लाभकारी हो हवन हर जीवधारी के लिए

इस चिकित्सक की यह उद्घोषणा समझो कि हमारा स्वास्थ्य बीमा कर देना है। वह पूर्णत: आश्वस्त कर रहा है हमें कि होम की शरण में आओ और नीरोगता पाओ। 
आज संसार के अधिकांश व्यक्ति मानसिक अस्तव्यस्तता और मानसिक रोगों से अधिक पीडि़त हैं। असंतुलित जीवनशैली और अमर्यादित दिनचर्या ने व्यक्ति को सबसे बड़ा रोग तनाव का लगाया है। इस रोग के कारण हर व्यक्ति सोचता कहीं है, चलता कहीं है, बोलता कहीं है, कहता कुछ है-करता कुछ है। ऐसी मानसिकता स्पष्ट करती है कि मनुष्य के भीतर का वह प्रकाश उससे लुप्त हो गया है, जिसकी चाह उसे जन्मजन्मांतरों से बनी रही है। यज्ञ करने से मनुष्य ईश्वर का सामीप्य और सान्निध्य अनुभव करता है। इससे उसकी मानसिक शक्तियां बलवती होती हैं, और उसकी एकाग्रता बढ़ती है। एकाग्रता के बढऩे से मनुष्य अपनी समस्याओं के समाधान के प्रति सजग और सावधान होता है और उनके समाधान बड़ी सरलता से ढूंढ़ लेता है। इसका एक कारण यह भी कि यज्ञ हवन करने से और ईश्वर का सामीप्य और सान्निध्य प्राप्त करने से मनुष्य के अंतर्मन में अहंकारशून्यता का प्रादुर्भाव होता है जिससे उसका कर्ताभाव समाप्त हो जाता है। उसके भीतर आत्मबल बढ़ता है और ईश्वर के प्रति वह समर्पित होकर अपने कार्यों को पूर्ण करता चलता है। ऐसी प्रवृत्ति बन जाने से व्यक्ति की जीवनचर्या और दिनचर्या मर्यादित और संतुलित होती चली जाती हैं। जिससे मनुष्य को आत्मिक शांत का बोध होता है और वह आत्मज्ञान के प्रकाश में अपने जीवन को उन्नति पथ पर अग्रसर करता चलता है।
यज्ञ हवन करने से ऐसी स्थिति प्राप्त होती है। जिन लोगों को या साधकों को या यज्ञप्रेमी महानुभावों को ऐसी अवस्था प्राप्त हो जाती है उनके चेहरे का आभामंडल दूसरे लोगों पर अलग ही प्रभाव डालता है।
वेद में ऐसे अनेकों मंत्र हैं जो रोग निवारक हैं। उन्हें उचित क्रिया के माध्यम से होम के समय बोलने से कितने ही रोगों का शमन हो जाता है। हमारे ऋषि लोग प्राचीन काल में यज्ञ हवन से ही वायुमंडल को शुद्घ रखते थे और न केवल वायुमंडल को शुद्घ रखते थे अपितु अपने आपको निरोगी भी रखते थे। हमारे देश में आजादी मिलने तक बहुत कम लोग बीमार होते थे। इसका कारण यही था कि हमारे देशवासी परम्परागत रूप से अपने पूर्वजों के दिये ज्ञान के आधार पर यज्ञ आदि से जुड़े रहते थे, दूसरे यज्ञादि करने से उनकी बुद्घि शुद्घ रहती थी, इसलिए खाद्य पदार्थों में मिलावट करना या खाद्य पदार्थों को मानव जीवन के लिए हानिकारक बनाना वह पाप समझते थे। जिसका परिणाम यह होता था कि लोग निरोगी रहते थे।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात लोगों की सोच में परिवर्तन आया और यज्ञ हवन के माध्यम से परमार्थ को अपने जीवन का आधार और श्रंगार बनाकर चलने वाले भारतवासियों का एक बड़ा वर्ग यज्ञ हवन से कटकर परमार्थ के स्थान पर स्वार्थ के गहरे गड्ढे में जा गिरा। जिससे खाद्य पदार्थों में मिलावट करना या उन्हें हानिकारक बना देना लोगों ने अपना व्यवसाय बना लिया। परिणामस्वरूप आज देश की सवा अरब की आबादी में से एक अरब से अधिक लोग रोगी हैं। इतनी बड़ी जनसंख्या का रोगी होना बताता है कि हमने यज्ञ हवन की अपनी प्राचीन परम्परा को छोडक़र कितना अनर्थ कर लिया है? 

तंत्र-मंत्र चिकित्सा
जब देश में आज्ञानान्धकार फैला तो तंत्र मंत्र वाले या जादू-टोटके वालों ने लोगों को भ्रमित करना आरंभ कर दिया। क्योंकि परम्परा से हम मंत्रों के द्वारा चिकित्सा करते आ रहे थे, इसलिए मूर्ख, स्वार्थी और अज्ञानी लोगों के बहकावे में लोग आ गये। जिन्होंने तंत्र-मंत्र के द्वारा लोगों को भ्रमित करना आरंभ कर दिया था। 
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि पूर्ण विधि विधान से जो यज्ञ किया जाता है, उसकी भस्मी से भी रोग निवारण होते हैं। यजुर्वेद (25/8) में ऐसा आया है। जिसकी व्याख्या करते हुए महर्षि दयानंद कहते हैं-‘जले हुए पदार्थ के शेषभाग (राख) से सबके प्रकाश करने हारे (सर्व जनहितकारी) अग्नि को जानना चाहिए।’
हमारे देश के ऋषि मुनि ऐसी बहुत सी विद्याओं को जानते थे जिनके आधार पर वे हवन की भस्मी से रोगों की औषधि तैयार कर लेते थे। यही कारण था कि ऋषि मुनियों के पास लोग अपने रोगों की चिकित्सा के लिए जाया करते थे। जब देश में अज्ञानांधकार फैला तो तपस्वी  ऋषि मुनियों के स्थान पर कुछ पाखण्डी लोगों ने बैठकर देशवासियों को भ्रमित करना आरंभ कर दिया। इसमें देश के लोगों का कोई दोष नहीं था, दोष तो उन पाखण्डी लोगों का था जो स्वयं को तपस्वी  ऋषि मुनि के रूप में प्रतिष्ठित कराकर अपनी पूजा करने-कराने के लिए लोगों को प्रोत्साहित कर रहे थे। वास्तव में इन लोगों का भारत की संस्कृति की महानता से कोई लेना-देना नहीं था, इसके स्थान पर इनका एक ही उद्देश्य था कि किसी भी प्रकार से अपना स्वार्थ सिद्घ किया जाए।
आज भस्मी को विदेशों में दवाई के रूप में मान्यता मिलती जा रही है। जर्मनी, भारत अमेरिका पोलैंड आदि देशों में भस्म पर अनुसंधान किया जा रहा है कि इसका चिकित्सकीय उपयोग क्या हो सकता है और कैसे यह रोग निवारक हो सकती है? पर ध्यान रहे कि अपने धूने की राख की भस्म से भूत भगाने वाले बाबाओं की भस्म और यज्ञाग्नि की भस्म में भारी अंतर है। हमें सावधान होकर और आंखें खोलकर दोनों का अंतर समझना होगा। क्रमश:

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betsat giriş
betsat giriş
betgaranti giriş
betgaranti yeni giriş
betsat giriş
betsat giriş
superbetin giriş
betgaranti giriş
superbetin giriş
vdcasino giriş
superbetin giriş
superbetin giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
betsat giriş
betsat giriş
betpark giriş
betpark giriş
nesinecasino giriş
nesinecasino giriş
cratosroyalbet giriş
cratosroyalbet giriş
betgaranti giriş
jojobet giriş
betgaranti mobil giriş
klasbahis
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vdcasino giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betgaranti giriş
betpark giriş