श्रीकृष्णदास पयहारी ने नाथपंथी संत को शेर से गदहा बनाया

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✍️ डॉ. राधे श्याम द्विवेदी

जाके सिर कर धर्यो तासु कर तर नहीं आद्यो ।
अर्प्यो पद निर्बान सोक निर्भय करि छाड्यो ॥
तेजपुंज बल भजन महामुनि ऊँधरेता ।
सेवत चरणसरोज राय राणा भुवि जेता ॥
दाहिमा बंस दिवसकर उदय संत कमल हय सुख दियो ।
निर्वेद अवधि कलिकृष्णदास अन परिहरी पय पान कियो।।
( भक्तमाल पद संख्या 38 गीता प्रेस)
पयहारी कृष्‍णदास जी गालव-ऋषि आश्रम के प्रसिद्ध संत थे। जयपुर में गलता नाम का एक प्रसिद्ध स्‍थान है, जो गालव-ऋषि का आश्रम “गलता गादी” माना जाता है। आपने आजन्‍म पय (दूध) का ही आहार किया, जिससे आप पयहारीबाबा के नाम से विख्‍यात हैं। आपकी जाति दाहिमा (दाधीच) ब्राह्मण थी। आप बाल ब्रह्मचारी थे। उदासीनता (वैराग्‍य) की तो पयहारी कृष्‍णदास मर्यादा ही थे। भारतवर्ष के छोटे बड़े जितने राजा महाराजा थे, वे सभी आपके श्री चरणों की सेवा करते थे। उन्होंने जिस किसी के शिर पर हाथ रखा उसे बड़ा से बड़ा वरदान दिया।
भगवद्भजन में लवलीन रहना, यही आप का रात-दिन का काम था।

वैष्‍णवद्रोही योगियों को चमत्कारिक छवि प्रस्तुत करना:-
भक्ति आंदोलन के पूर्व देश में विशेषत: राजपूताने में नाथपंथी कनफटे योगियों का बहुत प्रभाव था, जो अपनी सिद्धि की धाक जनता पर जमाए रहते थे। जब सीधे सादे वैष्णव भक्ति मार्ग का आंदोलन देश में चला तब उसके प्रति दुर्भाव रखना उनके लिए स्वाभाविक था। कृष्णदास पयहारी जब पहले पहल गलता पहुँचे, तब वहाँ की गद्दी नाथपंथी योगियों के अधिकार में थी। वे रात भर टिकने के विचार से वहीं धूनी लगाकर बैठ गए। पर कनफटे नाथ पंथियों ने उन्हें उठा दिया। इस पर पयहारीजी ने भी अपनी सिद्धि दिखाई और वे धूनी की आग एक कपड़े में उठाकर दूसरी जगह जा बैठे। कपड़े का न जलना देखकर योगियों के महंथ को बहुत आश्चर्य हुआ। वह बाघ बनकर उनकी ओर झपटा। इस पर पयहारीजी के मुँह से अनायास ये शब्द निकला कि ‘तू कैसा गदहा है?’ वह महंथ तुरंत गदहा हो गया और फिर लाख कोशिश करके अपने बल से मनुष्‍य न बन सका। उस कनफटों की मुद्राएँ उनके कानों से निकल निकल कर पयहारीजी के सामने इकट्ठी हो गईं और वे सब प्रभावहीन होती गई । आमेर के राजा पृथ्वीराज इसकी दुर्दशा नहीं देख पाये। वे आपकी सेवा में जाकर जब बड़ी प्रार्थना की, तब पयहारी बाबा ने अपनी सिद्धियों के बल पर गदहा बने महंथ को फिर आदमी बनाया । आपने गधे को फिर आदमी बनने की इस प्रकार आज्ञा दी कि- “इस जगह को तुम सब छोड़कर अलग रहो और इस आश्रम की धूनी में लकड़ियाँ पहुँचाया करो।” उन सब नाथ पंथियों ने इस शर्त को स्‍वीकार किया ।इन्ही ऋषि ने जिस धूनी पर तपस्या की थी, वो धूनी आज तक यहां जल रही है. वहीं उन्होंने नाथ संप्रदाय को निर्देश दिया था कि उसकी धूनी बुझनी नहीं चाहिए और इसलिए ही नाथ संप्रदाय इस धूनी को जलाये रखता है।राजा पृथ्‍वीराज भी पयहारीजी के शिष्य हो गए और गलता की गद्दी रामानंदी वैष्णवों का अधिकार में पुनः आ गया ।
पयोहारी ऋषि की रहस्यमयी गुफा
यह रहस्यमयी बातें यही नहीं खत्म होती, धाम में पयोहारी ऋषि एक गुफा में रहते हैं, जो धूनी के ठीक सामने है. कहा जाता है कि ये गुफा पाताल तक जाती है और इसके अंदर जो भी गया, वो कभी वापस नहीं लौटा है, इसलिए ही इस गुफा को बंद कर दिया गया है.
बन में गाय के दूध का दिव्य प्रबंध:-
वन में गौएँ श्रीपयहारी जी को आप-से-आप दूध देती थीं।
जब वे कुल्लू के पहाड़ी की एक गुफा में भजन करने लगे तो दूध का प्रबंध नहीं था। वहां ग्वालों के गायों के समूह की एक गाय वहां आ जाती और स्वम दूध देने लगती। बाबा उसे अपने कमंडल में रख लेते और पी जाते। गाय अपने झुंड में रोज चली जाती थी।एक दिन गाय का मालिक ग्वाला गाय को गुफा में जाते देख उसके पीछे चला आया। उसने बाबा का दर्शन कर गाय को बहुत धन्यवाद दिया।बना ने उसे वरदान मांगने को कहा तो उसने अपने राजा का खोया राज वापस करने को कहा। ग्वाले के माध्यम से राजा आया और विना प्रयास के बाबा की कृपा से अपना राज वापस पा लिया। कुल्लू राज के लोग बाबा के भक्त बन गए।
कुल्लू राजा के बेटे को जीवनदान दिया:-
एक बार पुजारी भगवान का भोग लगाने के लिए जिलेबी लेकर जा रहा था।एक गिरा टुकड़ा राजकुमार ने खा लिया। बिना भोग लगे खाने पर राजा ने तलवार तानकर बच्चे को मारना चाहा। पयहारी बाबा ने बच्चे को बचा लिया।और अपना शिष्य बना लिया। वह बहुत धर्मनिष्ट भगवद भक्त बन गया। पयहारी बाबा ने आमेर की एक गणिका को भी उपदेश दिया था, जिसने परम गति पायी।
चमत्कारिक श्रीद्वारकाधीश के दर्शन का प्रसंग :-
कहते हैं कि एक समय राजा पृथ्‍वीराज जी ने पयहारी जी से श्रीद्वारकाधीश के दर्शन करने के लिये द्वारका चलने की प्रार्थना की। तब आपने राजा की भक्ति देख अपनी यो‍ग-सिद्धि से आधी रात के समय राजमहल में प्रकट हो राजा को श्रीद्वारकाधीश के दर्शन वहीं करा दिये। फिर राजा ने द्वारका चलने को कभी नहीं कहा–
कृष्‍णदास कलि जीति, न्‍यौति नाहर पल दीयो।
अतिथि धर्म प्रतिपालि, प्रकट जस जग में लीयो।।
उदासीनता अवधि, कनक कामिनि नहिं रातो।
राम चरन मकरंद रहत निसि दिन मद-मातो।।
गलतें गलित अमित गुन, सदाचार, सुठि नीति।
दधीचि पाछें दूसरि करी कृष्‍णदास कलि जीति।।
अपने शरीर का दान:-
जैसे दधीचि ऋषि ने देवताओं के माँगने से अपना शरीर दे दिया, ऐसे ही दधीचि-गोत्र में उत्‍पन्‍न स्‍वामी श्रीकृष्‍णदास पयहारी जी ने कलिकाल को जीतकर दधीचि की तरह दूसरी बार अपना शरीर बाघ को खाने के लिए दे दिया था। एक समय पयहारी कृष्‍णदास की गुफा के सामने बाघ आया तो आपने उसको अतिथि जान, नेवता देकर आतिथ्‍य धर्म-प्रतिपालन पूर्वक अपना पल (मांस) काटकर दिया।धर्म पालन देख रामजी ने उनके शिर पर अपना हाथ रखा तो पायहारी जी पुनः पूर्ववत शरीर प्राप्त कर लिए।
इस प्रकार के प्रसिद्ध यश को आप जग में प्राप्‍त हुए।
संसारिक्ता से दूर रहे:-
उदासीनता (वैराग्‍य) की तो पयहारी कृष्‍णदास मर्यादा ही थे। इस संसार सागर में जो कनक-कामिनी रूप दो भँवर सबको डुबा देने वाले हैं, उन दोनों के रंग से आप नहीं रँगे। केवल श्रीरामचरण कमल के अनुराग रूपी मकरन्‍द से भ्रमर के सदृश मदमत्त-आनन्दित रहते थे। संतों के अमित दिव्‍य गुणों से गलित अर्थात परिपक्‍व, सदाचार एवं सुन्‍दर नीतियुक्त, ‘गलते’ गादी में आप विराजमान हुए।
उत्तर तोताद्रि’ की रामानंदी गद्दी:-
अनंतानंदजी के शिष्य कृष्णदास पयहारी जी ने गलता में रामानंद संप्रदाय की गद्दी स्थापित की। यही पहली और सबसे प्रधान गद्दी हुई। रामानुज संप्रदाय के लिए दक्षिण में जो महत्व तोताद्रि का था वही महत्व रामानंद संप्रदाय के लिए उत्तर भारत में गलता को प्राप्त हुआ। यह ‘उत्तर तोताद्रि’ कहलाया।
भक्त पारायण शिष्योंकी लम्बीसूची : –
कील्ह अगर केवल चरनब्रत हठी नारायण ।
सूरज पुरुष पृथु त्रिपुर हरिभक्ति परायण॥
पद्मनाभ गोपाल टेक टीला गदाधारी।
देवा हेम कल्याण गंगा गंगासम नारी॥
विष्णुदास कन्हर रंगा चाँदन सबिरी गोबिन्द पर।
पहाड़ी परसाद तेन सिश्य सबै भाए पारकर ॥
( भक्तमाल पद संख्या 39 गीता प्रेस)

(लेखक सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद पर कार्य कर चुके हैं। वर्तमान में साहित्य, इतिहास, पुरातत्व और अध्यात्म विषयों पर अपने विचार व्यक्त करते रहते हैं।)

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