पिता शब्द की धातु और निरूक्ति द्वारा व्याख्या

आचार्य ब्र.नंदकिशोर
पिता- ‘पा रक्षणे’ धातु से ‘पिता’ शब्द निष्पन्न होता है। ‘य: पाति स पिता’ जो रक्षा करता है, वह पिता कहलाता है। यास्काचार्य प्रणीत निरूक्त में लिखा है-‘पिता पाता वा पालयिता वा’-नि. 4। 21। ”पिता-गोपिता”-नि. 6। 15 पालक, पोषक और रक्षक को पिता कहते हैं।
पिता की महिमा व गरिमा
वैदिक शास्त्रों, मनुस्मृति वाल्मीकि रामायण, महाभारत इत्यादि ग्रंथों में पिता की महिमा व गरिमा पर विशेष रूप से प्रकाश डाला गया है, अर्थात पिता की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की गयी है। महर्षि मनु ने कहा है-
उपाध्यान्दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता।
सहस्रं तु पितृन माता गौरवेणातिरिच्यते।।
दस उपाध्यायों से बढ़कर आचार्य, सौ आचार्यों से बढ़कर पिता और एक हजार पिताओं से बढ़कर माता गौरव में अधिक है, अर्थात बड़ी है। मनुस्मृतिकार ने जहां आचार्य और माता की प्रशंसा की है, उसी प्रकार पिता का स्थान भी ऊंचा माना है। मनुस्मृति में लिखा है-
”पिता मूर्ति: प्रजापते”।
अर्थात पिता पालन करने से प्रजापति का मूर्तिरूप है।
महाभारत के वनपर्व में यक्ष-युधिष्ठर संवाद में माता के महत्व के साथ साथ पिता की गरिमा का भी परिचय मिलता है-
यक्ष उवाच
का स्विद गुयतरा भूमे: किं स्विदुच्चतरं च खात।
किं स्विच्छीघ्रतरं वायो: किं स्विद बहुतरं तृणात।।
भावार्थ-यक्ष ने पूछा-पृथ्वी से भारी क्या है? आकाश से ऊंचा क्या है? वायु से भी तीव्र चलने वाला क्या है? और तृणों से भी असंख्य (असीम-विस्तृत) एवं अनंत क्या है?
युधिष्ठर उवाच
माता गुरूतरा भूमे: पिता चोच्चतरं च खात।
मन: शीघ्रतरं वाताच्चिंता तृणात।।
भावार्थ-युधिष्ठर ने कहा-माता पृथ्वी से भारी है। पिता आकाश से ऊंचा है। मन वायु से भी अधिक तीव्रगामी है और चिंता तिनकों से भी अधिक विस्तृत एवं अनंत है।
महाभारत में पिता का आकाश से ऊंचा माना है, अर्थात पिता के हृदय आकाश में अपने पुत्र के लिए जो असीम प्यार होता है वह अवर्णनीय है।
उदाहरण-पुत्र श्रवण कुमार के वियोग में अंधे माता पिता ने प्राण त्याग दिये। राजा दशरथ ने अपने पुत्र श्री रामचंद्र जी के बिछोह के कारण प्राण त्याग दिये।
पिता धर्म: पिता स्वर्ग: पिता हि परम तप:।
पितरि प्रीतिमापन्ने सर्वा: प्रीयन्ति देवता:।।
पिता ही धर्म है, पिता ही स्वर्ग है और पिता ही सबसे श्रेष्ठ तपस्या है। पिता के प्रसन्न हो जाने पर सारे देवता प्रसन्न हो जाते हैं।
पदमपुराण में माता पिता की गरिमा का परिचय मिलता है-
सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमय: पिता।
मातरं पितरं तस्मात सर्वयत्नेन पूजयेत।।
मातरं पितरं चैव यस्तु कुर्यात प्रदक्षिणम।
प्रदक्षिणीकृता तेन सप्त द्वीपा वसुंधरा।।
जानुनी च करौ यस्य पित्रो: प्रणमत: शिर:।
निपतन्ति पृथिव्यां च सोअक्षयं लभते दिवम।।
माता सर्वतीर्थमयी है और पिता संपूर्ण देवताओं का स्वरूप है, अतएव प्रयत्नपूर्वक सब प्रकार से माता पिता का आदर सत्कार करना चाहिए। जो माता पिता की प्रदक्षिणा करता है उसके द्वारा सात द्वीपों से युक्त संपूर्ण पृथिवी की परिक्रमा हो जाती है। माता पिता को प्रणाम करते समय जिसके हाथ, घुटने और मस्तक पृथिवी पर टिकते हैं, वह अक्षय स्वर्ग को प्राप्त होता है।
पिता
शरीरकृत प्राणदाता यस्य चान्नानि भञ्जते।
क्रमेणैते त्रयोप्युक्ता: पितरो धर्मशासने।।
जो गर्भाधान द्वारा शरीर का निर्माण करता है, जो अभयदान देकर प्राणों की रक्षा करता है तथा जिसका अन्न भोजन किया जाता है, धर्मशास्त्र में क्रमश: ये तीनों पुरूष पिता कहे गये हैं।
पितर
यश्चैवमुत्पादयते यश्चैनं त्रायते भयात।
यश्चास्य कुरूते वृत्तिं सर्वे ते पितरस्त्रय:।
जो जन्म देता है, जो भय से बचाता है तथा जो जीविका देता है-ये तीनों पितर (पिता) कहलाते हैं।
विशेष:प्राय: रूढि़वादी लोग यह समझते हैं कि जिनके पितादि की मृत्यु हो गयी वे पितर कहलाते हैं, परंतु इस प्रमाण से सिद्घ है कि पितर जीवित होते हैं। वैसे भी पितर: शब्द पितृ शब्द का बहुवचन है। व्याकरण में यह कोई नियम नही है कि एक वचन पितृ तो जीवित का वाचक हो, परंतु बहुवचन पितर: होने पर वह मृतक का वाचक हो जावे। इसी श्लोक के आधार पर चाणक्यनीति के अध्याय 5 श्लोक 22 में कहा गया है-
पांच प्रकार के पिता
जनिता चोपनेता च यस्तु विद्यां प्रयच्छति।
अन्नदाता भयत्राता पंचैते पितर: स्मृता:।।
जन्म देने वाला यज्ञोपवीत आदि संस्कार कराने वाला, अध्यापक, अन्न देने वाला तथा भय से बचाने वाला-ये पांच पितर पिता के समान गिने जाते हैं।

पुनरपि च-अन्नदाता भयत्राता, पत्नी तातस्तथैव च।
विद्यादाता, जन्मदाता पञ्चैते पितरो नृणाम।।
अर्थात अन्नदाता, भयत्राता, विद्यादाता, पत्नी का पिता और जन्म देने वाला-ये पांच मनुष्य के पितर या पिता हैं।
पिता का भ्राता
ये पितुभ्र्रातरो ज्येष्ठा ये च तस्यानुजास्तथा।
पितु: पिता च सर्वे ते पूजनीया: पिता तथा।।
जो पिता के बड़े तथा छोटे भाई हों, वे तथा पिता के भी पिता-ये सब के सब पिता के ही तुल्य पूज्यनीय हैं।
पञ्चायतन पूजा
प्रथम माता मूत्तिमयी पूजनीय देवता, अर्थात संतानों को तन मन धन से सेवा करके माता को प्रसन्न रखना, हिंसा अर्थात ताडऩा कभी न करना। दूसरा पिता सत्कत्र्तव्य देव, उसकी भी माता के समान सेवा करनी। तीसरा आचार्य जो विद्या का देने वाला है उसकी तन, मन, धन से सेवा करनी। चौथा अतिथि जो विद्वान, धार्मिक, निष्कपटी, सबकी उन्नति चाहने वाला, जगत में भ्रमण करता हुआ, सत्य उपदेश से सबको सुखी करता है, उसकी सेवा करें।
पांचवां स्त्री के लिए पति और पुरूष के लिए स्वपत्नी पूजनीय है।
ये पांच मूर्तिमान देव हैं, जिनके संग से मनुष्य देह की उत्पत्ति पालन, सत्यशिक्षा, विद्या और सत्योपदेश की प्राप्ति होती है। ये ही परमेश्वर को प्राप्त होने की सीढिय़ां हैं। पञ्चायतन पूजा में द्वितीय स्थान पिता का भी माना, दर्शाया गया है।
श्राद्घ पक्ष में माता-पिता के प्रति शास्त्रों का उपरोक्त व्याख्यान बहुत ही अनुकरणीय और प्रशंसनीय है।

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