पुस्तक समीक्षा : ईशादि नौ उपनिषद ( काव्यानुवाद )

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ऐतरेय उपनिषद भी अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण उपनिषद है।इस उपनिषद् में तीन अध्याय हैं। प्रथम अध्याय में यह स्पष्ट किया गया है कि सृष्टि के आरम्भ में केवल एक आत्मा ही था, उसके अतिरिक्त और कुछ नहीं था। उसने लोक-रचना के लिये ईक्षण (विचार) किया। ईक्षण एक प्रकार का उच्चतम कोटि का तप है। इस ईक्षण शब्द से ही ईख शब्द बन गया है। जैसे ईख से रस निकल कर गुड़, शक्कर, चीनी आदि बनते हैं और वह एक इन विभिन्न रूपों में आने से पहले एक तप की भट्टी से निकलता है, वैसे ही ईक्षण का अर्थ लेना चाहिए। इस उपनिषद में स्पष्ट किया गया है कि परमपिता परमेश्वर के ईक्षण लोकपालों की रचना हुई। तीनों लोकों की रचना भी परमपिता परमेश्वर के संकल्प से हुई।
डॉ मृदुल कीर्ति ने ज्ञान विज्ञान के रहस्यों से भरे इस ऐतरेय उपनिषद की व्याख्या करने में भी अपनी पवित्र लेखनी का चमत्कार प्रकट किया है। डॉ. कीर्ति ने अपनी अद्भुत प्रतिभा से उद्भूत शब्दों के माध्यम से प्रकट किया है कि परमात्मा के संकल्प से ही उस विराट् पुरुष इन्द्रिय गोलक और इन्द्रियाधिष्ठाता देव उत्पन्न हो गये। जब वे इन्द्रियाधिष्ठाता देवता इस महासमुद्र में आये तो परमात्माने उन्हें भूख-प्यास से युक्त कर दिया। तब उन्होंने प्रार्थना की कि हमें कोई भी ऐसा आयतन अर्थात शरीर प्रदान किया जाय जिसमें स्थित होकर हम अन्न-भक्षण कर सकें। परमात्मा ने उनके लिये गौ का शरीर प्रस्तुत किया, किन्तु उन्होंने ‘यह हमारे लिये पर्याप्त नहीं हैं ‘ऐसा कहकर उसे अस्वीकार कर दिया। तत्पश्चात् घोड़े का शरीर लाया गया किन्तु वह भी अस्वीकृत हुआ। अन्त में परमात्मा ने उनके लिए मनुष्य का शरीर लाया।उसे देखकर सभी देवताओं ने एक स्वर में उनका अनुमोदन किया और वे सब परमात्मा की आज्ञा से उसके भिन्न-भिन्न अवयवों में वाक्, प्राण, चक्षु आदि रूपसे स्थति हो गये। फिर उनके लिये अन्नकी रचना की गयी। अन्न देखकर भागने लगा। अस्तु।
ऐतरेय उपनिषद के माध्यम से हमें पता चलता है कि जीव के तीन जन्म माने गये हैं- वीर्यरूप से माता की कुक्षि में प्रवेश करना, बालकरूप से उत्पन्न होना और पितानका मृत्यु को प्राप्त होकर पुनः जन्म ग्रहण करना। ऐतरेय उपनिषद के प्रथम खंड का आरंभ किस प्रकार होता है :-

आत्मा इदमेक नान्यत्किंचन मिषत | सक्षत लोकान्नू सृजा इति ।।1.1.1 ।।

इसका अर्थ है कि प्रारम्भ में, यहाँ अकेले आत्मा ही विद्यमान था, और कुछ नहीं, जो कुछ भी, पलक झपकते आत्मा ने सोचा, “मुझे संसार बनाने दो”।
डॉ. कीर्ति इसका पद्यानुवाद करते हुए लिखती हैं कि :-

ब्रह्मांड के अस्तित्व पूर्व तो एक मात्र ही ब्रह्म था,
परब्रह्म प्रभु के अन्यथा कोई चेष्टारत न गम्य था।
तब सृष्टि रचना का आदि सृष्टि में ब्रह्म ने निश्चय किया,
अथ इस विचार के तदनुसार ही कर्म फल निर्णय किया।

परमपिता परमेश्वर ने लोकपालों की नियुक्ति की ,इसको डॉ कीर्ति ने अपने इन शब्दों में प्रस्तुत किया है :-

सब लोकों की रचना अनंतर ब्रह्म ने चिंतन किया ,
लोक पालों की सर्जना व महत्व का भी मनन किया।
अतः ब्राह्मण ने स्वयं जल से ब्रह्मा की उत्पत्ति की,
अथ हिरण्यगर्भा रूप ब्रह्मा मूर्तिमान की कृति की।

परमपिता परमेश्वर ने किस प्रकार देवताओं को मानव शरीर प्रदान किया ? इस पर डॉ कीर्ति ने ऐतरेय उपनिषद के ऋषि के चिंतन को अपने शब्दों में इस प्रकार पिरोने का प्रशंसनीय कार्य किया है :–
तब देवताओं को ब्रह्म ने मानव शरीर की सृष्टि की,
यह सुकृति देवों को रुचि प्रभु ने क्रिया की दृष्टि की।
तुम अपने योग्य के आश्रयों में देवताओ प्रविष्ट हो ,
मानव शरीर ही श्रेष्ठ रचना सकल रचना विशिष्ट हो।

अपनी अद्भुत, सरल परन्तु गंभीर शैली के लिए प्रख्यात डॉ कीर्ति की लेखनी भी कीर्ति की पालक हो चुकी है। उन्हें यश की चाह नहीं है, परंतु कीर्ति है कि जो अपने आप बिखरती जा रही है, फैलती जा रही है दिग दिगंत में।

दूसरे अध्याय में कहा गया है कि एक व्यक्ति के तीन जन्म होते हैं। इसका पहला मंत्र पहले जन्म की बात करता है:-

पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति । यदेतद्रेत: तदेत सर्वेभ्योഽङ्गेभ्यस्तेज: संभूतम् आत्मन्येवात्मानं बिभर्ति; तद्यदा स्त्रियां सिन्चतिथैनज्ज्यति तदस्य प्रथमं जन्म ।।

अर्थ: पहला गर्भाधान (किसी व्यक्ति का) पुरुष में होता है, शुक्राणु (वीर्य) के रूप में जिसमें उसके शरीर के सभी सदस्यों का सार होता है। वह इसे अपने भीतर धारण करता है (यही अवधारणा है)। जब वह अपने वीर्य को स्त्री में डालता है, (ऐसा कहा जाता है) वह उसे बचाता है; यह पहला जन्म है।
इस पर डॉक्टर कीर्ति का चिंतन इस प्रकार प्रकट होता है :-

अति अति प्रथम यह जीवन गर्भ में वीर्य का ही रूप है,
धारक पिता के स्वरूप गर्भ में, वीर्य का भी स्वरूप है।
यह पुरुष तन में जो वीर्य है, यह सकल अंगों का सार है,
आत्म संचय फिर नारी सिंचन, प्रथम जन्म आधार है।

कोई भी पुत्र अपने पिता का प्रतिनिधि होता है। उसके गुण ,कर्म, स्वभाव भी ऐसा प्रकट करते हैं । ऐतरेय उपनिषद की इस अत्यंत पवित्र भावना का प्रतिनिधित्व डॉ कीर्ति के यह शब्द करते हैं :-

यह पुत्र है प्रतिनिधि पिता का पुण्य कर्मों को करे,
जिसके ही लौकिक दिव्य कर्मों से पिता और कुल भी तरे।
पिता के कर्तव्य पूर्ण व, आयु भी जब से शेष हो,
उपरांत जो भी पुनर्जन्म हो, तृतीय जन्म प्रवेश हो।

‘आत्मा वै पुत्रनामासि’ (कौषी) ( 2। 11) इस श्रुति के अनुसार पिता और पुत्र का अभेद है; इसीलिये पिता के पुनर्जन्म को भी पुत्र का तृतीय जन्म बतलाया गया है।

किसी भी गृहिणी के लिए उपनिषद जैसे गूढ़ ज्ञान और रहस्यों से भरे शास्त्रों की व्याख्या करना बड़ा दुष्कर कार्य है। जहां थोड़ी सी भी व्याख्या इधर उधर हुई तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है। तब यश के स्थान पर अपयश का पात्र बनना पड़ता है। विद्वानों की सभा में चर्चाएं विपरीत दिशा में होने लगती हैं। डॉ कीर्ति की मेहनत, लगन और कर्तव्य कर्म के प्रति अटूट निष्ठा का ही परिणाम है कि उन्हें इस प्रकार की किसी विषमता का सामना नहीं करना पड़ा। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि वैश्विक वैदिक विद्वतमण्डल में भी उनकी बात को कितना सराहा गया है? उन्हें कितनी मान्यता मिली है?
जिस किसी को भी अपने वेदों और उपनिषदों के प्रति आत्मिक लगाव है वह डॉ मृदुल कीर्ति की ‘ ईशादि नौ उपरिषद’ पुस्तक का रसास्वादन अवश्य ही लेगा।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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