…सारे तीर्थों से उत्तम तीर्थ

आजकल के युग को विज्ञान का युग कहा जाता है लेकिन विज्ञान के इस आज के वैज्ञानिक युग को बहुत ही संकीर्ण अर्थों व संदर्भों में लिया जाता है। भारतीय वांग्मय में विज्ञान का अर्थ विशेष ज्ञान से लिया जाता रहा है। यह विशेष ज्ञान जब प्रकृति के विषय में होता है, या प्राप्त किया जाता है तो उस समय उसे भौतिक विज्ञान कहा जाता है। आजकल इसी विज्ञान का काल है। वास्तव में भौतिक विज्ञान की उन्नति विज्ञान की संकीर्णताओं का बोध कराती है। इससे ज्ञात होता है कि मानव जिस उन्नति को अपनी उन्नति मान रहा है या विकासवादी विज्ञान को पाकर इतरा रहा है, वह उसके विकास का नही अपितु विनाश का रास्ता है। जगत में ईश्वर ने ज्ञान को बीज रूप में छिपाकर दिया है। जैसे एक छोटे से बीज में विशाल बरगद का पेड़ छिपा होता है उसी प्रकार बीज रूपी ज्ञान में व्यापक विज्ञान छिपा होता है। आवश्यकता उसकी सीमाओं की व्यापकता को पहचानने की होती है। एक गेंहूं के दाने को लें, इसे हम जब खेत में बोते हैं, तो बड़ी मात्रा में अन्न पैदा होता है, उस अन्न को हम रोटी बनाकर खाते हैं। यहां बीज अपने आप में ज्ञान है, जबकि उसे बड़ी मात्रा में उसका अन्न के रूप में उत्पादन करना, फिर रोटी बनाना आदि हमारा विज्ञान है। इस प्रकार ज्ञान का परिष्कृत परिमार्जित और शोधित स्वरूप ही हमारे लिये विज्ञान है। विज्ञान का यह हितकारी स्वरूप ही विशेष ज्ञान का उत्कृष्टï रूप है। यह विज्ञान तकनीकी विज्ञान के रूप में भी पाया जाता है। हमारे लिये ईश्वर ने पहाड़ बनाये। मानव ने पहाड़ों से पत्थर लिए उन्हें तराशा और भव्य भवन (लालकिला, ताजमहल इत्यादि) बनाये। यदि इन भव्य राजप्रासादों को आप पहाड़ का परिष्कृत और परिवर्धित स्वरूप कहें तो कोई अश्यिोक्ति नही होगी। तराशा हुआ पत्थर विज्ञान की देन है, जिसने हमारे भौतिक विज्ञान की उन्नति में चार चांद लगा दिये। मानव ने और आगे बढ़ते हुए परमाणु की खोज की, उसकी शक्ति से विज्ञान ने ऊंची छलांग लगा दी। आज हम परमाणु की शक्ति से संपन्न विज्ञान के नये नये चमत्कारों के युग में जी रहे हैं। जितनी चकाचौंध हमें अपने चारों ओर दीख रही है वह इसी भौतिक विज्ञान की देन है।
परंतु आज का यह विज्ञान प्रकृति में उलझ कर रह गया। इससे आगे एक और विज्ञान है जिसका नाम अध्यात्मविज्ञान है, यह विज्ञान हमें प्रकृति से हटा कर आत्मा के लोक में ले जाता है। इसीलिए इसे अध्यात्म विज्ञान कहा जाता है। भारतीय परंपरा में प्रकृति के अतिरिक्त दो अन्य पदार्थ भी माने गये हैं जिनका विशेष ज्ञान प्राप्त करना विज्ञान के अंतर्गत आता है। ये दो पदार्थ आत्मा और परमात्मा हैं। विज्ञान की शुद्घ और पूर्ण उन्नति तो इन दो पदार्थों को समझने पर ही होनी संभव है। इस प्रकार भारतीय परंपरा में प्रकृति, आत्मा और परमात्मा के संपर्क ज्ञान का नाम विज्ञान है । परमात्मा के संबंध में जो विज्ञान हमारे ऋषियों ने हमें बताया था वह ब्रहम विज्ञान है। भौतिक विज्ञान मनुष्य को अहंकारी बनाता है, क्योंकि वह प्रकृति पर मिलने वाली क्षणिक विजय को अपने ज्ञान की पराकाष्ठा मान बैठता है। ऐसी परिस्थितियों में विश्व परिवेश में तनाव, घुटन, कलह और अराजकता की स्थिति पैदा होती है, जिससे संघर्ष उत्त्पन्न होता है और अर्थ व काम का बोलबाला होता हैं ब्रहम शक्ति का पतन होता है और क्षत्रिय शक्ति का विकास होता है। क्षत्रिय वर्ग उन परिस्थितियों में ब्रहम शक्ति को उपेक्षित करता है। विवेकशील लोगों पर मूर्ख लोग शासन करते हैं, और उनकी विवेकपूर्ण बातों पर व्यंग्य कसते हैं।
जैसा कि आजकल हम भारत में लोकतंत्र की गति की दुर्गति को परिणति के रूप में देख रहे हैं। यहां मूर्ख लोग विवेकशील लोगों पर और राष्ट्रभक्त लोगों पर कीचड़ उछाल रहे हैं और उनकी उचित बातों को जनहित के विरूद्घ बताकर उनका उपहास कर रहे हैं। महाभारत में एक दुर्योधन ने ब्रहमशक्ति पर क्षात्र शक्ति का वर्चस्व स्थापित किया था, जब उसने कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, महात्मा विदुर, भीष्म पितामह, भगवान कृष्ण, माता गांधारी और अपने पिता तक की नेक सलाह को मानने से इन्कार कर दिया था। उसका परिणाम क्या निकला-भयानक विनाश।
आज के अहंकारी और अर्थ व काम की चपेट में आये हुए नेताओं की दुर्योधन बुद्घि का परिणाम क्या निकलेगा?…भयंकर विनाश। हर घर में ब्रहम शक्ति होती है, उनमें कोई न कोई विवेक शील वृद्घ होता है जो परिवार को सन्मार्ग पर ले चलने का प्रयास करता है। पर जब उसके सन्मार्ग दर्शन का उपहास होने लगे या उसकी उपेक्षा होने लगे तो उस समय कालचक्र भयानक गति से दौड़ता है, और ‘अप्रत्याशित’ कृत्यों की दुंदुभि बजा देता है। इसका अभिप्राय यही होता है कि उस घर में ब्रहमशक्ति को पीछे धकेल कर क्षात्र शक्ति आगे आ गयी है।
तो वही परिवार उन्नति करता है, वही समाज उन्नति करता है, और वही राष्ट्र उन्नति करता है जो ब्रहमशक्ति का (विवेकशील लोगों की सम्मति का) का उपासक होता है, और रक्षक भी होता है। इसीलिए हमारे यहां वेद ने मनुष्य के लिए निर्धारित किया कि तू मेधावी बन, और उस विवेकपूर्ण ज्ञान की प्रतिनिधि मेधा का उपासक बन, जिसकी उपासना हमारे पितर लोग परम्परा से करते आए हैं, यानी जिस विमल बुद्घि के प्रकाश में अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी जिनके धैर्य और संयम ने अपना विवेक नही खोयाा और निरंतर प्रगति पथ पर आगे बढ़ते रहे, तू भी उन्हीं के कदमों का अनुकरण कर। क्योंकि यदि तू उस रास्ते से भटक गया तो जीवन को विडंबनाओं का शिकार बना देगा। जबकि तेरे जीवन का लक्ष्य विडंबनाओं में भटकना नही है अपितु उनसे पार निकलना है। विनम्र लोग इसलिए विडंबनाओं के काल में उदारता का परिचय देते हैं। सहृदयी लोग उनके उदारता पूर्ण क्षमा मांगने के भाव को सही संदर्भों व अर्थों में लेते हैं। विडंबनाएं हमारे व्यक्तित्व को प्र$कृति के पास में बांधती हैं, जबकि मानव का जीवन उद्देश्य प्रकृति के पार आत्मा और परमात्मा के विज्ञानानंद में गोते लगाना है। यह आनंद ही वह पावन तीर्थ है जो हमें वैतरणी पार कराता है। इससे उत्तम कोई अन्य तीर्थ नही है। इस तीर्थ में स्नान करना ही सारे तीर्थों से उत्तम है।

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