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बिखरे मोती

चित्त में रहती आत्मा, जहां सूक्ष्म प्राण

बिखरे मोती-भाग 218

गतांक से आगे….
बुद्घि का निवास स्थान-बुद्घि तत्व का निवास स्थान ‘ब्रह्मरन्ध्र’ में है। चित्त के कार्य-सर्ग से प्रारंभ काल से जीवात्मा के साथ संयुक्त होकर और उसे अपने गर्भ में रखकर तथा अहंकार को धारण करके मोक्ष पर्यन्त आत्मा के कार्यों को सम्पादित करते हुए मोक्ष द्वार पर लाकर खड़ा कर देना। चित्त जड़ है, किन्तु आत्मा के संयोग से चेतना को धारण करके प्राप्त क्रियाशीलता से प्रतिक्षण ‘सूक्ष्मप्राण’ रूपी ‘जीवन’ को उत्पन्न करते रहना एवं अहंकार द्वारा ‘कारण शरीर’ सूक्ष्म शरीर तथा स्थूल शरीर में जीवन का संचार और प्रसार करते रहना। भोग साधक सब संस्कारों अथवा वासनाओं सहित स्मृति , निद्रा, ज्ञान-अज्ञान, विद्या-अविद्या, धर्म-अधर्म, तथा रज, तम, सत्व गुणों के वशवर्ती होकर तद्भाव भावित दर्शाना तथा जीवात्मा को मोक्ष के द्वार तक पहुंचाना यह चित्त के हाथ में है।
स्मरण रहे, यह चित्त प्रतिक्षण सूक्ष्म प्राण की उत्पत्ति के द्वारा अहंकार को क्रियाशील रखकर पांचों कोसों को क्रियाशील बनाये रखता है। चित्त जाग्रत अवस्था में ही नहीं अपितु निद्रा, सुषुप्ति तुरीया अवस्था में भी अपने कार्य में रत रहता है। इसीलिए अभ्यासी निद्रा, सुषुप्ति, समाधि के पश्चात उन अनुभवों का वर्णन करता है।
बुद्घि के कार्य:-पंच ज्ञानेन्द्रियों और पंच कर्मेन्द्रियों के कर्मों को मन के द्वारा प्राप्त करके उन्हें तर्क की तुला पर तोलकर अपनी विवेचना शक्ति की छलनी से छानकर एक स्थिर और स्पष्ट निर्णय देना और धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य, सत्य-असत्य, भले बुरे, ज्ञान-अज्ञान, में से सही और गलत का निर्णय देना तथा अपने स्वामी जीवात्मा के सांसारिक अभ्युदय और पारमार्थिक कल्याण के लिए सही फैसला करना।
वस्तुत: जीवात्मा के लिए यह बुद्घि तत्व एक ज्योतिस्तम्भ है, पथप्रदर्शक है, महामंत्री है, सन्मार्ग पर ले जाने वाला सारथि है। वह सुहृदय परमस्नेही है, महान हितकारी तत्व है। बुद्घि के बिना यह ज्ञानस्वरूप पुरूष (आत्मा) अंधा सा है। बुद्घि का परिष्कृत रूप ऋतम्भरा अविद्या-अस्मिता, जन्म-मरण के बन्धन से मुमुक्षु को छुड़ा कर मोक्ष द्वार तक पहुंचा देता है, अन्यथा भ्रमित अथवा र्दुबुद्घि अनंतकाल तक दु:खद संसार चक्र में घुमाती रहती है।
उपरोक्त विशद विश्लेषण के बाद यह कहना उपयुक्त होगा कि हमारे अंत:करण के दो अंग-चित्त और बुद्घि-ज्ञान प्रधान हैं और अहं तथा कर्म प्रधान भी हैं। ध्यान रहे चित्त और बुद्घि दोनों का गंतव्य भी मोक्ष द्वार है। जो व्यक्ति अपने चित्त और बुद्घि के मल विक्षेप अथवा विकारों को परिष्कृत कर लेते हैं, उन्हें एक दिन प्रभु की शरणागति अवश्य मिलती है क्योंकि ऐसे भक्त से प्रभु कभी दूर नहीं होते हैं। प्रभु का कृपा कवच ऐसे भक्तों की सर्वदा रक्षा करता है।
चित्त में रहती आत्मा,
जहां सूक्ष्म प्राण।
शक्ति का ये केन्द्र है
चित्त करे निर्वाण ।। 1152 ।।
व्याख्या:-चित्त का सम्बन्ध मुख्य रूप से जीवात्मा के साथ है तथा गौण रूप से अहंकार, सूक्ष्मप्राण, बुद्घि, मन और सब इन्द्रियों के साथ भी है। जीवात्मा तथा चित्त दोनों ही एकदेशी हैं, और इनका आधार आधेय सम्बन्ध है जो सृष्टि के उत्पत्तिकाल से चला आ रहा है। जीवात्मा को अपने गर्भ में धारण करके यह चित्त हृदयगुहा में ठहरा हुआ है। जीवात्मा अपने सभी कार्य प्रतिक्षण अहंवृत्ति के चित्त से कराता है। आत्मा की किरणें सबसे पहले चित्त पर पड़ती हैं। क्रमश:

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