“ईश्वर की उपासना का फल मनुष्य को जीवन में शीघ्र मिलता है”

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हमें आज दिनांक 27-11-2022 को आर्यसमाज राजपुर, देहरादून के तीन दिवसीय वार्षिकोत्सव के समापन समारोह में उपस्थित होने का अवसर मिला। आयोजन का आरम्भ प्रातः यज्ञ से हुआ। यज्ञ में आचार्या डा. अन्नपूर्णा जी, आचार्य विष्णुमित्र वेदार्थी, आचार्य प्रदीप शास्त्री, श्री प्रेमप्रकाश शर्मा आदि ऋषिभक्त उपस्थित थे। यज्ञ की समाप्ति के बाद एक बड़े पण्डाल में भजन एवं उपदेशों का आयोजन किया गया। आज के आयोजन की विशेषता आशा के अनुरूप बड़ी संख्या में श्रोताओं की उपस्थिति थी। आरम्भ में फरीदाबाद से पधारे युवा भजनोपदेशक आचार्य प्रदीप शास्त्री जी के भजन हुए। उनके द्वारा प्रस्तुत पहले भजन के बोल थे ‘सुख धाम सदा तेरा नाम सदा कोई तुझसा और महान नहीं।’ आचार्य प्रदीप जी ने कहा कि ईश्वर का नाम दयालु इस लिए है कि परमात्मा की दया सबके ऊपर है। उन्होंने कहा कि दया और कृपा में अन्तर होता है। इसके उन्होंने उदाहरण भी दिए। उन्होंने कहा कि परमात्मा ने उसकी अवज्ञा करने वालों तथा उसे न मानने वालों को भी सृष्टि के सब पदार्थ दे रखे हैं। प्रदीप जी ने कहा कि भक्ति का अर्थ परमात्मा की आज्ञाओं का पालन करना है। भक्ति करने से भक्त का जीवन पवित्र बनता है। आचार्य प्रदीप शास्त्री जी ने दूसरा भजन सुनाया जिसके बोल थे ‘प्रभु के गीत गाने में भला है, लगन दिल से लगाने में भला है, मधुर नगमें सुनाने में भला है, साज दिल के इन तारों को मिलाकर मधुर नगमें सुनाने में भला है।’ आचार्य प्रदीप जी ने कवि प्रदीप द्वारा गाई गई ऋषिगाथा का एक अंश भी प्रस्तुत किया। उन्होंने ऋषि गाथा का आरम्भ ‘गुरु बोले सुनो दयानन्द मैं हृदय खोलता हूं जिस बात ने मुझे रूलाया वो बात बोलता हूं।’ से किया। समारोह में चौथा भजन प्रस्तुत किया गया जिसके बोल थे ‘गुरुदेव प्रतिज्ञा है मेरी पूरी करके दिखला दूंगा। इस वैदिक धर्म की वेदी पर मैं जीवन भेंट चढ़ा दूगां।’ सभी भजन बहुत ही सुन्दर रीति से प्रस्तुत किये गये जिसका सभी श्रोताओं ने भरपूर आनन्द लिया। कार्यक्रम का संचालन आर्यसमाज-राजपुर के प्रधान श्री प्रेम प्रकाश शर्मा जी ने अत्यन्त उत्तम रीति से किया।

आर्यजगत के शीर्ष विद्वान आचार्य विष्णुमित्र वेदार्थी जी ने अपने सम्बोधन में एक माताजी के कुछ प्रश्नों का समाधान किया। पहला प्रश्न मांसाहार पर था। इस प्रश्न का समाधान विद्वान आचार्य जी ने किया। प्रश्न था कि परमात्मा ने हिंसा करने वाले प्राणियों को पैदा ही क्यों किया? आचार्य जी ने इस प्रश्न के समाधान में पूर्वजन्मों के कर्मसमुच्चय ‘प्रारब्ध’ की चर्चा की और बताया कि इस शब्द का अर्थ होता है जो शुरू हो चुका हो। आचार्य जी ने प्रारब्ध कर्मों पर प्रकाश डाला। आचार्य जी ने कहा कि प्रारब्ध के तीन रूप हैं। तीन रूपों में कर्म फल मिलता है। ये हैं 1- जाति, 2- आयु और 3- भोग। आचार्य जी ने बताया कि जाति कर्मों के आधार पर मिलती है। मनुष्य जाति, पशु जाति, पक्षी जाति आदि जातियां कहलाती हैं। आयु, मनुष्यों के पृथक पृथक जीवन काल को कहते हैं। आचार्य जी ने बताया कि भोग मनुष्यों को कर्मों के अनुरूप प्राप्त होने वाले सुख व दुःख को कहते हैं। उन्होंने कहा कि कर्म मनुष्य द्वारा किया जाता है परन्तु उन कर्मों के फलों की व्यवस्था परमात्मा की होती है। आचार्य विष्णुमित्र वेदार्थी जी ने कहा कि उपासना का फल मनुष्यों को इसी जीवन में अति शीघ्र मिलता है। आचार्य जी ने अपने सम्बोधन में आधिदैविक, आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक सुख व दुःखों को चर्चा भी की। उन्होंने कहा कि हम जो करते हैं उसी के अनुरूप सुख व दुःखों को भोगते हैं। माता व पिता से हमें जो सुख व दुःख मिलते हैं वह भी हमारे कर्मों का परिणाम होते हैं। परमात्मा पाप कर्म करने वाले मनुष्यों को निम्न प्राणी योनियों में भेजकर उनका सुधार करते हैं। आचार्य जी ने यह भी बताया कि जो तपस्वी नहीं होते उसे योग सिद्ध नहीं होता। उन्होंने कहा कि ऋषि उत्कृष्ट विद्वान को कहते हैं। आचार्य जी ने ऋषि शब्द के अनेक अर्थो एवं उनकी योग्यताओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ऋषियों को भूत, वर्तमान सहित भविष्य में होने वाली घटनायें दिखाई देती हैं। आचार्य जी ने श्रोताओं को बताया कि परमात्मा प्रदत्त विस्मृति का आवरण कल्याणप्रद है। आचार्य जी ने वृक्षों में जीवों के होने और उन वनस्पतियों के भक्षण से होने वाले आभाषित पाप संबंधी शंका का समाधान भी किया। आचार्य जी ने कहा कि सुषुप्ति एवं समाधि अवस्थाओं में हम स्वप्न नहीं लेते। आचार्य जी ने महिला श्रोता के सभी प्रश्नों का विस्तृत उत्तर देने के बाद पूछा कि क्या श्रोता का समाधान हुआ है या नहीं? श्रोता ने कहा कि उनका समाधान हो गया है और वह सन्तुष्ट हैं।

आयोजन में उपस्थित ऋषिभक्त एवं वेद प्रचारक श्री सत्यपाल आर्य जी ने भक्ति रस में भर कर एक भजन प्रस्तुत किया जिसके बोल थे ‘ज्ञान का सागर चार वेद ये वाणी है भगवान की, इसी से मिलती सब सामग्री जीवन के कल्याण की।’

वेद-विदुषी आचार्या डा. अन्नपूर्णा जी ने अपने सम्बोधन को गायत्री मन्त्र का उच्चारण करवाकर आरम्भ किया। उन्होंने सभी श्रोताओं को ईश्वर के कर्मों को देखने की प्रेरणा की। उन्होंने बताया कि ईश्वर का निज एव मुख्य नाम ओ३म् है। उन्होंने कहा नाम गुण, कर्म व स्वभाव के आधार पर ही होता है, ऐसा ही परमात्मा का नाम ओ३म् है। आचार्या जी ने कहा ईश्वर सर्वव्यापक है। वह सब कुछ देख रहा है। उन्होंने कहा कि जो मनुष्य पाप करता है ईश्वर उसे रुलाता है। इसीलिए ईश्वर का नाम रुद्र है। आचार्या जी ने कहा ज्ञान चार प्रकार का होता है 1- अभावात्मक ज्ञान, 2- भ्रमात्मक ज्ञान, 3- संशयात्मक ज्ञान तथा 4- निश्चयात्मक ज्ञान। आचार्या जी ने इन चारों पर विस्तार से प्रकाश भी डाला। आचार्या जी ने कहा कि दूसरों को दुःख देने वाले संसार में कभी सुखी नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि परमात्मा हमारा अनादि युवा सखा एवं मित्र है। वह सबका योग्य सखा है। ईश्वर पर हम भरोसा करेंगे तो हमें धोखा नहीं होगा। अपने सम्बोधन को विराम देते हुए उन्होंने कहा कि जिसके जीवन में तेज है वही संसार में बलवान है। इसके बाद आर्यसमाज राजपुर, देहरादून के उत्साही मंत्री श्री ओम्प्रकाश महेन्द्रू जी ने समाज की वार्षिक प्रगति रिर्पोट को पढ़कर सुनाया।

अपने सम्बोधन में देहरादून के विख्यात विद्वान 81 वर्षीय श्री उम्मेद सिंह विशारद जी ने श्रोताओं को ऋषि के ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश सहित अन्य सभी ग्रन्थों एवं ऋषि के जीवन चरित को पढ़ने की प्रेरणा की। स्थान स्थान पर शिविर लगाकर वैदिक धर्म का प्रचार करने वाले श्री विजय पाल आर्य जी ने भी समारोह में अपने विचार प्रस्तुत किये। उन्होंने कहा कि सार्वदेशिक सभा के प्रदान श्री सुरेश अग्रवाल आर्य जी ने आर्यसमाज को नारा दिया है ‘गले लगाओं तथा रिश्ते बनाओं’। इस पर उन्होंने विस्तार से प्रकाश डाला। सभा में आर्य प्रतिनिधि सभा, उत्तराखण्ड के प्रधान श्री मानपाल सिंह आर्य जी का सम्बोधन भी हुआ। सभा के पूर्व प्रधान श्री गोविन्द सिंह भण्डारी जी लगभग 400 किमी. की यात्रा करके वागेश्वर से देहरादून उत्सव में भाग लेने पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि ऋषि दयानन्द के गुरु स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी ने उन्हें समाज को बदलने तथा वैदिक समाज व देश बनाने की प्रेरणा की थी। उन्होंने कहा कि ऋषि दयानन्द ने सामाजिक क्रान्ति की और वैदिक आर्य समाज का निर्माण किया। हमारा देश सदैव ऋषि दयानन्द का ऋणी रहेगा। इसके पश्चात द्रोणस्थली कन्या गुरुकुल की कन्याओं ने एक समूह गान प्रस्तुत किया। कार्यक्रम अत्यन्त सफल रहा। उपस्थिति उत्साहवर्धक थी। समाज के सदस्यों व अधिकारियों ने उत्सव को सफल बनाने के लिए सराहनीय प्रयास किए। सभी बधाई के पात्र हैं। कार्यक्रम की समाप्ति के बाद सभी ने ऋषि लंगर का आनन्द लिया। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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