रजोगुण और तमोगुण की तरह सत्त्वगुण में मलिनता नहीं है इसलिए भगवान कृष्ण ने गीता के चौदहवें अध्याय के छठे श्लोक में सत्त्वगुण को ‘अनामयम्’ कहा है अर्थात निर्विकार कहा है। निर्मल और निर्विकार होने के कारण यह परमात्मा तत्त्व का ज्ञान कराने में सहायक है। सत्त्वगुण की प्रधानतमा से ‘मन’ को सहजता से काबू […]
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बिखरे मोती-भाग 234
बालक नरेन्द्र में कुशाग्र बुद्घि हृदय में उदारता, ऋजुता समाज और राष्टï्र के लिए कुूछ कर गुजरने का जज्बा, वाकपटुता, वाकसंयम, प्रत्युत्तर मति और बहुमुखी प्रतिभा अप्रतिम थी, जिसे उनके गुरूरामकृष्ण परमहंस ने और भी धारदार बना दिया। प्रभावशाली बना दिया। बड़ा होकर यही बालक स्वामी विवेकानंद के नाम से विश्व विख्यात हुआ तथा ज्ञान […]
बिखरे मोती-भाग 233
गुरू तो बादल की तरह है, शहद की मक्खी की तरह है। जैसे-शहद की मक्खी न जाने कितने प्रकार के असंख्य पुष्पों के गर्भ से शहद के महीन कणों को अपनी सूंडी से चूसकर शहद के छत्ते में डाल देती है, उसे शहद से सराबोर कर देती है, ऐसे बादल भी न जाने कितने पोखरों, तालाबों, […]
बिखरे मोती-भाग 232
गतांक से आगे…. गुरू व्यक्ति नहीं, एक दिव्य शक्ति है :- नर-नारायण है गुरू, देानों ही उसके रूप। संसारी क्रिया करै, किन्तु दिव्य स्वरूप ।। 1168 ।। व्याख्या :-”गुरू व्यक्ति नहीं, एक दिव्य शक्ति है।” वे बेशक इंसानी चोले में खाता-पीता उठता बैठता, सोता-जागता, रोता-हंसता तथा अन्य सांसारिक क्रियाएं करता हुआ दिखाई देता है, किंतु […]
बिखरे मोती-भाग 231
जिस प्रकार मुकुट में ‘हीरा’ लगने से मुकुट का मूल्य और महत्व अधिक हो जाता है, ठीक इसी प्रकार व्यक्ति के पास यदि ‘शील’ है अर्थात उत्तम स्वभाव है तो उसके धन दौलत, पद-प्रतिष्ठा, योग्यता (विद्या अथवा ज्ञान) और कर्मशीलता का महत्व अनमोल हो जाता है, लोकप्रियता और ऐश्वर्य का सितारा चढ़ जाता है अन्यथा […]
बिखरे मोती-भाग 230
अब तस्वीर का दूसरा पहलू देखिये-झरना भी पृथ्वी से निकलता है और ज्वालामुखी भी पृथ्वी से निकलता है, किंतु दोनों के स्वरूप और स्वभाव में जमीन आसमान का अंतर है। झरना पृथ्वी पर हरियाली लाता है, खुशहाली लाता है, सौंदर्य बढ़ाता है, विकास की नई राहें खोलता है, जबकि ज्वालामुखी लाल-लाल गर्म लावा उगलता है, […]
बिखरे मोती-भाग 229
हमेशा याद रखो, मन से भी अधिक सूक्ष्म, भाव अथवा संस्कार होते हैं, हमारे मानस-पटल पर ऐसे रहते हैं, जैसे जल के ऊपर तरंगे रहती हैं। इसीलिए हमारे ऋषियों ने कर्म की प्रधानता के साथ-साथ ‘भाव की पवित्रता’ पर विशेष बल दिया है। ये भाव ही हमारे स्वभाव का निर्माण करते हैं, जिनका प्रभाव जन्म-जन्मान्तरों […]
बिखरे मोती-भाग 228
सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दु:ख भाग भवेत्।। अर्थात हे प्रभो! सब सुखी हों, सब स्वस्थ और निरोग हों, सबका कल्याण हो, कोई भी प्राणी दु:खी न हो, ऐसी कृपा कीजिए। हे ईश! सब सुखी हों, कोई न हो दुखारी। सब हों निरोग भगवन्, धन धान्य के भण्डारी।। सब […]
बिखरे मोती-भाग 227
इसके अतिरिक्त मैं कहां से आया हूं। मैं क्यों आया हूं? मुझे कहां जाना है? मैं क्या कर रहा हूं? मुझे क्या करना चाहिए? ‘मैं’ और ‘वह’ अर्थात आत्मा और परमात्मा का संबंध क्या है? इसे कैसे प्रगाढ़ किया जा सकता है? यह सृष्टिक्रम क्या है? हम अपने स्वामी कैसे बने? परमात्मा को कैसे प्राप्त […]
बिखरे मोती-भाग 226
गतांक से आगे…. क्या कभी इस विषय पर गम्भीर चिन्तन किया है? यह नैतिक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पतन नहीं तो और क्या है? लज्जा-जिसे लोक लिहाज कहते हैं, उसका दिवाला नहीं तो और क्या है? यह हमारे पूर्वज ऋषि-मुनियों के दिये हुए प्रेरणास्पद प्रवचनों का अपमान नहीं तो और क्या है? यह वेदों की घोर […]