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DR. D. K. Garg

पौराणिक कथा
भगवान शिव की पत्नी सती जब पिता के किसी यज्ञ आयोजन में पहुँचती है तो वहाँ शिव का अपमान होता है। वो इसे सहन नहीं कर पाई और यज्ञ कुंड में कूद पड़ती है। ऐसे में उनका शरीर क्षत-विक्षत हो जाता है। सती की मृत्यु से भगवान शिव क्रोधित हो गए और सती के शव को कंधे पर लेकर तांडव करने लेगे। ऐसे में भगवान विष्णु सोचा कि जब तक सती का शरीर है, शिव का गुस्सा शांत नहीं हो सकता। वे अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को कई टुकड़ों में काट देते हैं। तांडव कर रहे शिव के कंधे से सती के शरीर के हिस्से जिन स्थानों पर गिरे वो शक्ति पीठ कहलाए।
पौराणिक मान्यता -असम में कामाख्या शक्तिपीठ के बारे में कहा जाता है कि इसमें प्रजनन क्षमता बढ़ाने की शक्तियां हैं। कहा जाता है कि इस मंदिर में प्रजनन क्षमता को बढ़ाने की शक्ति है। इसलिए, जो जोड़े संतान प्राप्ति की इच्छा रखते हैं, वे उनकी पूजा करते हैं। निःसंतान दम्पति संतान की गहरी इच्छा के साथ इस मंदिर में आते हैं और देवी माँ की पूजा करते हैं, जिन्हें कामाख्या देवी कहा जाता है। ये भी कहा जाता है की पाषाण की बनी मूर्ति रजस्वला होती है और इसका रक्त आसपास फैलकर जमीं को लाल कर देता है इसलिए जब देवी रजस्वला होती हैं तो पुरुषों को मंदिर परिसर में प्रवेश की अनुमति नहीं होती है।
कामाख्या मंदिर का इतिहास : कामाख्या मंदिर की संरचना 8वीं या 9वीं शताब्दी की है, लेकिन तब से इसका कई बार पुनर्निर्माण किया गया है। इतिहास में जाएँ तो कहा जाता है कि इस मंदिर को 1564 ईसवी में कुछ हमलावरों ने नष्ट कर दिया था, मंदिर का निर्माण 1565 में कोच राजा नारायणनारायण द्वारा किया गया था और 1572 में कालापहाड़ द्वारा इसे नष्ट कर दिया गया था। कोच हाजो के राजा चिलाराय ने मंदिर का पुनर्निर्माण कराया था।बताया जाता है कि मंदिर का निर्माण बिहार के राजा नर नारायण ने जिसके बाद राजा विश्वसिंह के बेटे नरनारायण ने फिर से 17वीं शताब्दी में इसका फिर से निर्माण किया गया।
कामाख्या मंदिर में पशु बलि :
इस मंदिर मे प्रतिवर्ष जून माह मे 22 से 26 जून तक अम्बूवाची का मेला लगता है। इस मंदिर मे लोग तंत्र साधना करते है। अपनी तंत्र साधना की पूर्ति के लिये ये लोग पशु बलि देते है। ऐसा माना जाता है कि जब तक माँ कामाख्या को पशु बलि नही दी जाती है तब तक तांत्रिकों को सिद्धि नही मिलती है।
विश्लेषण : इस मंदिर के कई पहलुओं पर विचार करना जरुरी है।
१पशु बलि : दोस्तो यदि पुराणो की माने तो हिन्दू धर्म मे बलि प्रथा बिल्कुल गलत है। यदि हम दूसरो को जीवन दे नही सकते तो उनका जीवन हमे लेने का कोई अधिकार नही है। सभी योनियों मे मनुष्य योनि सबसे श्रेष्ठ तथा उत्तम है। सभी मनुष्य के अंदर जीवो के प्रति दया भावना होनी चाहिए। जो लोग पशु बलि देते है तथा निर्ममता से बेजुबान जानवरों का सिर धड से अलग कर देते है जरा सोचिये उसी जानवर के बदले यदि उन्ही का सिर धड से अलग कर दिया जाय तो कैसा रहेगा?
जब किसी जानवर की बलि दी जाती है तब वह कितना तडपता है तथा उसकी जान तडपते हुये कैसे निकलती है? इसका ऐहसास इन लोगो को नही होगा। माता तो जीवन देती है भला वो किसी अबोध जीव की बलि क्यो लेगी? यदि माता को बलि ही देना है तो अपने रक्त की बलि दीजिए जानवरों की बलि क्यो देते हो? अपने अंगूठे पर हल्का सा चीरा लगाकर दो चार बूंद माता को चढा दो लेकिन ऐसा नही करेंगे।
अपना खून ये लोग न चढाकर पशुओं का खून चढाते है। जिस मनुष्य के अंदर दया न हो वो मनुष्य नही राक्षस होता है। इसीलिए पशु बलि की प्रथा बंद होनी चाहिए।
बलि का वास्तविक भावार्थ है की अपने लोभ, घमंड, बुराई तथा ईर्ष्या की बलि दीजिये इससे माँ कामाख्या बहुत प्रसन्न होगी। रिश्वत लेना बंद करो ,झूट ना बोलो ,यज्ञ करो , वेद मार्ग पर चलो। एक प्रार्थना है जो सभी बोले और अपनाएं;
सबका भला करो भगवान् ,सब पर दया करो भगवान ,
सुखी बसे संसार सब , दुखिया रहे ना कोई,,,,ये गीत गाओ।
2 भगवांन के दर्शन के लिए भुगतान : आम तौर पर इस मंदिर में दर्शन करने में 3-4 घंटे लगते हैं। वीआईपी प्रवेश की एक टिकट भी लगता है, जिसे मंदिर में प्रवेश करने के लिए भुगतान करना पड़ता है, जो कि प्रति व्यक्ति रुपए 501 की लागत है। इस टिकट से कोई भी सीधे मुख्य गर्भगृह में प्रवेश कर सकता है और 10 मिनट के भीतर पवित्र दर्शन कर सकता है।
3.कामाख्या मंदिर का नामकरण :
एक कथा प्रचलित है, जिसके अनुसार भगवान शिव और माता पार्वती के बीच प्रेम की शुरुआत यहीं से हुई थी,इसे संस्कृत में काम कहा जाता है, इसी वजह से इस मंदिर का नाम कामाख्या मंदिर पड़ा।
एक अन्य विद्वान् का कहना है की कामाख्या का अर्थ सकारात्मक भाव से जुड़ा हुआ हैं. कामाख्या का अर्थ –“इच्छाओं को पूरी करना” होता हैं. असम की राजधानी गुवाहाटी से 40 किलोमीटर दूर नीलाचल पहाड़ियों पर स्थित प्रकृति की अनुपम छटा के लिए जाना जाता है।
कामाख्या मंदिर पहाड़ी पर है जिसका एक भूमिगत भाग है जिसमें एक प्राकृतिक गुफा है और चारो और खूबसूरत हरयाली से भरा है जिसमे सूर्य की किरणे अपनी मनोरम छटा बिखराती है।
यहाँ काम शब्द के दो अर्थ ले सकते है -पहला काम वासना में संलिप्तता से जोड़ कर देख सकते है। दूसरा काम वासना के निराकारण से जोड़ सकते है।
इसको समझने के लिए हमको साहित्य का सहारा लेना चाहिए –
कामाख्या – कामाख्या का साहित्य भावार्थ निकलेगा की वह स्थान जहा मनुष्य शांति के साथ अपने दुर्गुणों को समझकर ,उनकी व्याख्या करके उनको दूर करने का संकल्प ले। “कामाख्या” नाम का अर्थ है “वह जो इच्छाओं को पूरा करती है”। यह मंदिर उमा-कमलेश्वर नामक एक प्राकृतिक झरने वाली पहाड़ी पर स्थित है, जिसे ब्रह्मपुत्र नदी का स्रोत माना जाता है।
मानव के पांच तरह के विकार होते हैं काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार। आदि के कुविचार एक प्रकार के मानसिक शत्रु हैं वे मनः लोक में निशाचरों की भाँति छिपे बैठे रहते हैं और जब भी अवसर मिलता है, दल-बल सहित पूरी तैयारी के साथ निकल पड़ते हैं और जीवन के सुकोमल तन्तुओं को अस्त-व्यस्त कर डालते हैं। जैसे पेट में कोई विषैला पदार्थ पहुँच जाय तो वहाँ बड़ी जलन होती हैं, दस्त या उलटी होने लगती हैं।
आत्मा के सात गुण हैं – पवित्रता, शांति, शक्ति, प्यार, खुशी, ज्ञान और गंभीरता। एक तरफ पांच विकार हैं तो दूसरी तरफ सात गुण हैं। जितना हम इन पांच विकारों को इस्तेमाल कर रहे हैं, उतना ही इस सृष्टि में काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार के वाइब्रेशन बढ़ते जा रहे हैं।इसलिए मनुष्य कुछ समय के लिए प्रकृति की गोद में बैठकर आत्मचिंतन करता है और स्वाध्याय के द्वारा सत्य मार्ग की प्राप्ति के लिए अग्रसर होता है।
इस प्रकार के स्थान को तीर्थ की संज्ञा /उपाधि दी गयी है। और ऐसा चिंतन करने वाला स्थान कामाख्या कहलाता है।
मंदिर -आध्यात्मिक विकास का पहला और सबसे सुविधाजनक स्थान स्वयं के भीतर का पूजा स्थल या मंदिर है – जो कि शरीर है; जिस तरह हम मंदिरों या पूजा स्थलों को साफ-सुथरा रखते हैं, उसी तरह यह तरीका हमारे अपने मंदिर को साफ, स्वच्छ और साफ रखने में लागू होता है। इस सफाई का मतलब केवल भौतिक स्वयं या शरीर नहीं है, हमें खुद को बुरे विचारों, बुरे कार्यों और बुरे शब्दों से साफ करना होगा, गंदे जीवन के लिए, जिससे हमारे हृदय का व्यक्तिगत स्थान अशुद्ध हो जाता है जो न केवल पक्षियों की गतिविधियों को फैला सकता है, बल्कि एक महामारी की तरह फैल सकता है। फिर हम कह सकते हैं कि हमारा मस्तिष्क मन के मंदिर हैं, इसलिए हमारा कर्तव्य केवल यही नहीं है उसे स्वस्थ रखने के साथ-साथ सकारात्मक आहार भी दें ताकि मस्तिष्क सही तरीके से काम कर सके। ईश्वर सभी जगह है ,केवल एक विशेष स्थान पर नहीं है। एक भजन भी है जिसको बचपन से सुनते आये है -तेरे पूजन को भगवान, बना मन मंदिर आलीशान।।। ,
3 शक्ति और देवी – कामाख्या मंदिर को शक्ति पीठ और देवी की उपाधि दी गयी है –आइये इस पर भी व्हीआर करते है की वैदिक साहित्य में देवी और शक्ति का क्या भावार्थ है -जितने ‘देव’ शब्द के अर्थ लिखे हैं उतने ही ‘देवी’ शब्द के भी हैं। परमेश्वर के तीनों लिङ्गों में नाम हैं, जैसे—‘ब्रह्म चितिरीश्वरश्चेति’। जब ईश्वर का विशेषण होगा तब ‘देव’, जब चिति का होगा तब ‘देवी’, इससे ईश्वर का नाम ‘देवी’ है।

(शकॢ शक्तौ) इस धातु से ‘शक्ति’ शब्द बनता है। ‘यः सर्वं जगत् कर्तुं शक्नोति स शक्तिः’ जो सब जगत् के बनाने में समर्थ है, इसलिए उस परमेश्वर का नाम ‘शक्ति’है।
निष्कर्ष: ये मंदिर अंधविश्वास और पाप का गढ़ बन चुका है,जहा निरीह पशुओं के खून को नदिया बहती है और मनुष्य की पाशविकता का उद्धरण है।
वैसे तो पहले भी मुगलों के आक्रमण के डर से ये मंदिर बंद रहा ,पुजारी भाग गए ,आज भी कोरोना काल में मंदिर बंद रहा ,पुजारी डर से पूजा से गायब रहे, स्वयं को श्रेष्ठ कहने वाला मानव कोरोना से डर गया और पशु पक्षियों को करोना नही हुआ ।

१ इस मदिर को लेकर शिव और पार्वती की कहानी झूटी , अप्रमाणिक और विश्वास करने योग्य नहीं है।
२ ये मंदिर अनेको बार नष्ट हुआ, इन्हे तोड़ा गया और बार बार बनवाया ,इसका मतलब ये अपनी ही रक्षा करने में सक्षम नहीं है।
३ पशु बलि एक पाशविकता का प्रमाण है ,वेद विरूद्ध है। धर्म के अनुकूल नहीं है।
४ यदि यहाँ भगवान होते तो लाखो कबूतरों की रक्षा करते जिनके मंदिर के भक्तो ने पंख काट दिए है ,वे उड़ नहीं पाते।
५ कामाख्या शब्द का वास्तविक भावार्थ से स्पष्ट है जिसको समझने की जरुरत है।
कामाय आख्यायते या,सा कामाख्या।।
अर्थ – इच्छापूर्ति के लिए जिसका आख्यान=आह्वान किया जाता है,वह “कामाख्या” है।।
हम संध्या ,यज्ञ के द्वारा ईश्वर से प्रार्थना करते हैं की अच्छा स्वास्थ,परिवार ,संस्कार , वातावरण प्रदान करे।और जिस स्थान पर ऋषि मुनि इस प्रकार की शिक्षा दीक्षा दे उसको कामाख्या मंदिर की संज्ञा दे सकते है।इस विद्वान के अनुसार इस स्थल का नाम इसी कारण से कामाख्या मंदिर हुआ होगा ।क्योंकि हरेक नामकरण के पीछे कोई न कोई भावना अवश्य छिपी होती है।
६ पूजा का भावार्थ किसी की हत्या करना या पथर की मूर्ति पूजन नहीं ,पूजा का अर्थ सम्मान करना और ईश्वर के गुणों को ग्रहण करना ,सद्कर्म करना आदि है।
७ मंदिर का इतिहास मुग़ल काल , ईसा काल के बाद का है । यहां ऐसा कोई प्रामाणिक इतिहास नही मिलता जिसमें शरीरधारी शिव पार्वती यहां आए हो।ये तुक्का है।
8.ये संभव है को मुगल काल में मुगलों के आतंक से बचने के लिए यहां शक्ति पीठ यानि व्यायाम स्थल और शास्त्र चलाने की शिक्षा दी गयी हो।लेकिन बाद में पाखंडियो ने शक्तिवान सिद्ध करने के चक्कर में पशु हत्या करानी शुरू कर दी हो।
9.जिस राजा का नाम स्थापना के लिए बताया जाता है ,वह भी काल्पनिक है क्योंकि इतिहास में इस प्रकार के किसी राजा का नाम नही है।
16 वी, शताब्दी में देश मुगलों के आतंक से ग्रसित था,इसके बाद अंग्रेज आए ,पूरे देश में अपनी जान माल की रक्षा के लिए संघर्ष हो रहा था.
10.ये कोई शक्ति पीठ नही है , अन्धविश्वास और पाप का अड्डा है,आज भी मंदिर के आसपास गरीबी,चोरी ,गुंडा गर्दी,बीमारी, बेरोजगारी,जातिवाद आदि सामाजिक बुराई है।मुस्लिम और ईसाई यहां हिंदुओ का सफलता से धर्म परिवर्तन करवा रहे हैं,ये अन्धविश्वास का परिणाम है।
सच ये है की जिसने भी इस दर्शनीय स्थल को बनाया उसका उद्देश्य अति पवित्र रहा होगा जहा एकांत में प्रकृति की गोद में नीलगिरी पर्वत की गुफाओं में स्वाध्याय किया जा सके ,इसलिए शायद कामाख्या नाम दिया गया है।परंतु पण्डो ने अनर्थ करके अंधविसास का केंद्र बना दिया।

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