226 नाच दिखाके शांत हो , करे नर्तकी रोज । प्रकृति पीछे हटे , हो जाता जब मोक्ष।। हो जाता जब मोक्ष, जगत रचा ईश्वर ने। जीवों का कल्याण हो, भाव रखा ईश्वर ने।। स्वभाव जैसा जीव का, वही रचाता रास । अपनी अपनी साधना,अपना अपना नाच।। 227 तीन, पांच ,सोलह जुड़ें, संख्या है चौबीस […]
Category: कविता
अध्याय … 75 : जो जन्मा सो जाएगा……
223 अपने धर्म को छोड़कर , जो भी जाता भाग। लोग उसे धिक्कारते, लाख टके की बात।। लाख टके की बात ,माधव ने बताई अर्जुन को। धर्म क्षेत्र के बारे में, सच बतलाया अर्जुन को।। लोक-लायक ना होते, छोड़ भागते जो रण को। लोकनायक वही बनें, जो जानें अपने धर्म को।। 224 जो जन्मा सो […]
अध्याय … 74 काम करो और नाम लो……..
220 जो भी लत हमको लगी, कर देती बर्बाद। दारू – धुआं छोड़ दे, रहना जो आबाद।। रहना जो आबाद , सीख कुछ कछुए से भी। सिकोड़ लेत है अंग, चोट लगे ना मारे से भी।। सिकुड़ कछुए की भांति, क्यों बनता है भोगी ? लक्ष्य वही पा जाएगा , दिल से चाहता जो भी।। […]
अध्याय … 73 योग करें मनोयोग से…..
217 यज्ञ करो संसार में, वर्षा हो भरपूर। अन्न उगेगा खेत में , रोग शोक हों दूर।। रोग शोक हों दूर,फैले खुशहाली चहुंओर। प्रेम – प्रीत सहयोग से, नाचे मन का मोर।। ऋषियों का उपदेश – यज्ञ करो, यज्ञ करो। वेद का संदेश यही – यज्ञ करो, यज्ञ करो।। 218 कामी करता कामना, रहे दुखी […]
अध्याय … 72 : काया, मन, बुद्धि सभी….
214 झूठ कपट को छोड़कर, कर ली ऊंची सोच। अंतः सुख जो हो गया, मिला उसी को मोक्ष।। मिला उसी को मोक्ष, सब आना-जाना छूटा। पाया ब्रह्मानंद उसी ने, मधुरस जिसने लूटा।। झूठी दुनिया छोड़ी जिसने करी नाम की लूट। मिले शरण उसी को, छोड़ दिया जिसने झूठ।। 215 काया, मन, बुद्धि सभी, हों योगी […]
अध्याय … 71 , जिससे सब उत्पन्न हों….
211 सब भूतों में एकरस , रमा हुआ भगवान। अविनाशी उसको कहें, अर्जुन से भगवान।। अर्जुन से भगवान , मिलती मुक्ति उसको। निर्गुण है परमात्मा,ना छूता विकार उसको।। नहीं बांटता भगवान, छूत और अछूतों में। विराजमान है भीतर, जग के सारे भूतों में।। 212 जिससे सब उत्पन्न हों, और धारते प्राण। उसी में सबकी लय […]
अध्याय … 70 आत्मा रथी शरीर में …..
208 खोज अपने आप की, सबसे बड़ी है खोज। जिन खोजो है आपुनो ,बन गई ऊंची सोच।। बन गई ऊंची सोच ,किया विषयों से किनारा। भीतर हुआ प्रकाश ,छोड़ दिया जगत पसारा।। खोजी खोजें खोज में, और ऊंची रखते सोच। सोच मिलती शोध से,और पूरी होती खोज।। 209 मन कपट की धार है, वाणी भरी […]
अध्याय … 69 , हाथ का मनका छोड़…..
205 शिव का कर ले ध्यान तू ,करे वही कल्याण। भवसागर से पार हो, जीवन का हो त्राण।। जीवन का हो त्राण , मिलेगी मुक्ति तुझको। मुनि मनीषी जप रहे, ध्यान लगाकर उसको।। हाथ का मनका छोड़, पकड़ मन का मनका। बेड़ा पार तेरा होगा , ध्यान करेगा शिव का।। 206 पढ़ लिखकर नौकर हुए, […]
अध्याय … 63 जोबन चढ़ती वासना…..
187 सत्व ,रज और तम से बना, चित्त उसी का नाम। जब तामस इसमें बढ़े, करता उल्टे काम।। करता उल्टे काम, अधर्म और अनीति लावै । उल्टी देता सीख मनुज को, अज्ञान बढ़ावै।। विषयों में जा फंसता मानव, छा जाता है तम। बताए प्रकृति के तीन गुण, सत्व ,रज और तम।। 188 वासना के भूत […]
अध्याय … 62 संसार नदिया बह रही …..
184 संसार नदिया बह रही, आशा जिसका नाम। जल मनोरथ से भरी, कलकल कहे प्रभु नाम।। कलकल कहे प्रभु नाम, उठती तरंग तिरसना। राग द्वेष के मगर घूमते, मार रही है रसना।। तर्क वितर्क के पक्षी जल में, करते खुले विहार। अज्ञान रूपी भंवर देखकर, व्याकुल है संसार।। 185 जग नदिया के घाट पर, भई […]