स्थिर रख सदा मानवी मन का तापमान

बिखरे मोती-भाग 184

भक्ति के संदर्भ में महर्षि देव दयानंद ने कहा-”प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम एक घंटा प्रतिदिन ध्यान (भक्ति) में बैठना चाहिए। चित्त को हर ओर से हटाकर भगवान के चिंतन में लगा देना चाहिए परंतु जो लोग मुक्ति चाहते हैं उन्हें कम से कम दो घंटे ध्यान करना चाहिए।” 
महर्षि ने यह बात क्यों कही? इसलिए कि ध्यान (भक्ति) ही आत्मा  का भोजन है। ध्यान से अंत:करण की बैटरी चार्ज होती है। जो शक्ति खर्च हो गयी-वह फिर से मिल जाती है। ध्यान की अवस्था में जब आत्मा परमात्मा से मिलती है तो भगवान की ज्योति उसे आभायुक्त कर देती है। उसकी किरणें आत्मा पर पड़ती हैं तो मन की सभी चिंताएं दूर हो जाती हैं, शांति का वास होता है तथा अशांति काफूर हो जाती है, उलझनें सुलझने लगती हैं। जिन्हें ये किरणें नहीं मिलतीं उनके लिए अशांति, चिंताएं और उलझनों का अंधकार सर्वदा बना रहता है। सब कुछ होने पर भी उन्हें सुख-शांति नहीं मिलती है। इसलिए मनुष्य को समय रहते हुए भगवान की भक्ति अवश्य करनी चाहिए। ध्यान रखो, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, ज्ञान, वैराग्य की शुद्घि इन सबके लिए भक्ति की परम साधना है।
सारांश यह है कि वह जगतपिता हमें जन्म तो देता ही है, जीने के साधन भी देता है, अगणित प्रकार के भोग देता है, आरोग्य और सौभाग्य देता है, आयु देता है, जिजीविषा (जीवनी शक्ति) व जिज्ञासा देता है, सुख समृद्घि और वृद्घि देता है, अन्न, औषधि, वस्त्र परिवर्तन करता है। सोते वक्त भी हमारी रक्षा करता है, मन मस्तिष्क को सक्रिय रखता है और सांसों की लड़ी को गतिशील रखता है, हृदय की धडक़न को क्रियाशील रखता है, पाचनतंत्र, स्नायुतंत्र और रक्त परिभ्रमण तंत्र को प्रतिपल सक्रिय रखता है। कहने का अभिप्राय है कि प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से हमारी हर प्रकार से इतनी रक्षा करता है कि जब उसकी असंख्य अनुकंपाओं की अनुभूति होती है तो मेरे हृदय और मस्तिष्क उसके चरणों में झुक जाते हैं। अगाध श्रद्घा और भक्ति का सागर मानस के मुकुर में हिलोरें मारता है।  वाणी मौन हो जाती है, आंखें नम हो जाती हैं, जब उसकी अनंत अनुकंपाओं की याद आती है। भगवान की भक्ति के सुकोमल भावों की प्रतिध्वनि कुछ इस प्रकार मुखरित होती है :- 
मै अकीदों की कद्र करता हूं
क्योंकि खुदा में एतकाद रखता हूं।
खुदा-ए-रहमत बेपनाह है,
इसलिए खुदा को याद करता हूं।।
अकीदों अर्थात मान्यताएं।
स्थैर्य (दृढ़ता) मन की संकल्पशक्ति की महत्ता :-
स्थिर रख सदा मानवी
मन का तापमान।
अंतर में उठते रहें,
विषयों के तूफान ।। 1115 ।।
व्याख्या :-
भगवान कृष्ण ने गीता के तेरहवें अध्याय के सातवें श्लोक में ‘आत्मज्ञानी’ भक्त के बीस लक्षण बताये हैं, उनमें एक लक्षण ‘स्थैर्य’ भी कहा है। जिसका अर्थ है-‘दृढ़ता’ अर्थात मन की संकल्प शक्ति। इसे और भी सरल शब्दों में कहें तो स्थैर्य नाम स्थिरता का या विचलित न होने का है अर्थात जो विचार कर लिया है, जिसे लक्ष्य बना लिया है, उससे विचलित न होना स्थैर्य कहलाता है। क्रमश:

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