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कविता

अध्याय … 71 , जिससे सब उत्पन्न हों….

          211

सब भूतों में एकरस , रमा हुआ भगवान।
अविनाशी उसको कहें, अर्जुन से भगवान।।
अर्जुन से भगवान , मिलती मुक्ति उसको।
निर्गुण है परमात्मा,ना छूता विकार उसको।।
नहीं बांटता भगवान, छूत और अछूतों में।
विराजमान है भीतर, जग के सारे भूतों में।।

          212

जिससे सब उत्पन्न हों, और धारते प्राण।
उसी में सबकी लय मिले, जग का हो कल्याण।।
जग का हो कल्याण, उसी को जान बावरे।
त्याग दे गहरी नींद, समय से जाग बावरे।।
तू बतला अपनी पीड़ा, और कहेगा किससे ?
सिवाय उसके, ये हीरा जन्म मिला है जिससे।।

       213

चलते समय संसार से, जो भजते जगदीश।
पा लेते जगदीश को, उनके उन्नत शीश।।
उनके उन्नत शीश , जगत उन्हें शीश नवाता।
महापुरुष के रूप में, अपने आदर्श बताता।।
कभी नहीं आगे बढ़ पाते, जो रोटी पर पलते।
आगे वही बढ़ा करते, जो नेक राह पर चलते।।

दिनांक : 24 जुलाई 2023

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