ओ३म् “क्या हमारा अगला जन्म मनुष्य योनि में होगा?”

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संसार में हम चेतन जीवात्माओं के अनेक योनियों में जन्मों को देखते हैं। मनुष्य जन्म में उत्पन्न दो जीवात्माओं की भी सुख व दुःख की अवस्थायें समान नहीं होती। मनुष्य योनि तथा पशु-पक्षी की सहस्रों जाति प्रजातियों में जीवात्मायें एक समान हैं जिनके सुख दुःख अलग-अलग हैं। इसका कोई तो कारण होगा? वैदिक धर्म व इसके कर्मफल सिद्धान्त का अध्ययन करने से इनका तर्क एवं युक्तिसंगत उत्तर प्राप्त होता है। दर्शन ग्रन्थ बतातें हैं कि जीवात्मा के जन्म का आधार, चाहे वह मनुष्य जन्म हो व अन्य असंख्य योनियों में से किसी एक योनि में हो, सदैव कर्म होते हैं। यह कर्म इस जन्म के न होकर पूर्वजन्म के होते हैं। योगदर्शन में बताया गया है कि मनुष्य के किसी जन्म में जो उसकी योनि, भोग के अन्तर्गत सुख व दुःख तथा आयु प्राप्त होती है, वह उसके पूर्वजन्म के पाप व पुण्य कर्मों के आधार पर होती है। हमारे इस जन्म के पाप व पुण्य हमारे अगले जन्म की योनि व जाति, भोग अर्थात् सुख व दुःख तथा आयु का निर्धारण करेंगे। इसी प्रकार से हमारे इस जन्म में हमें मनुष्य योनि मिलने, हमारे समस्त सुख व दुःख तथा हमारी आयु का कारण हमारे पूर्वजन्म के कर्म सिद्ध होते हैं। वर्तमान समय से पूर्व हम जो शुभ व अशुभ कर्म कर चुकें हैं, हम उनका सुधार नहीं कर सकते परन्तु हम भविष्य के अपने कर्मों का तो निश्चय ही सुधार कर सकते हैं और ऐसा करके हम अपने आगामी जन्म की योनि वा जाति, भोग एवं आयु को अपने अनुकूल सुखद व मोक्षगामी बना सकते हैं।

हम इस जन्म में पूर्वजन्म के कर्मों के आधार पर परमात्मा द्वारा मनुष्य बनाये गये हैं और अगले जन्म में भी परमात्मा हमें हमारे कर्मों के अनुसार हमारे माता-पिता का निर्धारण कर मनुष्य व मनुष्येतर किसी भी योनि में, जिसके कि हम पात्र होंगे, जन्म प्रदान करेगा। इस कर्म-फल सिद्धान्त को प्रत्येक मनुष्य को जानना चाहिये और अपने वर्तमान जन्म में श्रेष्ठ वेदानुकूल, मनुष्योचित, परोपकार से युक्त, देशहित तथा प्राणीमात्र के हितकारी कार्यों को करते हुए अपनी जीवन की उन्नति करनी चाहिये। इसके साथ ही इस जन्म में ईश्वर, आत्मा, प्रकृति व सृष्टि के सत्यस्वरूप को जानकर हमें ईश्वरोपासना तथा श्रेष्ठतम कर्म यज्ञ का अनुष्ठान भी करना होगा। ऐसा करने पर हमारा परजन्म अर्थात् अगला जन्म निश्चय ही मनुष्यों की योनि व अच्छे परिवेश में प्राप्त होगा जहां हम वेदानुकूल जीवन व्यतीत करते हुए मोक्ष प्राप्ति के साधन कर सकते हैं और मोक्ष की प्राप्ति व मोक्ष तक पहुंचने में सफलता प्राप्त कर सकते हैं।

वैदिक काल में हमारे वैदिक विद्वान व ऋषिगण ईश्वर को जानने वाले व उसका साक्षात्कार करने वाले होते थे। महाराज मनु एक ऋषि थे और वेदों के मर्मज्ञ विद्वान थे। उन्होंने मनुस्मृति ग्रन्थ का प्रणयन किया जिसे मानव धर्म शास्त्र की संज्ञा दी जाती है। उनका विधान है कि मनुष्य के पाप व पुण्य बराबर व पुण्य आधे से अधिक होने पर जीवात्मा का अगला जन्म मनुष्य योनि में होता है। मनुष्य के लिये श्रेष्ठ कर्म वहीं है जिनका विधान वेदों में है। वेदों में जिन कर्मों का निषेध है वह पुण्य कर्म न होकर अधर्म व पाप कर्म होते हैं। पुण्य कर्मों का फल सुख तथा पाप कर्मों का फल दुःख इस जन्म व भावी जन्मों में जीवात्मा को प्राप्त होता है। कर्म फल सिद्धान्त में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि मनुष्य वा जीवात्मा जो भी कर्म करता है, उस प्रत्येक कर्म का सुख व दुःख रूपी फल उसे भोगना पड़ता है। मनुष्य का कोई कर्म बिना उसका फल भोगे छूटता नहीं है। कर्म का फल सभी जीवात्माओं को अवश्यमेव भोगना पड़ता है। ऐसी शंका भी की जाती है कि कोई मनुष्य अच्छे कर्म अधिक करे और बुरे व पाप कर्म कम करे तो उन कर्मों का आपस में समायोजन होकर बुरे कर्म पुण्य कर्मों में समाविष्ट होकर जो शेष पुण्य कर्म फल बचे उनका ही फल मनुष्य व उसकी आत्मा को वर्तमान व भविष्य काल में मिले। इसका कर्म फल के अध्येता विद्वान वा विशेषज्ञ उत्तर देते हैं कि मनुष्य को अपने शुभ व अशुभ कर्मों का फल अलग अलग अर्थात् प्रत्येक शुभ कर्म का सुख तथा अशुभ कर्म का फल दुःख भोगना पड़ता है। उदाहरण के रूप में हम कह सकते हैं कि एक व्याक्ति ने दस व्यक्तियों की जान बचाई तथा एक निर्दोष व्यक्ति की जान ली, ऐसी स्थिति में उसे 10 व्यक्तियों की जान बचाने का फल सुख के रूप में मिलेगा और एक हत्या का फल दुःख के रूप में अवश्य ही भोगना पड़ेगा। कर्मफल सिद्धान्त है ‘‘अवश्यमेव हि भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्” अर्थात् मनुष्य को अपने शुभ व अशुभ कर्मों का फल अवश्य ही भोगना पड़ेगा, उससे वह बच नहीं सकता और न किसी मत, पंथ व सम्प्रदाय के आचार्य और यहां तक की ईश्वर भी किसी पाप कर्म के करने वाले को क्षमा मांगने पर क्षमा कर सकता है। यदि ऐसा न हो तो ईश्वर की न्याय व्यवस्था कायम नहीं रहेगी और संसार में अव्यवस्था फैल जायेगी।

सुख की इच्छा करने वाले मनुष्य को सदैव वेदविहित शुभ कर्म ही करने चाहियें इससे वह दुःखों से बच सकता है। प्राचीन काल में हमारे पूर्वज ऋषि मुनियों ने वेदों के आधार पर सुखों का आधार पंचमहायज्ञों का विधान किया है। यह पंचमहायज्ञ मनुष्य के आवश्यक कर्तव्य हैं जिसे प्रत्येक मनुष्य को श्रद्धा व निष्ठा से करना चाहिये। यह पांच कर्तव्य हैं 1- ईश्वरोपासना वा सन्ध्या, 2- देवयज्ञ अर्थात् प्रातः व सायं अग्निहोत्र यज्ञ, 3- पितृ यज्ञ अर्थात् माता-पिता की नित्य प्रति सेवा व उन्हें सन्तुष्ट रखना, 4- अतिथि यज्ञ अर्थात् विद्वान अतिथियों का सेवा सत्कार एवं सम्मान तथा 5- बलिवैश्वदेवयज्ञ अर्थात् सभी प्राणियों, पशु, पक्षियों व कीट-पतंगों आदि के प्रति अहिंसा व प्रेम का भाव रखना व उनके जीवन यापन में सहायक होना, उन्हें यथाशक्ति भोजन कराना व उन्हें आश्रय देना। अकारण किसी पशु के प्रति हिंसा का व्यवहार कदापि न करना। ऐसा करते हुए इन कर्मों से अतिरिक्त मनुष्य को कुछ विशेष कर्म व कार्य भी करने होते हैं जिनसे मोक्ष व आनन्द की प्राप्ति होती है। इस विषय का विस्तृत वर्णन हमें ऋषि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश के नवम् समुल्लास में मिलता है। सत्यार्थप्रकाश विश्व का एक सर्वोत्तम ग्रन्थ है जो सत्य व सत्य के अर्थों का प्रकाश तथा असत्य व अविद्या का परिचय कराता है। अज्ञान रूपी अविद्या से मुक्त होने की प्रेरणा भी करता है। इस ग्रन्थ का अघ्ययन कर मनुष्य ईश्वरभक्त, देशभक्त, समाजसेवी, शिक्षक, आदर्श नागरिक, आदर्श माता-पिता, बन्धु, मित्र, सखा तथा ईश्वर का प्रिय बन जाता है। अतः सबको इस ग्रन्थ का अध्ययन अवश्य ही करना चाहिये।

विद्या से अमृत व मोक्ष की प्राप्ति होती है। मोक्ष जन्म व मरण से होने वाले समस्त दुःखों की निवृत्ति को कहते हैं। यही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है। सत्यार्थप्रकाश के नवम समुल्लास में ऋषि दयानन्द ने मोक्ष प्राप्ति के साधन विद्या तथा अविद्या पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि जो मनुष्य विद्या और अविद्या के स्वरूप को साथ ही साथ जानता है वह अविद्या अर्थात् कर्मोपासना से मृत्यु को तर कर विद्या अर्थात् यथार्थ ज्ञान से मोक्ष को प्राप्त होता है। अविद्या का लक्षण बताते हुए वह कहते हंै कि जो अनित्य संसार और देहादि में नित्य अर्थात् जो कार्य जगत् देखा, सुना जाता है सदा रहेगा, सदा से है और योगबल से यही देवों का शरीर सदा रहता है वैसी विपरीत बुद्धि होना अविद्या का प्रथम भाग है। ऋषि दयानन्द आगे कहते हैं कि अशुचि अर्थात् मलमय स्त्री आदि के शरीर और मिथ्याभाषण, चोरी आदि अपवित्र में पवित्र बुद्धि, दूसरा, अत्यन्त विषयसेवनरूप दुःख में सुख बुद्धि आदि तीसरा, अनात्मा में आत्मबुद्धि करना अविद्या है। चार प्रकार का विपरीत ज्ञान अविद्या कहलाती है। इस के विपरीत अर्थात् अनित्य में अनित्य और नित्य में नित्य, अपवित्र में अपवित्र और पवित्र में पवित्र, दुःख में दुःख, सुख मे सुख, अनात्मा में अनात्मा और आत्मा में आत्मा का ज्ञान होना विद्या है। जिससे पदार्थों का यथार्थ स्वरूप बोध होवे वह विद्या और जिस से तत्वस्वरूप न जान पड़े, अन्य में अन्य बुद्धि होवे वह अविद्या कहलाती है। अर्थात् कर्म और उपासना अविद्या इसलिये हंै कि यह बाह्य और अन्तर क्रियाविशेष नाम हैं, ज्ञान विशेष नहीं। इसी से यजुर्वेद 40/14 मन्त्र में कहा गया है कि विना शुद्ध कर्म और परमेश्वर की उपासना के मृत्यु दुःख से पार काई नहीं होता। अर्थात् पवित्र कर्म, पवित्रोपासना और पवित्र ज्ञान ही से मुक्ति (जीवात्मा की आनन्द की अवस्था) और अपवित्र मिथ्याभाषणादि कर्म पाषाण मूर्ति आदि की उपासना और मिथ्याज्ञान से बन्ध (जन्म-मरण रूपी दुःख) होता है। ऋषि दयानन्द प्रदत्त इस जानकारी से यह लाभ है कि विद्या और विद्या को जानकर मनुष्य जीवन की उन्नति के अर्थ मोक्ष प्राप्ति के मार्ग पर चलकर अर्थात् आचरण करके, विद्या का धारण व सेवन कर, अपने आगामी जीवन में ज्ञानवान् मनुष्य बनता वा मोक्ष प्राप्ति में सफल होता है। ऐसा करके ही सभी मनुष्य अपनी आत्माओं को परजन्म में सुख व आनन्द प्रदान कर सकते हैं।

हमारा भावी जन्म हमारे इस वर्तमान जन्म के शुभ व अशुभ कर्मों का परिणाम होगा। हम नहीं चाहते कि हममें से कोई अगले जन्म में मनुष्य न बनकर पशु व पक्षी आदि किसी योनि में जन्म लें जहां दुःख अधिक व सुख कम मात्रा में होते हैं। इसका अनुमान हम संसार में मनुष्य व पशु-पक्षी आदि प्राणियों के जीवन को देखकर लगा सकते हैं। यदि इस जन्म में हमारे शुभ व पुण्य कर्म आधे से अधिक होंगे और अशुभ व पाप कर्म आधे से कम होंगे, तो निश्चय ही परमात्मा हमें अगला जन्म हमारे कर्मानुसार मनुष्य योनि में उत्तम स्थिति व परिवेश में प्रदान करेंगे। इस कर्म-फल रहस्य को जानकर हमें अशुभ कर्मों का करना अद्यावधि छोड़ देना चाहिये और जन्म-जन्मान्तर में सुखों के हेतु शुभ व पुण्य वैदिक कर्मों सहित पंचमहायज्ञ आदि कर्मों को निष्ठा व श्रद्धापूर्वक करना चाहिये। हम अगले जन्म में मनुष्य तभी बनेंगे जब इस जन्म में हमारे शुभकर्म आधे से अधिक होंगे और पाप कर्म न्यून होंगे। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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