Categories
पुस्तक समीक्षा

ईशादि नौ उपनिषद (काव्यानुवाद) : प्रश्नोपनिषद के बारे में

प्रश्नोपनिषद कुछ प्रश्नों को लेकर बनाया गया उपनिषद है।
डॉक्टर मृदुला कीर्ति इसके शांति पाठ की व्याख्या करते हुए लिखती हैं:-

हे देवगण! कल्याणमय हम वचन कानों से सुनें,
कल्याण ही नेत्रों से देखें सुदृढ़ अंग बली बनें।
आराधना स्तुति प्रभु की हम सदा करते रहें ,
मम आयु देवों के काम आए हम नमन करते रहें।
हे इंद्र मम कल्याण को कल्याण का पोषण करें,
हे विश्व वेदा: पूषा श्री मय ज्ञान संवर्धन करें।
हे बृहस्पति ! अरिष्ट नेमि स्वस्तिकारक आप हैं,
सब त्रिविध ताप हों शांत जग के करते जो संताप हैं।

सुकेशा, सत्यकाम, सौर्यायणि गार्ग्य, कौसल्य, भार्गव और कबंधी, इन छह ब्रह्मजिज्ञासुओं ने आचार्य के आदेश पर वर्ष पर्यंत ब्रह्मचर्यपूर्वक तपस्या करके उनसे पृथक्-पृथक् एक एक प्रश्न किया। इन प्रश्नों में से पहले तीन  प्रश्न अपरा विद्या विषयक तथा शेष परा विद्या संबंधी हैं। जिन्हें जानवर समझ कर पाठक की हृदय की प्यास बुझती है।
पहला प्रश्न ऋषि कत्य के प्रपौत्र कबन्धी का है । उसके प्रश्न के विषय में डॉ मृदुल कीर्ति अपनी बहुत ही सारगर्भित व्याख्या में लिखती हैं –

ऋषि कत्य के प्रपौत्र कबंधी ने पूछा ऋषि पिप्पलाद से,
श्रद्धेय मुनिवर महिमा श्रेष्ठ हे ! सृष्टि किसके प्रसाद से ।
नियमित चराचर जीव कैसे,  कौन, कैसा विधान है ,
है कौन इसका तत्व कारण प्रश्न मेरा प्रधान है।।

प्रथम प्रश्न का उत्तर देते हुए प्रजापति के रयि और प्राण की ओर उनसे सृष्टि की उत्पत्ति बतलाकर जो कुछ स्पष्ट किया उसको संक्षेप में डॉ मृदुल कीर्ति लिखती हैं —

नित्य सृजन कर्त्ता प्रजाओं का प्रजापति श्रेष्ठ है ,
एक रयि एक प्राण मिलकर सृजित सृष्टि यथेष्ट है।
जग के पदार्थ हैं सब रयि ज्ञातव्य हो दृष्टव्य हैं ,
प्राण रयि के योग से निर्मित हैं अतिशय भव्य है।

आचार्य ने द्वितीय प्रश्न में प्राण के स्वरूप का निरूपण किया है इसके माध्यम से आचार्य ने स्पष्ट किया है कि वह स्थूल देह का प्रकाशक धारयिता एवं सब इंद्रियों से श्रेष्ठ है।
  इस विषय को काव्यमय शैली में स्पष्ट करते हुए डॉक्टर कीर्ति स्पष्ट बताती हैं :–

उनसे कहा अति महिम प्राण ने, त्याग दो स्व अहम को,
मैं प्राण हूं अति श्रेष्ठ तुम क्यों भूलते मुझ प्रथम को ।
मैंने स्वयं को ही विभाजित पांच भागों में किया,
तुमने तो बस धारक प्रकाशक बनके प्राणों को जिया।

तीसरे प्रश्न में प्राण की उत्पत्ति तथा स्थिति का निरूपण करके पिप्पलाद ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही है कि मरणकाल में मनुष्य का जैसा संकल्प होता है, उसके अनुसार प्राण ही उसे विभिन्न लोकों में ले जाता है।

इस पर विदुषी डॉक्टर कीर्ति की लेखनी कुछ इस प्रकार चलती है:- 
परब्रह्म प्राणों का रचयिता महिम महि महिमा महे,
सम काया छाया प्राण ब्रह्म के आश्रय में ही रहे।
यह प्राण मन संकल्प से काया में करते प्रवेश हैं,
प्राणों के काया प्रवेश में यही भाव तत्व विशेष है।

चौथे प्रश्न में पिप्पलाद ने यह निर्देश किया है कि स्वप्नावस्था में श्रोत्रादि इंद्रियों के मन में लय हो जाने पर प्राण जाग्रत रहता है तथा सुषुप्ति अवस्था में मन का आत्मा में लय हो जाता है। वही द्रष्टा, श्रोता, मंता, विज्ञाता इत्यादि है जो अक्षर ब्रह्म का सोपाधिक स्वरूप है। इसका ज्ञान होने पर मनुष्य स्वयं सर्वज्ञ, सर्वस्वरूप, परम अक्षर हो जाता है।
  डॉ. कीर्ति की काव्यमय व्याख्या का भी रसास्वादन लीजिए ;–

यह श्वास प्रश्वास दोनों ही आहुति हैं यज्ञ की,
इस मन से ही यजमान करता वंदना अज्ञ की।
है वायु ऋत्विक, इष्टफल दाता यही तो उदान है,
यही ब्रह्मलोके सुषुप्ति में ले जाते मन को प्राण हैं।

पाँचवे प्रश्न में ओंकार में ब्रह्म की एकनिष्ठ उपासना के रहस्य में बतलाया गया है कि उसकी प्रत्येक मात्रा की उपासना सद्गति प्रदायिनी है । इस रहस्य को समझने से प्रत्येक श्रद्धालु ईश्वर के प्रति निष्ठावान और श्रद्धा वन होकर मुझसे अपना गहरा संबंध स्थापित करने में सफल हो सकता है। ऋषि ने स्पष्ट किया है कि सपूर्ण ॐ का एकनिष्ठ उपासक कैचुल निर्मुक्त सर्प की तरह पापों से नियुक्त होकर अंत में परात्पर पुरुष का साक्षात्कार करता है।

डॉक्टर कीर्ति ने इस पर बड़ा सार्थक विचार व्यक्त करते हुए लिखा है :–

जो तीन मात्रा युक्त ओम के भू, भुवः  स्व: रूप के,
चिंतक वे पाते एक अक्षर से ही सुख रवि भूप के।
ज्यों सर्प केंचुल से पृथक त्यों पाप कर्मों से मुक्त हो,
वह साम मंत्रों से लोक रवि, व  ब्रह्मलोक से युक्त हो।

अंतिम छठे प्रश्न में आचार्य पिप्पलाद से भारद्वाज पुत्र सुकेशा ने प्रश्न किया है।  उसके उत्तर में ऋषि ने बताया है कि इसी शरीर के हृदय पुंडरीकांश में सोलहकलात्मक पुरुष का वास है। ब्रह्म की इच्छा, एवं उसी से प्राण, उससे श्रद्धा, आकाश, वाय, तेज, जल, पृथिवी, इंद्रियाँ, मन और अन्न, अन्न से वीर्य, तप, मंत्र, कर्म, लोक और नाम उत्पन्न हुए हैं जा उसकी सोलह कलाएँ और सोपाधिक स्वरूप हैं। सच्चा ब्रहृम निर्विशेष, अद्वय और विशुद्ध है। नदियाँ समुद्र में मिलकर जैसे अपने नाम रूप का उसी में लय कर देती हैं पुरुष भी ब्रह्म के सच्चे स्वरूप को पहचानकर नामरूपात्मक इन कलाओं से मुक्त होकर निष्कल तथा अमर हो जाता है। इस निरूपण की व्याख्या में शंकराचार्य ने अपने भाष्य में विनाशवाद, शून्यवाद, न्याय सांख्य एवं लौकायितकों का यथास्थान विशद खंडन किया है।
इसको स्पष्ट करते हुए डॉक्टर कीर्ति लिखती हैं :-

नदियां जलधि की ओर बहकर लीन सागर में तथा,
वे नामरूप विहीन होकर जलधि मय होती है यथा ।
त्यों धर्म की सोलह कलाओं की परम गति पुरुष है,
वह नामरूप विहीन हो अब मात्र केवल पुरुष है।

उपनिषदों की गूढ़ और रहस्यमयी भाषा को समझना हर किसी के बस की बात नहीं है। लेखक, कवि या किसी साहित्यकार की जितनी गूढ़ और  ज्ञानात्मक बातें होती हैं उन्हें हर किसी के द्वारा  समझना सम्भव नहीं होता। जितनी ऊंची साधना वाले से कोई मिल रहा होता है उस मिलने वाले की भी साधना यदि उतनी ही ऊंची हो तो बातों में आनंद आने लगता है। कहने का अभिप्राय है कि डॉक्टर कीर्ति स्वयं एक साधिका हैं।  यही कारण है कि उनके ज्ञान की उत्कृष्टावस्था में जो भीतर से अर्थात अंतर्मन से व्याख्या प्रस्फुटित हुई है , उसी को उन्होंने लिखा है, जो बहुत ही सुंदर और उत्कृष्ट बन गई है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark
betpark giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
holiganbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
Grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
holiganbet güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
grandpashabet giriş
bettilt giriş
holiganbet güncel
holiganbet giriş
grandpashabet giriş
bettilt giriş
grandpashabet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
klasbahis giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet
klasbahis giriş
klasbahis
bettilt giriş