गीता का दिव्य धर्म कर्तव्य कर्म की भव्यता – देती सदा आनन्द । ‘दिव्य धर्म’ इससे बड़ा देता परमानन्द।। कर्तव्य कर्म को जानकर जो जन करते काम। जग उनका वन्दन करे , जन करते गुणगान ।। ‘दिव्य धर्म’ हमसे कहे – जानो प्रभु की तान। संग उसी के तान दो निज कर्मों की तान।। जन्म […]
गीत – 3 ( दोहे) गीता का दिव्य धर्म