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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से विश्वगुरू के रूप में भारत

विश्वगुरू के रूप में भारत-24

अपनी बात को मनवाने के लिए महर्षि दयानंद ने अंग्रेज सरकार को सितंबर 1874 में एक ज्ञापन दिया था। जिसमें उन्होंने आर्ष संस्कृत शिक्षा को भारत में पुन: लागू कराने का आग्रह सरकार से किया था। ज्ञापन में लिखा था-”इससे मेरा विज्ञापन है-आर्यावर्त देश का राजा अंग्रेज बहादुर से कि संस्कृत विद्या की ऋषि-मुनियों की […]

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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से विश्वगुरू के रूप में भारत

विश्वगुरू के रूप में भारत-23

ऐसे लोग मनुष्य मात्र के शिक्षक व प्रेरक होते हैं, और आलस्य आदि शत्रुओं से रहित होकर धारणा, ध्यान, समाधि का अनुष्ठान करने वाले, परम उत्साही, योग्य, सर्वस्व त्यागी निष्काम विद्वान महान मोक्ष को प्राप्त करते हैं। ऐसे लोग ईश्वर और मृत्यु को सदा साक्षी रखते हैं और प्रत्येक प्रकार के पापकर्म से अपने आपको […]

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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से विश्वगुरू के रूप में भारत

विश्वगुरू के रूप में भारत-22

चमड़े को मृत पशुओं के शरीरों से उतारकर उसका जूते-जूतियां या अन्य वस्तुओं के बनाने में प्रयोग करने की कला भी विश्व में भारतीयों ने ही प्रचलित की। इसी प्रकार गौ-भैंस को दूहने की कला और उनके दूध से विभिन्न प्रकार के पेय या भोज्य-पदार्थ बनाना, दही, घी बनाना या निकालना आदि भी एक कला […]

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विश्वगुरू के रूप में भारत-21

मि. विन्सेंट ए. स्मिथ अपनी पुस्तक ”भारत एवं श्रीलंका की उत्तम कला का इतिहास” के पृष्ठ 22 पर सम्राट अशोक द्वारा स्थापित ‘अखण्ड स्तंभ’ के बारे में हमें बताते हैं-”इतने विशाल आकार के अखण्ड स्तंभ का ढालना, सजाना, खड़ा करना, इस बात का प्रमाण है कि अशोक के काल में इंजीनियर एवं पत्थर काटने वाले […]

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विश्वगुरू के रूप में भारत-20

भारत की 64 कलाएं प्रमुख मानी गयी हैं। इनके नाम हैं नृत्य कला, वाद्यों का निर्माण करने की कला, स्त्री पुरूष के परिधान एवं अलंकार पहनाने की कला, अनेक प्रकार के रूप धारण (बहुरूपिया होना) करने की कला, शय्या अर्थात बिस्तर (उपस्तरण से बना है बिस्तर) बिछाना और पुष्पों को सही ढंग से गूंथने की […]

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विश्वगुरू के रूप में भारत-19

भारत की स्थापत्य कला में देखने वाली बात ये होती है कि हजारों वर्ष पूर्व निर्मित किये गये भव्य-भवन, राजप्रासाद, दुर्गादि के निर्माण में लोहे का प्रयोग नहीं किया गया है और ना ही सीमेंट प्रयोग हुआ है। परंतु उसके उपरांत भी ये भव्य-भवन, राजप्रासाद, दुर्गादि बहुत से भूकंपों और प्राकृतिक आपदाओं को झेलकर भी […]

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विश्वगुरू के रूप में भारत-18

फल फूल से लदी हों औषध अमोघ सारी देशवासियों को पर्जन्य समय पर बरसकर अन्नादि की पूर्ति करते हैं, साथ ही समय पर वर्षा होने से अनेकों प्रकार के पेड़ पौधों को भी नवजीवन मिलता है। मानव समाज को कितने ही पेड़ों से फल मिलते हैं तो कितनों से ही औषधियां मिलती हैं। कितनी ही […]

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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से विश्वगुरू के रूप में भारत

विश्वगुरू के रूप में भारत-16

क्षत्रिय महारथी हों अरिदल विनाशकारी ब्राह्मण लोग राष्ट्र में अज्ञानांधकार से लड़ते हैं, तो क्षत्रिय लोग अत्याचार रूपी राक्षस का नाश करते हैं। ब्राह्मण राष्ट्र के ब्रह्मबल का प्रतीक हैं तो क्षत्रिय वर्ग समाज के क्षात्रबल का प्रतीक है। ब्रह्मबल की रक्षा भी क्षत्रबल से ही की जानी संभव है। यदि कोई राष्ट्र ब्रह्मबल से […]

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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से विश्वगुरू के रूप में भारत

विश्व गुरु के रुप में भारत -15

भारत का राष्ट्रवाद और विश्व भारत का राष्ट्रवाद आज के अंतर्राष्ट्रवाद से ऊंची सोच वाला रहा है। आज के विश्व मंचों पर भी राजनीतिज्ञ अपने-अपने देशों के हितों के लिए लड़ते-झगड़ते हैं, और ‘संयुक्त राष्ट्र’ जैसी विश्व संस्था का भी या तो उपहास उड़ा रहे हैं या फिर उसे असहाय बनाने में अपनी नकारात्मक भूमिका […]

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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से विश्वगुरू के रूप में भारत

विश्वगुरू के रूप में भारत-14

वराहमिहिर वराहमिहिर भारत की एक अनमोल प्रतिभा हैं, जिनकी प्रतिभा पर संपूर्ण भारतवर्ष को गर्व है। उनकी प्रतिभा ने संपूर्ण भूमंडल को लाभान्वित किया है। वराहमिहिर का जन्म मध्यप्रदेश में स्थित उज्जैन के निकट कापित्थ नामक ग्राम में आदित्यदास नामक ब्राह्मण के घर में हुआ माना जाता है। कुछ लोगों का मत है कि उनका […]

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