पूरे देश से इस समय एक आवाज उठ रही है कि ‘कश्मीर के पत्थरबाजो! भारत छोड़ो।’ इस आवाज को पूर्णत: न्यायसंगत एवं उचित कहा जाएगा। 1942 की अगस्त में जब गांधीजी ने अंग्र्रेजों के विरूद्घ ‘अंग्रेजो! भारत छोड़ो’ की आवाज लगायी थी तो उसके पीछे भी इस राष्ट्र के मचलते हुए चिंतन का यही पहलू कार्य कर रहा था कि जो लोग (अंग्रेज) इस देश की माटी से प्रेम नहीं करते हैं और यहां का खाकर भी इसके प्रति समर्पित नहीं हैं-उन्हें इस देश में रहने का कोई अधिकार नहीं है। अंग्रेजों वाली यही बात यदि आज कश्मीर के पत्थरबाजों की ओर से भी दिखायी जा रही है तो उनके लिए भी इस देश की ओर से यह मजबूत संदेश दिया ही जाना चाहिए कि  ‘कश्मीर के पत्थरबाजो! भारत छोड़ो।’ कश्मीर उन कश्मीरियों का है जो इस देश के सनातन  इतिहास, सनातन संस्कृति और सनातन धर्म के पुजारी हैं और विपरीत मजहब रखकर भी देश की मुख्यधारा में रहने के इच्छुक हैं, जो नही चाहते कि देश को साम्प्रदायिक आधार पर पुन: बंटवारे की स्थिति में जाना पड़े।
यह कितने दुख की बात है कि इस देश के सनातन स्वरूप की त्रिवेणी अर्थात सनातन इतिहास, सनातन संस्कृति और सनातन धर्म से प्रेम करने वाले परमदेशभक्त कश्मीरी पंडितों को अपना घरबार छोडक़र अपने ही देश में शरणार्थी बनना पड़े और रोजी रोटी के लिए इधर-उधर भटकना पड़े, जबकि कश्मीर की केसर वाली क्यारी में उग आयी ‘नागफनी’ (सारे आतंकी संगठन) क्यारी पर अपना अधिकार जमा लें। निश्चित रूप से अब इन ‘नागफनियों’ के सफाये का समय आ गया है। जिसके लिए सारे देश को एकता के सुर निकालने होंगे, और अपनी सेना के साथ खड़ा होगा। कश्मीर कश्मीरियों का होने से पहले भारतीयों का है, सारे भारत के सारे लोगों का इस पर समान अधिकार है। जब किसी देश के किसी प्रांत में गद्दार नंगे नाचने लगें तो उस समय देश के निवासियों का कत्र्तव्य बनता है कि वे इन गद्दारों के सफाये में सरकार और सेना का सहयोग करें।
जिन मूर्खों ने इस देश में धर्म परिवर्तन को बहुत छोटी सी घटना माना है-और उसे अधिक गंभीरता से न लेने की बार-बार वकालत की है उन्हें पता होना चाहिए कि धर्मपरिवर्तन अर्थात धर्मांतरण ही मर्मांतरण का (हृदय परिवर्तन कर पाकिस्तान के गीत गाने का) और मर्मांतरन्ण से राष्ट्रांतरण (नये पाकिस्तान मांगने का) का आधार बनता है। इसलिए स्वामी विवेकानंद जी की यह बात हमें स्मरण रखनी होगी कि जब एक हिंदू का धर्मांतरण किया जाता है तो मानो कि हमने एक शत्रु उत्पन्न कर लिया है जो इस देश की एकता और अखण्डता से खिलवाड़ करेगा। इस देश का इतिहास उठाकर देखिये कभी भी किसी हिंदू राजा ने अपना-अलग देश नही मांगा और न ही अलग देश बनाया। विदेशी मजहब के विदेशी पैरोकारों ने ही ‘जिन्ना’ बन-बनकर इस देश का विभाजन किया कराया है। इन्हीं लोगों ने कश्मीर को भारतभक्तों से मुक्त कराया है और उन्हें अपने ही देश में दर-दर की ठोकरें खाने के लिए विवश किया है। सारा देश पिछले 70 वर्ष से धर्मनिरपेक्ष बना बैठा देखता रहा है और कोई हिन्दूभक्त होने के कारण हमें साम्प्रदायिक ना कह दे, इसलिए कश्मीर की केसर को नागफनी भी बनने दिया है। धर्मनिरपेक्षता की इस मूर्खतापूर्ण धारणा ने हमें मर्मनिरपेक्ष और कर्मनिरपेक्ष बनाकर रख दिया। हमारा धर्म (राष्ट्रभक्ति) मर्म (अपने ही भारतभक्त भाइयों के प्रति असंवेदनशील होना) और कर्म (गद्दारों के प्रति कोई ठोस कार्यवाही नहीं कर पाये) तीनों ही मर गये। फलस्वरूप हमारी भूमि को अर्थात हमारे कश्मीर को विदेशी मजहब छीनने की स्थिति में आ गया। मैं पूछता हूं कि यह खेल अब कब तक चलेगा? हमें जगाना होगा। हमें इतिहास के उन तथ्यों पर ध्यान देना होगा जो गला फाड़-फाडक़र हमें समझा रहे हैं कि देश के जिस कोने में जब-जब हिंदुत्व कमजोर पड़ा और धर्मांतरण के राष्ट्रघाती खेल ने जब-जब और जहां-जहां अपनी रक्तिम होली खेली तब-तब उस-उस क्षेत्र में भारत अपनी अखण्डता की रक्षा करने में असफल रहा। इतिहास के इस तथ्य की उपेक्षा कर करके हमने देश को ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश के रूप में टूटते-टूटते देख लिया है, अब और कब तक देखेंगे? इसलिए कश्मीर से देशद्रोही पत्थरबाजों को भारत छोडऩे और अपने देशभक्त कश्मीरी पंडितों को उनका घर उपलब्ध कराने का समय आया समझकर अपनी सेना के साथ सारे भारत को उठ खड़ा होना होगा। पीत पत्रकारिता में लगे चाटुकारों को इतिहास का सच समझना और समझाना होगा। ध्यान रहे कि हमारे भीतर कभी फूट नहीं रही यदि फूट होती तो भारत के 563 देश स्वतंत्रता से पूर्व ही बन गये होते, पर भारत के सनातन धर्म और सनातन संस्कृति ने इस देश की एकता और अखण्डता की सदा रक्षा की है, इसलिए ही किसी हिंदू राजा ने कभी अलग देश का सपना नही संजोया। जब हमारी संस्कृति और धर्म को भ्रष्ट करने में कुछ लोग सफल हो गये तभी हम देश की एकता और अखण्डता की रक्षा नहीं कर पाये। अपने पराक्रमी स्वभाव के कारण हमने विदेशी शासकों को कभी भी संपूर्ण भारत पर आधिपत्य स्थापित नहीं करने दिया। हम लड़ते रहे विदेशियों को भागने के लिए पत्थरबाजों को समाप्त करने के लिए तो फिर आज हम शांत क्यों रहें?
तनिक विचार कीजिए कि अपने इस पराक्रमी स्वभाव के कारण हम अपने आपको कैसे बचाने में सफल रहे और कैसे धर्मांतरण से राष्ट्रांतरण को भी हमने छाती पर पत्थर रखकर सहन किया है? अपने आपको पहचानो। ये तथ्य निश्चय ही आंखें खोलेंगे, और हम विचार करेंगे कि हमें जिन लोगों ने हजार वर्ष से गुलाम रहने का पाठ पढ़ाया है वे इस देश के कितने बड़े शत्रु रहे हैं? उनकी मूर्खता ने हमारे भीतर अकर्मण्यता की जिस राष्ट्रघाती सोच को पनपाया है-उसके लिए उन्हें कभी क्षमा नहीं किया जा सकता। आइये तथ्यों पर विचार करें।

क्रमश:

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