कहां लुप्त हो गईं वे उच्च मान्यताएं?

बात कई सौ वर्ष पुरानी है।
उड़ीसा के पुरी राज्य के महाराजा अपने मंत्री के साथ घोड़े पर सवार हो शिकार के लिए जंगल में निकल पड़े ओर हिंसक-जीव शेर आदि की तलाश में वे बीयावान जंगल में बढ़ते ही चले गये।
मई जून की भीषण गर्मी थी। सूर्य की तेज किरणों ने उनके शरीर को पसीने से लथपथ कर डाला। प्यास से बेहाल वह मंत्री से बोले, कहीं पानी की तलाश करो, प्यास के मारे दम निकलने को है। मंत्री ने दूर दूर तक नजर दौड़ाई उसे न कोई कुंआ नजर आया न प्याऊ। अब दोनों शिकार की जगह पानी की तलाश में थे।
मंत्री ने बाईं ओर देखकर कहा महाराज उधर चीलें उड़ रही हैं। जरूर कुआ होना चाहिए। दोनों ने अपने घोड़ों को एड़ लगाई और उधर ही चल दिये। वास्तव में वहां आम के बाग के बीच कुंआ था। कुए की मेंढ़ पर डोल रखा हुआ था।
मंत्री ने घोड़े से उतर कर डोल को मांजा और पानी भरने के लिए कुएं में डाल दिया। दादाजी राम-राम एक महिला ने पास खड़े महाराजा का झुक कर अभिवादन किया। मैंने पहचाना नही, तू कौन है बेटी? महाराजा ने औरत से पूछा। दादाजी मैं आपकी बेटी हूं, आपके खचेड़े भंगी की लड़की। मैं इसी गांव में तो ब्याही हूं उसने उत्तर दिया। यह सुनते ही महाराजा का चेहरा गंभीर हो उठा। मंत्री को संबोधित कर उन्होंने कहा मंत्री जी डोल का पानी बिखेर दो। इस गांव में तो हमारे भंगी की बेटी ब्याही है। इस गांव के कुएं का पानी पीकर क्या हमें नर्क में जाना है। पसीने से तर बतर महाराजा प्यास से व्याकुल हो रहे थे। उन्होंने कुछ सोचा और अंगुली में हीरे की अंगूठी निकाली तथा भंगिन को देते हुए बोले, बेटी तूने हमारा धर्म बचा दिया। बेटी के गांव का पानी पीकर घोर नर्क में जाना पड़ता। हमारी ओर से तुझे यह छोटा सा तोहफा है।
महत्व इस बात का नही है कि राजा ने तत्कालीन विश्वास के अनुसार बेटी के घर का पानी नही पिया। महत्व है अपने सिद्घांत और परंपरा के प्रति अडिगता का। विश्वास कुछ भी रहा हो पर उसका कठिनतम परिस्थिति में भी निर्वाह करना उज्जवल चरित्र की ही निशानी समझी जाएगी।
भंगिन नही दादी, चाची
कुछ ही दशक पहले तक गांव की बेटी को अपनी बेटी माना जाता था। किसी भी जाति की बेटी हो, उसे पूरा गांव अपनी बेटी मानता था। घर में सफाई के लिए आने वाली भंगिनों को ब्राहमणों क्षत्रिय व वैश्य वर्ग के लोग भी आयु के हिसाब से चाची जी, ताई जी, बुआ जी आदि सम्मान जनक शब्दों से संबोधित करते थे।
मुझे भली भांति याद है कि लगभग तीस वर्ष पहले हमारे पिलखुवा स्थित निवास स्थान पर सफाई व मल उठाने के लिए पूनिया नामक वृद्घा आया करती थी। मेरी दादरी उसके आते ही मेरी माता जी से कहतीं, अरी बहू, चाची को पैरों नही पड़े। और माताजी तुरंत दूर से ही, चाची जी पैरों पड़ कहतीं। पूनिया दादी उन्हें उदारता से बहू दूधे नहाओ, पूतो फलो कहकर जी भर आशीष देती थीं।
मेरे पिताश्री कट्टर सनातनी थे। वे स्वयं वृद्घा दादी पूनिया को देखते ही चाचीजी राम-राम कहकर अभिवादन करना न भूलते थे।
एक दिन मैं व पिताजी बैठक में बैठे हुए थे। ढोल बजने की आवाज सुनाई दी तो देखा कि सामने से कुछ औरतें व मर्द आ रहे हैं। पास आने पर देखा कि हमारा भंगी व उसके परिवार के लोग हैं। एक युवक को संकेत कर भंगी ने पिताजी से कहा, लाला जी यह आपका दामा है। लड़की को लेने आया है। अपने यजमानों से मिलवाने लाया हूं। पिताजी ने तुरंत माताजी को कहकर धोती व पांच रूपये अंदर से मंगवाए उसे स्नेह के साथ भेंट किये तथा अपने दामाद की तरह आशीष दिया।
इस प्रकार का अनुपम स्नेह था उस समय हमारे समाज में। पिताजी बताया करते थे कि किस प्रकार जब बारातें जाती थीं तो यह पता लगाया जाता था कि उस गांव में अपने गांव या शहर की कोई लड़की तो नही विवाही है। यदि भंगी, नाई, कुम्हार या चमार की लड़की भी उस गांव में विवाही होती तो उसके घर परोसे व रूपये भेजना न भूलते थे। गांव में किसी भी जाति की बेटी का विवाह होता था तो पूरा गांव उसे अपनी बेटी का विवाह समझता था। किसी के घर से मट्टा आता था तो जमींदार व किसान अपने खेत से काशीफल व आलू भेजते थे। कुम्हार के यहां से पौंसेरी सकोरे आ जाते थे तो नाई पत्तलों की व्यवस्था करता था। गरीब तबके के लोगों को किसान अनाज पहुंचा देते थे। विवाह में ऐसा दृश्य उपस्थित हो जाता था कि जैसे तमाम गांव ही उसमें सहयोग कर रहा है।
किसी भी व्यक्ति का दामाद जब गांव आता है तो पूरा गांव उसे सम्मानित पावना (मेहमान) समझकर आदर देता था। मैंने अपनी ससुराल (उझारी जिला मुरादाबाद) में स्वयं देखा कि वहां संपन्न आम के बाग के विवाह में बाग की रखवाली करने वाले मुसलमान कारिंदे के दामाद को भी उसी सम्मान के साथ बुलाया गया जिस सम्मान से हमें। किंतु आज तो ये बातें मात्र सपना बनकर रह गयीं हैं।

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