार्यता ने अंग्रेजी लेने को प्रोत्साहित किया और डाॅक्टर, इंजीनियर, विधि-विशेषज्ञ, गणितज्ञ अथवा वैज्ञानिक बनने के इच्छुक छात्रों को हिन्दी त्यागने के लिए विवश किया जा रहा है।
अंग्रेजी का मोह रग-रग में व्याप्त हो रहा है। अंग्रेजी शैली के नृत्य-संगीत तथा यौन-सम्बन्धों के पंखों पर तैरते हुए आनन्द-लोक दिखाई देने लगा, क्लब-सभ्यता में परमानन्द की प्राप्ति प्रतीत होने लगे। फलतः अंग्रेजी का मोह कामवासना और असंतुष्टि का ज्वारभाटा बनकर छा गया और देश की तरुणाई को अज्ञान, अविद्या, भ्रान्ति तथा दुःख की गहरी खाई में डूबो रहा है।
इतना ही नहीं, हिन्दी के नाम पर आजीविका पाने वाले हिन्दी के विस्तारक, ठेकेदार, साहित्यकार, कर्णधार अपने बच्चों को हिन्दी की छाया से भी दूर हटाते जा रहे हैं, उन्हें कान्वेंट स्कूलों में शिक्षा दिला रहे हैं। हिन्दी की अगली पीढ़ी को अंग्रजीभक्त बना रहे हैं। आज बड़े उत्साह व उमंग के साथ हम अपने बच्चों को अंग्रेजियत की चादर उढ़ा रहे हैं। पर वह दिन दूर नहीं जब आपके बच्चे ही आपको कहेंगे कि आपसे अपनी भाषा तो संभाली नहीं गई फिर हम आपको कैसे संभालें? आपको आपके घर से ही दूर कर दिया जायेगा, तब शायद हिन्दी के महत्त्व को समझ सकोगे।
ऐसा नहीं है कि आप परिवर्तन नहीं ला सकते। आपके पास वो शक्ति है तो समस्त विपदाओं को हटा के नये भारत का निर्माण कर सकती है। वर्तमान सरकार हिन्दी प्रिय है। ऐसे में हम अपने घर और समाज की अंग्रेजी-मानसिकता को बदलकर हिन्दी वातावरण का निर्माण कर सकते हैं। घर में हिन्दी बोलें, हिन्दी के दैनिक, साप्ताहिक, मासिक पत्र-पत्रिकाओं को खरीद कर पढ़ें, हिन्दी की श्रेष्ठ साहित्यिक पुस्तकों को पढ़ने का स्वभाव बनाएँ, निजी पत्र-व्यवहार हिन्दी में करें।
अपने बच्चों को कान्वेंट शिक्षण से दूर रखें। अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूलों की शिक्षण-पद्धति से दूर रहें। हिन्दी पठन-पाठन पर बल दें। शिक्षा का माध्यम हिन्दी को ही स्वीकार करें।
घर में अंग्रेजी-संस्कृति की छाप मिटाएँ। मम्मी-डैडी, सिस्टर-ब्रदर, अंकल-आँटी शब्दों के प्रयोग का परित्याग कर माता-पिता, बहिन, भाई, चाची-चाचा शब्दों से रिश्तों का परिचय दें।
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