ओ३म् “ऋषि दयानन्द ने मत-मतान्तरों की परीक्षा कर वेदानुकूल  सत्य के ग्रहण का सिद्धान्त दिया”

images (54)

 

मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

  ऋषि दयानन्द ने अपने ज्ञान ऊहा से वेदों को सृष्टि के आरम्भ में चार ऋषियों को सर्वव्यापक परमात्मा से प्राप्त सत्य ज्ञान के ग्रन्थ स्वीकार किया था। इस सिद्धान्त मान्यता की उन्होंने डिण्डिम घोषणा की है। इसके पक्ष में उन्होंने उदाहरणों सहित अनेक तर्क युक्त बातें विस्तार से अपने विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘‘सत्यार्थप्रकाश” में प्रस्तुत की हैं। उन्होंने इससे जुड़ी अनेक शंकाओं को प्रस्तुतकर स्वयं उनका समाधान भी किया है। ऋषि ने बताया है कि ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप एवं न्यायकारी सत्ता है। सच्चिदानन्दस्वरूप होने से ही वह सत्यस्वरूप एवं असत्य विचारों व्यवहारों से सर्वथा रहित दूर है। ईश्वर सत्याचरण करता है तथा अपने बनाये मनुष्यों को भी सत्य का आचरण करने की प्रेरणा करता है। जो सत्य का आचरण करते हैं वह जीवन में सुख समृद्धि को प्राप्त होते हैं और जो सत्य के स्थान पर असत्य का आचरण करते हैं, उसका दण्ड ईश्वर उन्हें जन्मजन्मान्तरों में देता है। हमारे ऋषियों ने सत्यासत्य की विवेचना कर सिद्ध किया है कि सत्य ही ग्राह्य एवं करणीय है तथा असत्य अग्राह्य एवं त्यागकरने योग्य है। ऐसा करने से ही मनुष्य की आत्मा सन्तुष्ट होती है तथा उसकी उन्नति होती है। 

 

वेदों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि मनुष्य को ईश्वर में निहित सभी सत्य गुणों के अनुसार अपने जीवन व्यवहार को बनाने का प्रयत्न करना चाहिये। इस विषय में वेदाध्ययन करते हुए इन बातों पर प्रकाश पड़ता है। ऋषि दयानन्द ने अपने सभी ग्रन्थों में इस विषय पर चिन्तन मार्गदर्शन किया है। वेदों में मनुष्यों के सभी करणीय कर्तव्यों का विधान है तथा निषिद्ध कर्मों पर भी प्रकाश डाला गया है। मनुष्यों को अपनी आत्मा के ज्ञान प्रेरणा के विपरीत कोई कार्य नहीं करना चाहिये। धर्म सत्य के आचरण तथा असत्य का त्याग करने को कहते हैं। धर्म एवं सत्य समानार्थक शब्द है। जो आचरण, व्यवहार विद्यायें सत्य नहीं है, उसका मनुष्यों को त्याग कर देना चाहिये। ऋषि दयानन्द ने अपने ग्रन्थ में मतमतान्तरों की अविद्या पर भी प्रकाश डाला है। अविद्या मानव जाति की व्यक्तिगत संस्थारूप में शत्रु है। इससे उसे हानि होती है, लाभ नहीं होता। इसीलिए ऋषि दयानन्द ने अविद्या के नाश एवं विद्या की वृद्धि करने का नियम बनाया है। आश्चर्य है कि मतमतान्तर हजारों वर्ष पुराने अपने धर्म ग्रन्थों की परीक्षा नहीं करते। वह बिना परीक्षा किये ही उसकी सत्यासत्य सभी बातों को सत्य स्वीकार कर लेते हैं। यह विज्ञान एवं यथार्थ वैदिक धर्म के सिद्धान्तों के विपरीत है। संसार में वैदिक धर्मी आर्यसमाज संगठन ही एक मात्र ऐसा आन्दोलन है जो धर्म विषयक प्रत्येक बात को सत्य की कसौटी पर कसता है और सत्य पायी जाने पर ही उसे स्वीकार करता उसका आचरण करने की आज्ञा देता है। सृष्टि के आरम्भ से वैदिक धर्मी ऋषिमुनि सत्य के ग्रहण असत्य के त्याग का ही प्रचार करते रहे हैं। वेद भी सर्वत्र सत्य के ग्रहण और असत्य के त्याग की ही प्रेरणा करते हैं। 

 

ऋषि दयानन्द के सन् 1863 में सामाजिक जीवन में प्रवेश करने से पूर्व विश्व में अनेक मतमतान्तर प्रचलित थे जिनकी मान्यतायें सत्यअसत्य मिश्रित थी। ईश्वर विषयक सत्य ज्ञान तत्कालीन प्रचलित मतमतान्तरों में वेदों के समान पूर्ण होकर अधूरा था। वेद, उपनिषद तथा दर्शनों में ईश्वर विषयक जो विशद सत्य ज्ञान प्राचीन काल से उपलब्ध है उसका बहुत कम भाग मतमतान्तरों में पाया जाता है। मतमतान्तरों के अनुयायी मनुष्यों की अनेक परम्परायें भी बुद्धि ज्ञानविज्ञान के अनुकूल नहीं है। अतः ऋषि दयानन्द ने सामाजिक जीवन में प्रविष्ट होने के साथ असत्य का खण्डन तथा सत्य का मण्डन करना आरम्भ किया था। इस कारण से मतमतान्तरों में प्रतिक्रिया स्वरूप उनका विरोध हुआ। ऋषि दयानन्द जो बातें कहा करते थे उनका प्रमाण मतमतान्तरों के लोगों आचार्यों के पास नहीं था। उनकी प्रत्येक बात के साथ केवल वेदों का प्रमाण होता था अपितु वह उसे तर्क युक्ति से भी सत्य सिद्ध करते थे। उनके सम्मुख जो विद्वान अपने पक्ष के समर्थन में चर्चा या शास्त्रार्थ करने आते थे, वह उनके तर्कों को सुनकर पराजित हो जाते थे। ऋषि दयानन्द का यह प्रभाव भी देखने को मिला कि बहुत से निष्पक्ष श्रोता उनके विचारों को सुनकर उनके मत को स्वीकार कर लेते थे। वह देश भर में घूम घूम कर प्रचार करते रहे जिससे सभी मतों के कुछ अनेक बुद्धिमान लोग वेद वैदिक धर्म की तर्क युक्ति से सत्य सिद्ध मान्यताओं को स्वीकार कर वैदिक धर्म में प्रविष्ट होने लगे थे। 

 

ऋषि दयानन्द के देश के अनेक भागों में धर्म प्रचार कार्यों के कारण ही अनेक मतों के अनुयायी उनके विरोधी थे। इसके परिणामस्वरूप ही उनका विष द्वारा प्राणान्त कर दिया गया। मृत्यु से पूर्व ऋषि दयानन्द ने वेदों की अधिकांश वा समस्त मान्यताओं का प्रकाश अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में कर दिया था। उन्होंने चार वेदों के भाष्य की भूमिका के रूप में एक ग्रन्थ ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का प्रणयन भी किया। यह ग्रन्थ वैदिक साहित्य के प्रमुख शीर्ष ग्रन्थों में से एक है। विदेशी विद्वान प्रो. मैक्समूलर ने इस ग्रन्थ को वैदिक साहित्य के प्रमुख ग्रन्थों में स्वीकार करते हुए कहा है कि वैदिक साहित्य का आरम्भ ऋग्वेद से होता है और समाप्ति ऋषि दयानन्दकृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका पर होती है। ऋषि दयानन्द ने अन्य अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थ और भी लिखे हैं। उन्होंने संस्कारविधि नाम से 16 संस्कारों के परिचय उनकी विधि पर भी इस ग्रन्थ को लिख कर एक महान् कार्य किया है। आर्याभिविनय भी ऋषि दयानन्द की ईश्वर की उपासना पर एक महत्वपूर्ण एवं लाभकारी ग्रन्थ है। ऐसा ग्रन्थ इसके अनुरूप ज्ञान मतमतान्तरों के किसी ग्रन्थ में उपलब्ध नहीं होता। ऋषि दयानन्द ने अपने ग्रन्थों में जो बातें लिखी हैं वह सब अखण्डनीय हैं। इसके अतिरिक्त ऋषि दयानन्द के पत्र और विज्ञापन तथा शास्त्रार्थों के संग्रह सहित अनेक विद्वानों द्वारा लिखे गये उनके जीवन चरित्र, उनके उपदेश तथा आर्य विद्वानों के वैदिक विषयों पर सत्य के जिज्ञासुओं को ईश्वर, जीवात्मा सृष्टि विषयक ज्ञान मिलता है जो कि अन्य किसी मतमतान्तर के ग्रन्थों से प्राप्त नहीं होता। इस कारण से महर्षि दयानन्द के जीवन उनके समग्र साहित्य का मानव जाति की उन्नति तथा संसार में शान्ति स्थापित करने की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। 

 

ऋषि दयानन्द ने सत्यासत्य की परीक्षा करने और सत्य के ग्रहण तथा असत्य के त्याग का आग्रह क्यों किया? इस पर विचार करने पर हमें ज्ञात होता है कि ऋषि को बाल्यकाल में 14 वर्ष की आयु में शिवरात्रि के दिन मूर्ति पूजा करते हुए शिवलिंग पर चूहों को अबाध क्रीड़ा करते देख उस मूर्ति की शक्ति एवं प्रचलित धार्मिक मान्यताओं पर संदेह हुआ था। उन्होंने अपने विद्वान पिता तथा अन्य सभी पुरोहित पण्डितों से मूर्ति की शक्ति पर प्रश्न किये थे जिसका उन्हें जीवन भर किसी से उत्तर नहीं मिला। इससे उन्हें लगा था कि मूर्ति एक साधारण जड़ गुणों वाले पाषण में कोई अन्तर नहीं है। ईश्वर की जो शक्तियां हैं, उनका कोई चिन्ह संकेत मूर्ति के किसी कार्य से नहीं होता। इसके बाद के जीवन में सत्य की खोज करते हुए उन्हें अनेक धार्मिक मान्यताओं में असत्य मिश्रित होने का विश्वास हुआ था। अतः देश विश्व के लोगों को असत्य अंधविश्वासों से बचाने के लिये उन्होंने मतमतान्तरों की सत्यासत्य मान्यताओं की परीक्षा पर बल दिया था। इसकी उन्होंने पूरी तैयारी की थी और मतमतान्तरों की परीक्षा कर नमूने के तौर उनमें विद्यमान असत्य अन्धविश्वासों को अपने ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश के अन्तिम चार समुल्लासों में समीक्षा सहित प्रस्तुत किया था। सत्यार्थप्रकाश को पढ़कर विवेकी एवं निष्पक्ष मनुष्यों को ऋषि दयानन्द के विचारों पर विश्वास हो जाता है। मतमतान्तरों पर ऋषि दयानन्द के आक्षेपों का आज तक कोई उत्तर नहीं मिला है। ऋषि दयानन्द एक स्थान पर यह भी कहते हैं कि सत्य का ग्रहण और उसी का आचरण करना ही मनुष्य मनुष्य जाति की उन्नति का कारण होता है। मनुष्य जाति की उन्नति के लिये ही उन्होंने वेदों का प्रचार कर वेदों में निहित सत्य को देशवासियों के सम्मुख प्रस्तुत किया था। उनके इन प्रयत्नों का प्रभाव सभी मतमतान्तरों पर पड़ा। प्रायः सभी मतों के आचार्यों ने अपने अपने मत की परीक्षा की और उनके बुद्धियुक्त उत्तर ढूंढने के प्रयत्न किये। यह ध्रुव सत्य है कि असत्य को सत्य सिद्ध नहीं किया जा सकता। इस कारण ऋषि दयानन्द आज भी विजित हैं एवं धर्म विषयक विश्व धर्म गुरु सिद्ध होते हैं। हम उनको सादर नमन करते हैं। ओ३म् शम्

मनमोहन कुमार आर्य

पताः 196 चुक्खूवाला-2

देहरादून-248001

फोनः09412985121

← Back

Thank you for your response. ✨

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betgaranti güncel giriş
Kolaybet Giriş
ngsbahis giriş
artemisbet güncel
bettilt giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
betnano güncel giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
bettilt giriş
Betgaranti
sahabet giriş
betgaranti
betgaranti giriş
onwin giriş
onwin giriş
kolaybet
betgaranti giriş
sahabet
sahabet
marsbahis giriş
onwin
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betkanyon
betkanyon
sahabet giriş
betkanyon giriş
betkanyon giriş
marsbahis giriş
marsbahis giriş
onwin
onwin
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betkanyon
Betgaranti Giriş
holiganbet
holiganbet
sahabet
Kolaybet Giriş
Kolaybet Giriş
Kolaybet giriş
sahabet
sahabet
onwin
onwin
sahabet
sahabet
onwin giriş
onwin giriş
betgaranti giriş
holiganbet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
perabet giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
onwin giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
onwin giriş
sahabet giriş