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संपादकीय

निजी अनुभवों की सांझ-9

उनका दृष्टिकोण हुआ करता था कि पैसा यदि लिया भी जाए तो सही काम का लिया जाए, फिर ऐसी स्थिति आयी कि जो भी दे जाए उसी का काम कर दो। इसका अभिप्राय था कि दो पक्षों में एक गलत पक्ष का व्यक्ति यदि दे जाए तो उसी का काम कर दो। किंतु आज स्थिति […]

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संपादकीय

निजी अनुभवों की सांझ-7

उसे हर प्रकार के शोषण से लडऩे और उसे उजागर करने के लिए प्रेरित किया जाता, राष्ट्र के नितांत ईमानदार और राष्ट्रसेवी आचार्य उसके भीतर की छिपी हुई मानवीय शक्तियों और प्रतिभाओं को सही दिशा और दशा प्रदान करते तो यह राष्ट्र अब तक स्वर्ग सम बन गया होता। इसमें दो मत नही हो सकते। […]

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संपादकीय

निजी अनुभवों की सांझ-2

‘कमीशन’ का घुन खा रहा है, राष्ट्र को किंतु हम सब इस व्यवस्था के प्रति अभ्यस्त होने का प्रदर्शन करते हैं, न कि आंदोलित होते हैं, ऐसा क्यों? क्योंकि हमारे नेतागण ‘कमीशन’ का विष हमारी नसों में चढ़ाने में सफल रहे हैं। देखिये- जब कोई राष्ट्र अपने आदर्शों को भुलाकर उधारे आदर्शों का आश्रय लिया […]

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