हंस भाव में जीता है जो, नर देह वही कहलाता है। ब्रह्मचर्य की यह अवस्था, जीवन सफल बन जाता है।। वसु – भाव में जीने वाला, वर देह का बनता अधिकारी। गृहस्थ आश्रम में रह मानव, तैयार करे जीवन क्यारी।। वानप्रस्थ का जीवन जिसका, उसने परहित में श्रृंगार किया। ‘ होता’ की कर प्राप्त अवस्था, […]
यह चार अवस्था मानव की…