वैदिक साधन आश्रम तपोवन ग्रीष्मोत्सव का दूसरा दिन- “बिना तप किये किसी क्षेत्र में सफलता प्राप्त नहीं होतीः साध्वी

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ओ३म्

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वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून के ग्रीष्मोत्सव के दूसरे दिन आज प्रातः 6.30 बजे अथर्ववेद पारायण यज्ञ हुआ। यज्ञ चार वेदियों में किया गया। सभी वेदियों में अनेक यजमानों ने उपस्थित होकर घृत एवं साकल्य की आहुतियां दीं। यज्ञ के ब्रह्मा ऋषि भक्त विद्वान स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी थे। व्याख्यान वेदी स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती, साध्वी प्रज्ञा जी, पं. सूरतराम शर्मा, भजनोपदेशक श्री रमेशचन्द्र स्नेही, मंत्र-पाठी गुरुकुल के दो ब्रह्मचारी तथा प्रसिद्ध आर्य भजनोपदेशक श्री कुलदीप आर्य जी से सुशोभित हो रही थी। यज्ञ करते हुए किसी सूक्त के समाप्त होने पर स्वामी चित्तेश्वरानन्द सूक्त में आये मन्त्रों के आधार पर उपदेश करते थे। एक स्थान पर उन्होंने कहा कि हमारा यह शरीर सदा से हमारे पास नहीं है। परमात्मा जीव को जन्म देकर उसे माता-पिता की गोद में बैठाता है। हम जहां जन्म लेते हैं उसी परिवार या बिरादरी तथा उसकी परम्पराओं को मानने वाले बन जाते हैं। स्वामी जी ने कहा कि सौभाग्यशाली वह लोग हैं जो अपने कल्याण के कार्यों यज्ञ, दान व परोपकार आदि में लगे हुए हैं। ईश्वर की कृपा सभी मनुष्यों को मिलती है जिससे हमें पूरा लाभ उठाना चाहिये।

स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी ने कहा कि हमें अपने गुरुजनों से ज्ञान मिला है। इसके लिए हमें उनका आदर व सम्मान करना है। स्वामी जी ने कर्मों को सम्भल कर करने की प्रेरणा की। स्वामी जी ने बताया कि नरक दुःख भोगने को कहते हैं। उन्होंने कहा कि प्रत्येक मनुष्य को ईश्वर के गुण, कर्म तथा स्वभाव सहित उसके उपकारों का ध्यान करना चाहिये जिसे हम प्रायः करते नहीं है। यज्ञ की समाप्ति पर स्वामी जी ने सामूहिक प्रार्थना कराई। उन्होने सबकी ओर से परमात्मा का धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि हमारा यह अथर्ववेद पारायण यज्ञ परमात्मा को समर्पित है। स्वामी जी ने कहा कि परमात्मा उदार हैं, वह हमें भी उदार बनायें। परमात्मा ने यह संसार मनुष्य आदि जीवों को सुख प्रदान करने के लिए बनाया है। हम परमात्मा का बार-बार नमन एवं वन्दन करते हैं। परमात्मा ने कृपा करके हम लोगों को वेद पथ पर डाला है, इसके लिये भी हम उनका धन्यवाद करते हैं। स्वामी जी ने अपनी प्रार्थना में ऋषि दयानन्द और उनके उपकारों भी स्मरण किया। स्वामी जी ने कहा कि ऋषि दयानन्द ने कृपा करके हमें वेद और उनके सत्यार्थ प्रदान किये हैं। स्वामी दयानन्द जी ने वेद प्रचार कर मानव मात्र का उपकार किया है। स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी ने ईश्वर से प्रार्थना की कि संसार के लोग वेदों की सच्ची बातों को स्वीकार तथा मिथ्या व असत्य बातों का त्याग करें। स्वामी जी ने प्रार्थना की कि सब दुखियों के दुःखों का निवारण परमात्मा करें। सामूहिक प्रार्थना के साथ स्वामी जी ने सभी यजमानों एवं श्रोताओं को जल छिड़क कर वेद मन्त्रों के उच्चारण के साथ आशीर्वाद दिया। इसके पश्चात आर्य भजनोपदेशक श्री रमेशचन्द्र स्नेही जी ने यज्ञ प्रार्थना कराई। यज्ञ प्रार्थना के बाद आश्रम के मन्त्री श्री प्रेम प्रकाश शर्मा ने उत्सव में पधारे सभी लोगों को सायंकालीन एवं शेष दिनों में होने वाले यज्ञों में यजमान बनने की प्रेरणा की।

यज्ञ की समाप्ति के बाद श्री रमेशचन्द्र स्नेही जी का एक भजन हुआ। भजन के प्रथम वाक्य के बोल थे ‘ओ दाता श्रेष्ठ धन देना। जिसमें चिन्तन और मनन हो ऐसा मन देना, ओ दाता श्रेष्ठ धन देना।।’ कार्यक्रम का संचालन हरिद्वार से पधारे आर्य विद्वान श्री शैलेश मुनि सत्यार्थी जी ने बहुत ही उत्तमता से किया। सत्यार्थी जी ने लोगों को आश्रम को दान देने की प्रेरणा की और दान के महत्व पर प्रकाश डाला तथा कलकत्ता के एक सेठ द्वारा पं. मदन मोहन मालवीय जी को कंजूस होते हुए भी 51 हजार रूपये दान देने की घटना सुनाई। इस घटना को सुन व इससे प्रभावित होकर पानीपत से पधारे एक बन्धु ने आश्रम को प्रतिमाह पांच हजार रूपये दान भेजने की घोषणा की।

भजन के पश्चात कार्यक्रम में उपस्थित साध्वी प्रज्ञा जी का उपदेश हुआ। प्रज्ञा जी ने देहरादून में स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी के धौलास ग्राम में स्थित आश्रम में 9 वर्षों तक मौन रहकर तप व साधना की है। वह एक प्रभावशाली कवि भी हैं। उनकी संन्ध्या एवं अन्य विषयों पर कुछ काव्य संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। साध्वी प्रज्ञा जी ने अपने उपदेश के आरम्भ में एक वेदमन्त्र गाया तथा उसका काव्यार्थ भी अत्यन्त मधुर स्वरों में गाकर प्रस्तुत किया। साध्वी जी ने कहा कि हग्रणीय देव महान परमेश्वर की रक्षा से ही हम सृष्टि को देख व जान पा रहे हैं। यह समस्त जगत ईश्वर ने प्रकाशित किया है। प्रभु हममे श्रेष्ठ कर्मों को धारण कराये यह हम उससे प्रार्थना करते हैं। हम प्रभु को जान सकें तथा उसका साक्षात्कार कर सकें, यह हम सबको प्रभु से प्रार्थना करनी चाहिये। साध्वी प्रज्ञा जी ने कहा कि हम दोषों से बचना चाहते हैं। परमात्मा हम पर कृपा करें कि हम श्रेष्ठ कर्मों को धारण कर सकें। प्रज्ञा जी ने कहा कि हम जिसे जानते हैं उसे मानते भी हैं। उन्होंने कहा कि विद्युत से युक्त नंगी तार को छूने के दुष्प्रभावों को जानने के कारण उसे छूते नहीं है। उन्होंने कहा कि हम पंचमहायज्ञों को जानते तो हैं परन्तु उसे पूरी तरह से मानते वा करते नहीं हैं।

साध्वी प्रज्ञा जी ने श्रोताओं को सत्संग के महत्व को बताने के साथ वहां सुनी बातों को अपनाने का अपनी ओजस्वी वाणी में आह्वान किया। उन्होंने उपदेश सुनने के साथ साथ सुने उपदेश पर मनन करना भी आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि सबको पंचमहायज्ञ करने चाहियें। आचार्या प्रज्ञा जी ने प्रथम ब्रह्मयज्ञ की चर्चा की। उन्होंने कहा कि हम मन्त्र से तभी लाभ ले सकते हैं कि जब हमें उस मन्त्र के अर्थों का भी ज्ञान हो। बहिन प्रज्ञा जी ने कहा कि हमें समय निकाल कर सन्ध्या के सभी मन्त्रों के अर्थों को भी पढ़ना चाहिये जिससे सन्ध्या आदि करते समय हमें यह पता हो कि हम किस मन्त्र से ईश्वर से क्या प्रार्थना कर रहे हैं। प्रज्ञा जी ने कहा कि जब हम ब्रह्मयज्ञ करते हुए अर्थ की भावना के साथ मन्त्रों को बोलते हैं या मन्त्र का जप करते हैं, तभी उस क्रिया से हमें पूरा लाभ हो सकता है। साध्वी प्रज्ञा जी ने कहा कि बिना तप किये हम किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त नहीं कर सकते। ब्रह्मयज्ञ हम सबको करना चाहिये। ब्रह्मयज्ञ के बाद हमें देवयज्ञ भी अवश्य करना चाहिये। यज्ञ हमें अपने शरीर के द्वारा वायु मण्डल में होने वाली दुर्गन्ध के निवारण के लिए करना है। हमारे शरीर से हम समय दुर्गन्ध उत्पन्न होती रहती है जिसकी निवृत्ति करना हमारा कर्तव्य होता है। हमें प्रतिदिन देवयज्ञ करने व उसमें न्यून से न्यून सोलह आहुतियां तो देनी ही चाहियें। साध्वी जी ने बताया कि जिस घर में प्रतिदिन यज्ञ होता है उस परिवार के किसी सदस्य को डिप्रेशन कभी नहीं होता। इसके बाद साध्वी प्रज्ञा जी ने पितृ यज्ञ, बलिवैश्वदेवयज्ञ तथा अतिथि यज्ञ के महत्व पर भी प्रकाश डाला। मां के महत्व पर प्रकाश डालते हुए साध्वी जी ने कहा कि माता निर्माता होती है। उन्होंने सभी माताओं को अपने घरों अनिवार्य रूप से पंचमहायज्ञ करने की प्रेरणा की। साध्वी जी ने स्कूल के बच्चों को सम्बोधित करते हुए कहा कि बच्चों को कौव्वे से हर समय जागरूक रहने का गुण ग्रहण करना चाहिये। पढ़ाई करते समय उन्हें बगुले की एकाग्रता के गुण का विचार कर उसे अपने जीवन में स्थान देना चाहिये।कुत्ते का गुण होता है कि सोते हुए जरा सी आहट होने पर जाग जाता है। ऐसा ही हमें भी अपनी निद्रा पर नियंत्रण रखना चाहिये। देर तक किसी भी बच्चे को नहीं सोना चाहिये। साध्वी जी ने बच्चों को यह भी कहा उन्हें स्वास्थ्यवर्धक भोजन ही अल्प वा उचित मात्रा में करना चाहिये। अभक्ष्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिये। इसी के साथ अपनी एक ईश्वर भक्ति का पाठ करते हुए साध्वी प्रज्ञा जी ने अपने उपदेश को विराम दिया। उपदेश की समाप्ति के बाद कार्यक्रम का संचालन कर रहे श्री शैलेश मुनि सत्यार्थी जी ने 10.00 बजे आश्रम में आयोजित युवा सम्मेलन की जानकारी दी और सबको समय पर सभागार में उपस्थित होने का अनुरोध किया।

कार्यक्रम की समाप्ति के बाद सभी साधक श्रोताओं ने आश्रम की पाकशाला में बैठकर प्रातःराश लिया। इसके बाद युवा सम्मेलन हुआ जिसका संचालन आर्यजगत के विख्यात विद्वान आचार्य आशीष दर्शनाचार्य जी ने किया। आश्रम का ग्रीष्मोत्सव आगामी 15 मई, 2022 तक चलेगा। उत्सव में देश के अनेक भागों से ऋषिभक्त एवं विद्वान बड़ी संख्या में पधारे हुए हैं। आज हमें आयोजन में यमुनानगर से पधारे आर्य विद्वान श्री इन्द्रजित् देव जी के दर्शन भी हुए। चण्डीगढ़ से भी ऋषिभक्त श्री सुशील भाटिया जी पधारे हुए हैं और सभी कार्यक्रमों के आयोजन में अपनी सेवायें दे रहे हैं। इस वर्ष आश्रम में ऋषिभक्त श्रोताओं की उपस्थिति पूर्ववर्षों से अधिक हैं जिससे आश्रम के अधिकारी एवं कर्मचारी उत्साहित हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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