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आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

नवधा भक्ति का जिक्र धर्मग्रंथों में दो युगों में किया गया है। सतयुग में प्रह्लाद ने पिता हिरण्यकशिपु से कहा था।प्रह्लाद जी द्वारा कही गयी नवधा भक्ति श्रीमद्भागवत पुराण के सातवें स्कंध के पांचवे अध्याय में है। इसके बाद त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने मां शबरी से नवधा भक्त के बारे में कहा था. ‘नवधा भक्ति’ का अर्थ ‘नौ प्रकार से भक्ति’ से होता है।प्राचीन शास्त्रों में भक्ति के 9 प्रकार बताए गए हैं जिसे नवधा भक्ति कहते हैं।

श्रीमद्भागवत महापुराण की नवधा भक्ति

श्रीमद्भागवत महापुराण में बताया गया है कि किस प्रकार नौ प्रकार से ईश्वर की आराधना कर मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति इन नौ में से किसी भी एक प्रकार की भक्ति को अपने जीवन में हमेशा के लिए अपना लेता है तो मात्र इससे ही वो प्रभु के बैकुण्ठ धाम की प्राप्ति कर सकता है। शास्त्रों में ऐसा बताया जाता है कि मनुष्य जन्म का एकमात्र लक्ष्य प्रभु की प्राप्ति करना है। ऐसे में नवधा भक्ति के बहुत सरल भावों को अपनाकर आप भी भगवत्तप्राप्ति कर सकते है।

आइए जानते है नवधा भक्ति के नौ भाव-

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।

अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥

      (श्रीमद्भा० 7 । 5। 23 ) 

(श्रवण (परीक्षित), कीर्तन (शुकदेव), स्मरण (प्रह्लाद), पादसेवन (लक्ष्मी), अर्चन (पृथुराजा), वंदन (अक्रूर), दास्य (हनुमान), सख्य (अर्जुन) और आत्मनिवेदन (बलि राजा) – इन्हें नवधा भक्ति कहते हैं।)

श्रवण: ईश्वर की लीला, कथा, महत्व, शक्ति, स्रोत इत्यादि को परम श्रद्धा सहित अतृप्त मन से निरंतर सुनना।

कीर्तन: ईश्वर के गुण, चरित्र, नाम, पराक्रम आदि का आनंद एवं उत्साह के साथ कीर्तन करना।

स्मरण: निरंतर अनन्य भाव से परमेश्वर का स्मरण करना, उनके महात्म्य और शक्ति का स्मरण कर उस पर मुग्ध होना।

या सेवन: ईश्वर के चरणों का आश्रय लेना और उन्हीं को अपना सर्वस्व समझना।

अर्चन: मन, वचन और कर्म द्वारा पवित्र सामग्री से ईश्वर के चरणों का पूजन करना।

वंदन: भगवान की मूर्ति को अथवा भगवान के अंश रूप में व्याप्त भक्तजन, आचार्य, ब्राह्मण, गुरूजन, माता-पिता आदि को परम आदर सत्कार के साथ पवित्र भाव से नमस्कार करना या उनकी सेवा करना।

दास्य: ईश्वर को स्वामी और अपने को दास समझकर परम श्रद्धा के साथ सेवा करना।

सख्य: ईश्वर को ही अपना परम मित्र समझकर अपना सर्वस्व उसे समर्पण कर देना तथा सच्चे भाव से अपने पाप पुण्य का निवेदन करना।

आत्मनिवेदन: अपने आपको भगवान के चरणों में सदा के लिए समर्पण कर देना और कुछ भी अपनी स्वतंत्र सत्ता न रखना। यह भक्ति की सबसे उत्तम अवस्था मानी गई हैं।

श्रीरामचरितमानस में नवधा भक्ति

गोस्वामी तुलसीदास जी के रामचरितमानस के आरण्यकाण्ड में नवधा भक्ति का वर्णन मिलता है। प्रभु श्रीराम एवं भक्त शबरी के संवाद के माध्यम से भक्तियोग का जो उल्लेख श्री राम चरित मानस में किया गया है, वह अपने आप में बेमिसाल है। नवधा भक्ति की व्याख्या के यह तथ्य प्रतिपादित किया है कि मन में यदि प्रभु को पाने की आकुलता हो तो लिंगभेद, जातिभेद, ऊंच-नीच का भेद कुछ भी आड़े नहीं आता। शबरी कोप्रभु राम ने शबरी को नवधा भक्ति के अनमोल वचन दिए। शबरी प्रसंग से यह पता चलता है की प्रभु सदैव भाव के भूखे हैं और अन्तर की प्रीति पर रीझते हैं।

आइए जानते है विस्तार से नवधा भक्ति के नौ भाव-

   जब मां शबरी श्रीराम से कहती हैं, मैं नीच, अधम, मंदबुद्धि हूं तो मैं किस प्रकार से आपकी स्तुति करूं। भगवान श्रीराम शबरी द्वारा श्रद्धापूर्वक भेंट किए हुए बेरों को बड़े ही प्रेम से खाते हैं और इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं।इसके बाद भगवान मां शबरी को नवधा भक्ति के बारे में कुछ तरह से बताते हैं, जिसे तुलसीदास जी ने अपनी चौपाई में लिखा है...

नवधा भगति कहउं तोहि पाहीं,

सावधान सुनु धरु मन माहीं।

प्रथम भगति संतन्ह कर संगा,

दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।

अर्थ है: मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूं।तू इसे सावधान होकर सुनना और मन में धारण करना। पहली भक्ति है संतों का सत्संग और दूसरी भक्ति है मेरे कथा प्रसंग में प्रेम।

गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।

चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥

अर्थ है: तीसरी भक्ति है अभिमान से मुक्ति होकर गुरुजनों के चरण कमलों की सेवा करना और चौथी भक्ति है कपट को छोड़कर मेरे गुण समूहों का गान करना।

मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा।

पंचम भजन सो बेद प्रकासा।

छठ दम सील बिरति बहु करमा।

निरत निरंतर सज्जन धरमा।।

अर्थ है: पांचवीं भक्ति वेदों में प्रसिद्धि है और छठी भक्ति में भगवान राम के शील की चर्चा की गई है कि इंद्रियों का निग्रह शील (अच्छा चरित्र), बहुत कार्यों से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषों के धर्म में लगे रहना है।

सातवं सम मोहि मय जग देखा,

मोतें संत अधिक करि लेखा।

आठवं जथालाभ संतोषा,

सपनेहुं नहिं देखइ परदोषा॥

अर्थ हैं: सातवीं भक्ति संपूर्ण जगत को समभाव से मुझमें ओतप्रोत देखना और संतों को मुझसे भी श्रेष्ठ मानना है। आठवीं भक्ति है जो कुछ भी मिल जाए उसमें संतोष करना और सपने में भी पराए में कोई दोष न देखना।

नवम सरल सब सन छलहीना,

मम भरोस हियं हरष न दीना।

नव महुं एकउ जिन्ह कें होई,

नारि पुरुष सचराचर कोई॥

अर्थ है: नौवीं भक्ति सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना है। हृदय में मेरा विश्वास रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य का न होना।इनमें से जिसके पास एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो।

सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें,

सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें।

जोगि बृंद दुरलभ गति जोई.

तो कहुं आजु सुलभ भइ सोई॥

अर्थ है: हे भामिनि! मुझे वही प्रिय है. फिर तुझमें तो यह सभी तरह की भक्ति निहित है. अतएव जो गति योगियों को भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिए सुलभ हो गई है।

इस क्षणिक जीवन में निरंतर अभ्यास से इस परम लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, आगरा मंडल ,आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। )

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