भारतीय संस्कृति में वटवृक्ष की महत्ता

images (40)

पूनम नेगी

भारतीय संस्कृति में वट वृक्ष को विशेष महत्व प्राप्त है। इस वृक्ष को प्रकृति के सृजन का और चैतन्य सत्ता प्रतीक माना जाता है। आयुर्वेद में भी वटवृक्ष को आरोग्य प्रदाता माना गया है। विभिन्न शोधों से यह साबित हो चुका है कि प्रचुर मात्रा में प्राणवायु (आक्सीजन) देने वाला यह वृक्ष मनों-मस्तिष्क को स्वस्थ रखने व ध्यान में स्थिरता लाने में सहायक है

वृक्षों-वनस्पतियों के प्रति जो श्रद्धाभाव भारतीय संस्कृति में दिखता है, वैसा अन्यत्र कहीं नहीं। हमारे मनीषियों को इन वृक्षों के प्रति एक अनूठी आत्मीयता का एहसास हुआ और उन्होंने प्रकृति की इस सुरम्य कोख में वेद-वेदांगों, उपनिषदों आदि की रचना कर समूचे भारतीय ज्ञान-विज्ञान की आधारशिला रखी थी। भारतीय ऋषियों ने अपने शोधों में पाया था कि वृक्षों में विराट विश्व एवं प्रकृति की विराटता का कोमल एहसास है तथा धरती के प्रत्येक वृक्ष व वनस्पति में प्रकृति की एक अनुपम शक्ति छिपी है। यही गुण-धर्म उन्हें देवत्व प्रदान करते हैं।
हमारी इस अनमोल वृक्ष सम्पदा में अन्यतम है वट वृक्ष। अपनी विराटता, सघनता, दीर्घजीविता व आरोग्यप्रदायक गुणों के कारण इसे ‘कल्प वृक्ष’ की संज्ञा दी गई है। ‘समय’ का समरूप है वट वृक्ष। जिस तरह समय वर्तमान में हमारे सामने रहते हुए भी अतीत को पीछे छोड़े भविष्य की ओर सतत बढ़ता रहता है; ठीक वैसे ही वटवृक्ष प्रत्यक्ष में हमारे सामने खड़े रहकर भी न जाने कब से पृथ्वी में बहुत गहरे अपनी जड़ें जमाए एक के बाद एक शाखाओं को और उससे विकसित जड़ों को पृथ्वी में स्तंभ के रूप में गाड़ते हुए भूत से भविष्य की यात्रा करता जाता है। सनातन दर्शन में वटवृक्ष को तपोवन की मान्यता यूं ही नहीं दी गई है। यह वृक्ष अपने असीमित विस्तार में अपने चारों ओर इतना व्यापक घेरा बना लेता है कि अपने शरणागत को किसी जंगल-सा आभास देता है। कहा जाता है कि भारत पर आक्रमण करने आए सिकंदर की सात हजार सैनिकों वाली सेना को जब एक बार बारिश से बचने की जरूरत पड़ी तो उसे एक विशाल बरगद के नीचे ही शरण मिली। वे विदेशी सैनिक यह देखकर बेहद अचरज में पड़ गए कि जहां वे खड़े थे, वह कोई जंगल नहीं बल्कि एक ही पेड़ का घेरा था!

समूचे देश में अनेक प्रसिद्ध वटवृक्ष हैं किंतु इनमें प्रयाग के अक्षयवट, गया के बोधिवट, वृंदावन के वंशीवट तथा उज्जैन के सिद्धवट के प्रति हिंदू धर्मावलंबी विशेष आस्था रखते हैं। प्रयाग में त्रिवेणी के तट पर अवस्थित अक्षय वट हिंदुओं ही नहीं; जैन व बौद्ध की भी आस्था का केंद्र है। गोस्वामी तुलसीदास भी इस वटवृक्ष का गुणानुवाद करना नहीं भूले। कुरुक्षेत्र के निकट ज्योतिसर स्थित वटवृक्ष के बारे में माना जाता है कि यह कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए गीता के उपदेश का साक्षी है। इसी तरह श्राद्ध तीर्थ गया में भी एक सर्व सिद्धिदायक वटवृक्ष है

अनंत जीवन का प्रतीक
बरगद को अमरत्व, दीर्घायु और अनंत जीवन के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है। यही वजह है कि प्राचीन काल में हमारे ऋषि-मुनियों ने इसकी छाया में बैठकर दीर्घकाल तक तपस्या की थी। अब तो विभिन्न शोधों से भी साबित हो चुका है कि प्रचुर मात्रा में प्राणवायु (आक्सीजन) देने वाला यह वृक्ष मनो-मस्तिष्क को स्वस्थ रखने व ध्यान में स्थिरता लाने में सहायक होता है। महात्मा बुद्ध को इसी वृक्ष के नीचे संबोधि (आत्मज्ञान) प्राप्त हुआ था। बौद्ध धर्मग्रन्थों के अनुसार इस ज्ञान की प्राप्ति के बाद उनका अंतस बोधि वृक्ष के प्रति कृतज्ञता से भर गया। बोधगया के महाबोधि मन्दिर का वट वृक्ष आज भी तथागत की महान तपस्या का मूक साक्षी है। कहा जाता है कि तमाम आक्रांताओं ने कई बार इस पवित्र वृक्ष को नष्ट करने का प्रयास किया लेकिन हर ऐसे प्रयास के बाद बोधि वृक्ष फिर से पनप गया। बोधगया के महाबोधि मंदिर के परिसर में स्थित इस प्राचीन वृक्ष की नियमित जांच व संरक्षण में लगे देहरादून वन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों के मुताबिक महाबोधि वृक्ष आज भी पूर्ण स्वस्थ है। गौरतलब है कि यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शुमार इस पवित्र महाबोधि वृक्ष को देखने के लिए हर साल देश-विदेश से लाखों पर्यटक बोधगया आते हैं।
वृक्षों में चैतन्य सत्ता का वास
ध्यातव्य है कि भारत के महान वनस्पति विज्ञानी डॉ. जगदीशचन्द्र बसु ने अपने यांत्रिक प्रयोगों से यह साबित कर दिखाया था कि हम मनुष्यों की तरह वृक्षों में भी चैतन्य सत्ता का वास होता है। उनका यह शोध भारतीय संस्कृति की वृक्षोपासना की महत्ता को साबित करता है। वट वृक्ष हमें इस परम हितकारी चिंतनधारा की ओर ले जाता है कि हमें किसी भी परिस्थिति में अपने मूल से नहीं कटना चाहिए और अपना संकल्प बल व आत्म सामर्थ्य को सतत विकसित करते रहना चाहिए। सनातन दर्शन में वट वृक्ष की महत्ता प्रतिपादित करते हुए कहा गया है-‘जगत वटे तं पृथुमं शयानं बालं मुकुंदं मनसा स्मरामि।’ अर्थात् प्रलयकाल में जब सम्पूर्ण पृथ्वी जलमग्न हो गई तब जगत पालक श्रीहरि अपने बालमुकुंद रूप में उस अथाह जलराशि में वटवृक्ष के एक पत्ते पर निश्ंिचत शयन कर रहे थे। सनातन धर्म की मान्यता है कि वट वृक्ष प्रकृति के सृजन का प्रतीक है। अकाल में भी नष्ट न होने के कारण इसे ‘अक्षय वट’ कहा जाता है। स्वयं त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) इसकी रक्षा करते हैं। वट वृक्ष की अभ्यर्थना करते हुए वैदिक ऋषि कहते हैं- मूले ब्रह्मा त्वचा विष्णु शाखा शंकरमेव च। पत्रे पत्रे सर्वदेवायाम् वृक्ष राज्ञो नमोस्तुते।। ‘अर्थात् हम उस वट देवता को नमन करते हैं जिसके मूल में चौमुखी ब्रह्मा, मध्य में भगवान विष्णु और अग्रभाग में महादेव शिव का वास है।’
वट वृक्ष की उत्पत्ति यक्षों के राजा मणिभद्र से मानी जाती है। इसीलिए इसे ‘यक्षवास’, ‘यक्षतरु’ व ‘यक्षवारूक’ आदि नामों से पुकारा जाता है। यों तो समूचे देश में अनेक प्रसिद्ध वटवृक्ष हैं किंतु इनमें प्रयाग के अक्षयवट, गया के बोधिवट, वृंदावन के वंशीवट तथा उज्जैन के सिद्धवट के प्रति हिंदू धर्मावलंबी विशेष आस्था रखते हैं। प्रयाग में त्रिवेणी के तट पर अवस्थित अक्षय वट हिंदुओं ही नहीं; जैन व बौद्ध की भी आस्था का केंद्र है। कहा जाता है कि महर्षि भारद्वाज ने इसी अक्षयवट की छाया में पावन रामकथा का गान किया था। गोस्वामी तुलसीदास भी इस वटवृक्ष का गुणानुवाद करना नहीं भूले। इसी तरह महात्मा बुद्ध ने प्रयाग के अक्षय वट का एक बीज कैलाश पर्वत पर बोया था। इसी तरह जैनियों का मानना है कि उनके तीर्थंकर ऋषभदेव ने प्रयाग के अक्षय वट के नीचे तपस्या की थी। इस स्थान को ऋषभदेव की तपोस्थली के नाम से जाना जाता है। कुरुक्षेत्र के निकट ज्योतिसर नामक स्थान पर भी एक वटवृक्ष है जिसके बारे में ऐसा माना जाता है कि यह भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए गीता के उपदेश का साक्षी है। इसी तरह श्राद्ध तीर्थ गया में भी एक सर्व सिद्धिदायक वटवृक्ष है। कथानक है कि इसका रोपण ब्रह्मा ने स्वर्ग से लाकर किया था। बाद में जगद्जननी सीता के आशीर्वाद से अक्षयवट की महिमा जग विख्यात हुई।
आयुर्वेद में वटवृक्ष को आरोग्य प्रदाता माना गया है। आचार्य चरक के अनुसार वटवृक्ष के नियमित दर्शन, पूजन, स्पर्श व परिक्रमा से आरोग्य की वृद्धि होती है। उन्होंने वटवृक्ष को शीतलता-प्रदायक, सभी रोगों को दूर करने वाला तथा विष-दोष निवारक बताया है। इस वृक्ष पर अनेक जीव-जंतुओं व पशु-पक्षियों का जीवन निर्भर रहता है। पर्यावरण प्रदूषण को दूर करने में भी इसकी अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla İpek Kirpik
hititbet giriş
hititbet
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
betyap giriş
hititbet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti güncel giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
betkom giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
betpas giriş
betpas giriş
betkom giriş
betpas giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet
betgaranti giriş
betgaranti güncel giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betgaranti güncel giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
xslot giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vdcasino
vdcasino
vdcasino
vdcasino
hititbet giriş
kolaybet giriş
betkom giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
meritbet giriş
meritbet giriş