बिखरे मोती-भाग 225 ‘ज्ञानचक्षु वेद की महिमा’ वेदों को विस्मृत करें, जिसका मुझको खेद। मनुष्यत्त्व से देवत्त्व को, प्राप्त कराये वेद ।। 1162 ।। व्याख्या :-भूतल पर जितने भी राष्ट्र हैं उन सब में प्राचीनतम तथा उच्चतम सभ्यता संस्कृति यदि किसी राष्ट्र की है तो वह भारतवर्ष की है, जिसका कोई सानी नहीं। मानव जीवन […]
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बिखरे मोती-भाग 224 गतांक से आगे…. सत्संग की महिमा सूर्य उगे तो दीप सब होते कान्तिहीन। सत्संग जिनको हो गया, हो गये व्यसन विहीन।। 1161।। व्याख्या:-उपरोक्त दोहे की व्याख्या करने से पूर्व सत्संग का अर्थ समझना प्रासंगिक रहेगा। सत्य के संग को सत्संग कहते हैं। सत्य का संग तभी होता है, जब आप अपना आत्मावलोकन […]
सोमपान जो जन करे, होवै ना अक्षिपात
बिखरे मोती-भाग 223 गतांक से आगे…. 15. यक्ष-जिसके मित्र अधिक होते हैं, इससे क्या लाभ है? युधिष्ठिर-महाराज! जिसके मित्र अधिक होते हैं, उसके कभी काम नहीं अटकते हैं। 16. यक्ष-धर्म का पालन करने वाले को क्या मिलता है? युधिष्ठिर-महाराज! धर्मनिष्ठ व्यक्ति को सद्गति प्राप्त होती है। इतना ही नहीं, ऐसा व्यक्ति आत्मा को जान लेता […]
दिशाएं होते सत्पुरूष, देते सत्सन्देश
बिखरे मोती-भाग 222 गतांक से आगे…. दिशाएं होते सत्पुरूष, देते सत्सन्देश। परहित जिनका धर्म है, रहते खुशी हमेश ।। 1159 ।। व्याख्या:-विश्वमंगल करने के लिए विधाता धरती पर ऐसी दिव्यात्माओं का आविर्भाव किया करता है, जो सत्पुरूष कहलाती हैं। ऐसी दिव्यात्माओं का स्वभाव ऋजुता (कुटिलता रहित होना) से ओत-प्रोत रहता है। सरलता, शीलता, प्रेम और […]
बिखरे मोती-भाग 221 गतांक से आगे…. काश! ऐसा हो कि हम अपने आत्मस्वरूप को पहचानें और प्रभु प्रदत्त चित्त रूपी मानसरोवर जो प्रेम, प्रसन्नता शान्ति, क्षान्ति, क्षमा, धैर्य, सौहाद्र्र, संतोष, उदारता, वात्सल्य, स्नेह, श्रद्घा, समर्पण इत्यादि सद्भावों का जलाशय है। यदि मानव इस जलाशय में नित्य प्रति अवगाहन करेगा, इस जलाशय में गोता लगाएगा अर्थात […]
मानसरोवर चित्त है, जिसमें जल सद्भाव
बिखरे मोती-भाग 220 गतांक से आगे…. स्मरण रहे, पवित्र चित्त में ही परमात्मा का निवास होता है, दूषित चित्त में नहीं। चित्त की पवित्रता पर सभी धर्मों के धर्मशास्त्रों और धर्माचार्यों ने इसीलिए विशेष बल दिया है। मोक्ष में भी बुद्घि-चित्त, तन्मात्रा जीव के साथ। ये मन्दिर हरि-मिलन का, मोक्ष इसी के हाथ ।। 1155 […]
बिखरे मोती-भाग 219 गतांक से आगे…. आत्मा और चित्त के संयोग से चेतना और सूक्ष्मप्राण की उत्पत्ति होती है। जिनसे जीवन की क्रियाशीलता प्रतिक्षण बनी रहती है। इसीलिए हमारा चित्त शक्ति का मुख्य केन्द्र है। जैसे भौतिक जड़ मशीन में मुख्य भाग गरारी को बिजली का मोटर गतिमान बना देता है और उसके साथ ‘पटों’ […]
बिखरे मोती-भाग 218 गतांक से आगे…. बुद्घि का निवास स्थान-बुद्घि तत्व का निवास स्थान ‘ब्रह्मरन्ध्र’ में है। चित्त के कार्य-सर्ग से प्रारंभ काल से जीवात्मा के साथ संयुक्त होकर और उसे अपने गर्भ में रखकर तथा अहंकार को धारण करके मोक्ष पर्यन्त आत्मा के कार्यों को सम्पादित करते हुए मोक्ष द्वार पर लाकर खड़ा कर […]
बिखरे मोती-भाग 217 गतांक से आगे…. इससे स्पष्ट हो गया है कि इन सबका आधार ‘मन’ है। अत: वाणी और व्यवहार को सुधारना है तो पहले मन को सुधारिये। इसीलिए यजुर्वेद का ऋषि कहता है-‘तन्मे मन: शिव संकल्पमस्तु’ अर्थात हे प्रभु! मेरा मन आपकी कृपा से सदैव शुभ संकल्प वाला हो, अर्थात अपने तथा दूसरे […]
वाणी और व्यवहार का, मन होता आधार
बिखरे मोती-भाग 216 गतांक से आगे…. गतिशील रहता है सातवें प्रश्न का उत्तर इसे सत्व गुण की प्रधानता से काबू किया जा सकता है। प्रश्न का उत्तर-मन के सहयोग के बिना कोई भी ज्ञानेन्द्रीय अथवा कर्मेेन्दीय अपना कार्य करने में समर्थ नहीं होती है। शरीर का सभी ज्ञान-व्यापार अथवा कर्म -व्यापार मन के सहयोग से […]